Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shri Dravya Drushti Prakash

14 February 2002 · Patra 22

Transcript

Transcribed automatically and lightly corrected. The recording is the authority where they differ.

Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:12णमो अरिहंताणं

0:14णमो सिद्धाणं

0:16णमो आयरियाणं

0:18णमो उवज्झायाणं

0:20णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते ।

0:30चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे

0:36मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।

0:44मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥

0:52सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।

0:56प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥ द्वैतपुरुषोत्तमम्।

1:02ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।

1:10कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः

1:20શ્રી દ્રવ્ય દ્રષ્ટિ પ્રકાશ.

1:24પૂજ્ય જ્ઞાનચંદજી સોહાણીજી કે આધ્યાત્મિક પત્ર.

1:28પત્ર number 22.

1:30આજે 5મો અધ્યાય ચંદ્રાય.

1:34आज 5वाँ स्वाध्याय चल रहा है। प्रश्न ऐसा किया है कि किस प्रकार आत्मा अपनी और पुरुषार्थ की वृद्धि करने का प्रयोग करता है? जिस आत्मा को आत्मज्ञान हो गया है वो अब आगे क्या करता है, कैसे करता है ताकि वो परमात्मा बने? इसके प्रश्न में अपना विषय चल रहा है तो उसका केंद्र बिंदु।

2:02तो उसका केंद्र बिंदु आगे बढ़ने का एकमात्र वही है।

2:04अपना परमात्मा।

2:07बाहर में कोई परमात्मा है या सद्गुरु है या साधर्मी लोग हैं या सत्संग है।

2:14या ज्ञानी पुरुषों के शास्त्र हैं।

2:18या उनकी वाणी, tape, video है।

2:22ये सब तो external force है।

2:24अंतर में स्वयं अपने बल पे आगे बढ़ो।

2:29देव अपने बल पे आगे बढ़ना होता है।

2:31मोक्ष मार्ग में कभी दूसरे के मार्ग पे बल पे आगे नहीं बढ़ना होता।

2:35जैसे हमको स्वर्ग में जाना है तो हमको खुद को मरना है।

2:41तो ही हम जा सकते हैं।

2:44इसी प्रकार से अगर हमको आगे बढ़ना है तो।

2:48तो फिर हमारे हमारे आत्मा का ही शरण हमको लेना पड़ता है।

2:52कैसा है वो आत्मा वो बात बताइए।

2:55कि अखंड ज्ञान घन।

2:57अखंड ज्ञानघन पुरुषाकार शरीर कर्म भाव कर्म और blankness और शुद्ध पर्याय सबसे भिन्न उससे भी गहराई में जानने देखने वाली जो तत्व है सार वही मैं हूँ वही मेरा अस्तित्व है और उसमें नज़र करते ही आनंद होता है।

3:30उसमें नज़र करते ही आनंद की अनुभूति होती है लेकिन वो आनंद की अनुभूति भी मेरे से बाहर है मेरे में नहीं है।

3:38शुद्ध पराय का अस्तित्व भी उसमें गौण है।

3:42ऐसी प्रथम यथार्थ श्रद्धा जब ही कही जाती है कि ऐसी श्रद्धा के प्रसार के साथ ही लीनता का प्रथम आत्मानुभव होता है।

3:53लीनता का प्रथम आत्मानुभव होता है।

3:56ऐसी ही वहां नज़र पड़ते ही अनुभव होता है पहली बार।

4:01लीनता का पुरुषार्थ अथवा इसमें वृद्धि ये सब पर्याय के कारण है।

4:05इसी प्रकार से दोबारा तीसरी बार चौथी बार।

4:09इस प्रकार से पूरा मेहनत करके पुरुषार्थ करके लीनता करना।

4:13और फिर लीनता तो हो रही है लेकिन अभी time बढ़ता है अंदर का।

4:18कि पहले देखा तो 1 second अंदर रहा।

4:21देखा एक second एक second अंदर रहा, बाद में 2 second बाद में 3 second ऐसा time वृद्धिगत होता है।

4:27तो लीनता की वृद्धि, लीनता और लीनता की वृद्धि दोनों में फर्क।

4:33नजर वहां जाना वो लीनता।

4:36और वहां ज्यादा देर तक ठहरना उसका नाम लीनता की वृद्धि।

4:41ये सब कार्य परमात्मा नहीं करता।

4:44परमात्मा को वो कार्य करना नहीं।

4:47वो तो सिर्फ...

4:50वो तो सिर्फ अपने...

4:53वो नज़र भी करना वो उसका काम नहीं है कि मैं मेरे को देखूँ ऐसा नहीं होता।

4:56वो तो सिर्फ महसूस होना होता है।

4:59और महसूस करना भी उसका काम नहीं है।

5:02महसूस करना भी अवस्था करेगी मैं नहीं करूँगा।

5:06परमात्मा कुछ भी नहीं करता है वो निष्क्रिय तत्व है।

5:09परमात्मा में मतलब मेरे में कुछ होने नहीं होने का...

5:15कोई question नहीं।

5:17कोई question नहीं ये सब कार्य लीनता का पुरुषार्थ और उसमें वृद्धि ये सब पर्याय के कार्य हैं मेरापना मेरा अस्तित्वपना अथवा व्यापकपना तो केवल त्रिकाली ज्ञानगंध अखंड चैतन्य में है ऐसी दृष्टि में ऐसी नज़र करने से ऐसी ऐसा।

5:45ऐसी ऐसा मानने से दृष्टि माने मानना इस प्रकार से मानने से पर्याय का पुरुषार्थ उसका सहज स्वभाव है।

5:56क्या?

5:56ऐसे दुखी आदमी को देखते हैं और चिल्लाता है, भीख मांगता है, रोता है, तो ऐसा scene देख कर के हमको सुख का आनंद नहीं आता है।

6:13हमको भी करुणा के या दया के ऐसे ही भाव आ जाते हैं उसको देखकर।

6:18और सुखी आदमी को देखते हैं तो?

6:21तो उसके आनंद आनंद का जैसा उसको कितना आनंद मिलता होगा उसका हमको अंदर में feeling होती है।

6:28परमात्मा को देखें तो?

6:32परमात्मा को देखें पर उसमें आनंद अपने आप होता है।

6:36आनंद लाने की चीज नहीं है।

6:38बस देखने से काम होता है।

6:41बस देखने से काम होता है।

6:43मांगना नहीं पड़े, बिना मांगे मिले।

6:46Just आप देखो।

6:48और आनंद हो जाता है।

6:49और सारी अशांति, डर, भय, कल्पना, भविष्य की चिंताएं,

6:53भूतकाल के अफसोस सब खत्म 1 second के अंदर।

6:56नजर में ही कमाल है।

6:59होत आसवा परिसभा।

7:01कृपा जी ने एक भक्ति लिखी है हिंदी में।

7:04होत आसवा परिसभा। आसवा माने राग द्वेष।

7:08परिसभा माने...

7:09परिसभा माने परि माने समस्त रूप से सभा माने त्याग होता है।

7:15नाश होता है।

7:18होत आसवा परिसभा नहीं इनमें संदेह है।

7:20इसमें कोई शंका की बात नहीं है कि राग द्वेष मिटते हैं।

7:26मात्र दृष्टि की भूल है।

7:28भूल गए गते लेकिन क्या करें?

7:31तुम्हारी नज़र में ही खोट है।

7:33जहाँ देखना चाहिए वहाँ देखते नहीं हो।

7:37देखते नहीं हो।

7:37जहाँ नहीं देखना चाहिए वही नज़र में आता है।

7:41चाहते हैं तो हम सुखी होना।

7:44लेकिन काम सारे दुखी होने के करते हैं।

7:47सुखी होने का ये उपाय है।

7:51मोक्ष मार्ग में वृद्धि करने का, पुरुषार्थ की वृद्धि करने का ये उपाय है।

7:56क्या उपाय है कि मैं सबसे भिन्न परमात्मा हूँ।

8:00बस that's all finish।

8:02अब अब क्या होगा ऐसा मानना।

8:05अब अब क्या होगा ऐसा मानने से?

8:08कि जिस परिणति में ऐसा मानना हुआ,

8:10उस परिणति को आनंद मिले बिना नहीं रहेगा।

8:14सुखी होने का इतना

8:18आसान तरीका है। सुखी होने के लिए क्या करना?

8:22कि मैं परमात्मा हूँ ऐसा मानना।

8:25तो सुखी हो जाओगे।

8:26कहीं ऐसा तो नहीं है ना कि धोखा

8:32हो जाएगा?

8:33धोखा हो जाएगा। हम राजा नहीं हो राजा माने तो फिर मज़ा आ जाएगी ऐसा थोड़ा है।

8:37हम अभी बाहर में भीख मांगते हैं और फिर हम...

8:41तुम मानो तुम राजा हो।

8:43अच्छा भई मान लेते हैं चलो। मानने में क्या जाता है?

8:47मान लो ना राजा हो।

8:48सुखी होने में जब इतना आसान है तो मान लो।

8:52अच्छा भई चलो हादसे में राजा हो।

8:53फिर भूख लगेगी तो भई खाना तो दो।

8:55चाय में शक्कर नहीं है चाय शक्कर तो डालो।

9:01शक्कर नहीं है चाहे शक्कर तो डालो हो गए राजा ऐसा नहीं चलता है ये ये तरीका नहीं है मैं परमात्मा हूँ ऐसा मानने के लिए उसको एक बार देख लेना पड़ेगा देख लो फिर कभी नहीं भूलोगे एक बार देखना पड़ेगा और उसको एक बार देखने के लिए क्या करना पड़ता है बहुत कुछ करना पड़ता है।

9:29बहुत कुछ करना पड़ता है।

9:32वो एक बार अपने परमात्मा को देखने के लिए बहुत कुछ करना पड़ता है।

9:36सबसे पहले तो दुनिया में कुछ नहीं चाहिए मुझे सिवाय शांति के, वो पहले final कर लो।

9:40मानने से राजी होने का है, मानने से सुखी हो जाते हैं, लेकिन मानने में ही गड़बड़ है, जानने में तो कुछ नहीं है।

9:50मानने में तकलीफ है।

9:51परमात्मा माने तो फिर मैं देवचंद भाई वो नहीं रहता है।

9:57वो नहीं रहता है।

9:57कि मेरा मकान नहीं रहता है, मेरा शरीर नहीं रहता है।

10:02और मेरापना जहाँ जहाँ लगाया ना सब जगह निकल जाता है।

10:07वो जो शरीर से भिन्न, कर्म से भिन्न, भाव कर्म से भिन्न, शुद्ध पराय से भिन्न,

10:11जो जानने देखने वाला तत्व वो मैं हूँ।

10:14ऐसा जब आएगा,

10:16तब फिर मैं शरीर वाला, मैं परिवार वाला, मैं किसी का भाई, मैं किसी का पिता,

10:22मैं मनुष्य वो नहीं रहेगा।

10:25માનવું એ તો માનવું બરાબર છે.

10:28માનવામાં બહુ બધો છે.

10:32એટલે ધર્મનો base શું છે? ધર્મનો base છે સમ્યક દર્શન.

10:36સચી માન્યતા.

10:39સમ્યક દર્શન.

10:39સચ્ચાં દર્શન હોય, સચી માન્યતા હોય, સચ્ચાં શ્રદ્ધા હોય તો જીવ દુઃખી કેમ થાય?

10:47લેકીન જીવ દુઃખી હોતા હૈ.

10:50તકલીફ મેં હૈ, ઢેર સારી ચિંતાએ હૈ.

10:53चिंताएं हैं इच्छाओं का अंत नहीं है और कोई इच्छा पूरी होती नहीं है और दुखी दुखी दुखी दुखी है इसका कारण क्या है कि इसका vision गलत है इसकी मान्यता गलत है जब इसका vision सही हो जाएगा मान्यता सही हो जाएगा इसका देखना सही हो जाएगा और सही होगा कब जब वो मानेगा कि मैं परमात्मा हूँ तो समझना कि इसका vision सही हो गया।

11:23एक बार अगर देख लिया और मान लिया कि मैं परमात्मा हूँ, खलास। फिर उसको कितना भी करो दुखी नहीं कर सकते।

11:29कितना भी करो, आंधी आए चाहे तूफान आए, वो दुखी नहीं हो सकता है।

11:35वो permanent सुखी हो गया।

11:39जैसे छाछ में से मक्खन निकाल लेते हो, बाद में मक्खन को वापस मिला दो छाछ में।

11:46Impossible है, अब नहीं मिलेगा।

11:49Impossible है अब नहीं मिलेगा।

11:52ऐसे एक बार अगर मान्यता बदल गई, finish।

11:54फिर कोई फर्क नहीं पड़ता है।

11:59फिर तो जितना पूर्व का कर्म बांधा है अज्ञान अवस्था में,

12:03उसका कर्जा चुकाने के लिए हमको संसार में रहना है।

12:07और अंदर की साधना करते-करते संसार में रह सकते हो।

12:11जब साधना बढ़ जाएगी और काम-वापस कर्जा भी चुक जाएगा।

12:15और यहाँ साधना बढ़ जाएगी।

12:17और यहाँ साधना बढ़ जाएगी।

12:19क्या होगा?

12:21परमात्मा बन जाएगा।

12:24कौन बनेगा परमात्मा?

12:26जो पहले से ही परमात्मा है।

12:27वो ये मानते-मानते कि मैं परमात्मा हूँ, मैं परमात्मा हूँ, मैं परमात्मा हूँ।

12:34ऐसा मानते-मानते बार-बार उसको देखते-देखते वो परमात्मा।

12:38बन जाएगा।

12:39परमात्मा बनने का कोई दूसरा पूछा ना कि कैसे आगे बढ़ें?

12:45पूछा ना कि कैसे आगे बढ़े?

12:46आत्मा का अनुभव होने के बाद आगे कैसे बढ़े? यही तरीका और कोई तरीका नहीं है।

12:55केवल त्रिकालिक ज्ञानघन अखंड चैतन्य मैं हूँ, इस दृष्टि में पर्याय का फुर्सत सहज स्वभाव है। ऐसी नज़र होते ही पर्याय में आनंद होना, लीनता होना, उसमें वृद्धि होना, राग द्वेष कम होते जाना, ये सब automatic है। वो...

13:13ये सब automatic है वो आपको करना नहीं है।

13:17कि नहीं क्रोध बहुत आता है क्रोध को खत्म कर देना है।

13:20तो नहीं तुम नहीं कर सकते।

13:23फिर कैसे कम होगा? आप परमात्मा में ऐसी दृष्टि करो अपने आप कम हो जाएगा।

13:29देखिए।

13:30क्रोध को खत्म नहीं करना है गलत भाव को मिटाना नहीं है।

13:32आप परमात्मा में ऐसा नजर करो सब मिट जाएगा अपने आप।

13:36जो काम अपने आप होता है।

13:38उसको दुखी हो करके क्यों करते हो?

13:41क्यों करते हो?

13:41तो नहीं दुकान छोड़े तो ही होता है। दुकान छोड़ने की जरूरत दुकान जाओ लेकिन अवलोकन करो दुकान की रुचि खत्म हो जाएगी। पहले क्या होता है?

13:51दुकान नहीं छुट्टी है पहले। पहले क्या होता है?

13:54कमाने की जो रुचि है,

13:57कि दुकान मेरी है ऐसी जो रुचि है,

14:00और आग्रह है कि 10 बजे खोलना ही है,

14:03पहले वो खत्म होता है।

14:04नहीं तो ग्राहक भाग जाएंगे और नुकसान हो जाएगा।

14:09नुकसान हो जाएगा ना।

14:12भाग गए तो भाग गए।

14:15वो कमाने की जो लालच, ग्राहक को संभालने की लालच, सेवा करने की लालच,

14:20जंजाल बढ़ाने की लालच, वो खत्म पहले होती है। दुकान नहीं है, दुकान तो अभी भी जाना पड़ता है।

14:28और बिल्कुल लालच नहीं होगी कमाने की तो भी जब तक आपको दुकान के साथ लेना-देना है,

14:34संबंध है, जाना ही पड़ेगा।

14:39नहीं नहीं जाऊंगा। तुम्हारे हाथ में नहीं है नहीं जाना। जाना ही पड़ेगा। नहीं नहीं मैं car में नहीं बैठूंगा। नहीं तुझे बैठना पड़ेगा। ऐसा कैसे हो? पैदल कैसे चलोगे तुम? नहीं बैठना ही पड़ेगा car में। नहीं नहीं मैं त्यागी हूँ। त्यागी हो तो क्या हो गया? तुम अंदर में त्याग करो। बाहर में तुझे बैठना ही पड़ेगा। किसी को ना ग्रहण कर सकते हैं ना छोड़ सकते हैं। समय के पहले ना कोई छोटा है, समय के पहले ना कुछ।

15:05समय के पहले ना कुछ ग्रहण होता है।

15:07ये ऐसा परमात्मा है कि जाने देखे सब कुछ लेकिन करे धरे कुछ भी नहीं।

15:13सूके घास के तिनके के दो टुकड़े करने की हमारे में ताक़त नहीं है, ये ज्ञानियों के वचन हैं।

15:20जैनों के भगवान हेराफेरी नहीं करते क्योंकि कर नहीं सकते।

15:25जैनों के भगवान किसी को सुखी दुखी नहीं कर सकते क्योंकि कर नहीं सकते।

15:30कि वो...

15:34कि वो भक्त हो तो उसको कृपा करके उसको ऊंची seat देना।

15:37और जो गाली देने वाला है उसको मारना डंडा लेकर के।

15:40जैनों के भगवान ऐसा काम नहीं करते।

15:43जैनों के भगवान ऐसे होते हैं।

15:47और पहले वो हम जैसे थे।

15:50फिर आत्मा का अनुभव हुआ गुरु की कृपा और मार्गदर्शन से।

15:54तब से वो धीरे-धीरे आत्मा में लीन होते होते होते अपने परमात्मा का दर्शन, पूजा, भक्ति सब करते करते करते करते...

16:01करते हैं।

16:03सभी प्रकार के राग द्वेष को धीरे-धीरे करके मिटा करके आज वो वो position में हैं।

16:06कि उनकी नज़र आत्मा से हटती ही नहीं है।

16:10और कितना सुख है?

16:11जिसकी कोई सीमा नहीं है उतना सुख।

16:14परिपूर्ण शांति है।

16:16उनको किसी की पूजा भक्ति करने की ज़रूरत नहीं पड़ती है शास्त्र पढ़ने की ज़रूरत नहीं पड़ती है जैनों के परमेश्वरों को।

16:26किसी की आरती उतारना नहीं है किसी...

16:29किसी की आरती उतारना नहीं है, किसी का भला करना नहीं है, किसी का बुरा करना नहीं है।

16:34अपने में से बाहर निकले तो करे ना, अपने में से बाहर ही नहीं निकलते।

16:38अपने घर में रहते हैं और बहुत मजे में रहते हैं।

16:40क्या?

16:43कितने volt का current है?

16:46अंदर में?

16:471000 volt का नहीं, 440 का तो बात ही छोड़ो।

16:51घर में 250 होता है, किसी आदमी battery में 440 होता है।

16:54बड़ी factory में 10,000 volt रहता है।

16:57Factory में 10,000 volt रहता है।

17:00काहे से छुए तो खत्म मामला।

17:01लेकिन यहाँ तो अंदर में कितना बड़ा boundary है।

17:06अनंत अनंत voltage है अनंत जिसका अंत नहीं है।

17:10बाहर कैसे निकलेंगे?

17:11और वो voltage तो डराता है खून चूस लेता है।

17:14क्या?

17:14और ये ये voltage कैसा है कि छुए तो निकलना नहीं बाहर।

17:20मजा आती है।

17:20आनंद का voltage है ये बिजली का voltage नहीं।

17:25Voltage है ये, बिजली का voltage नहीं है, आनंद का voltage।

17:28अनंत voltage है।

17:30इसमें अगर प्रवेश कर गए, तो बाहर कभी निकलोगे नहीं।

17:34निकलना चाहो तो भी नहीं निकल सकते।

17:37ऐसा होता है।

17:38इस दृष्टि में पर्याय का पुरुषार्थ सहज स्वभाव है, अपने परमात्मा की दृष्टि करना।

17:46अगर ये हो गया हासिल,

17:47फिर आप फिकर छोड़ दो कैसे आगे बढ़ना है।

17:53फिकर छोड़ दो कैसे आगे बढ़ना है।

17:56अब वो question मत करो कैसे आगे बढ़ो।

17:59यही है बार-बार यही सब।

18:02पर्याय अपेक्षा पुरुषार्थ हुआ वृद्धि हुई उसने पुरुषार्थ किया।

18:07उसने व्रत तप लिए।

18:08उसने घर बार त्यागे।

18:10उसने कपड़े त्यागे जंगल में चले गए साधना की आत्मा की।

18:15श्रेणी लगाई केवल ज्ञान प्राप्त किया।

18:18सिद्ध भगवान बने ये सब।

18:21भगवान बने ये सब बाहर से दिखता है वो कहने में आता है अंदर में उन्होंने एक ही काम किया है।

18:27कौन सा काम किया है?

18:29मैं परमात्मा हूँ ऐसी दृष्टि की।

18:32महावीर स्वामी ने 12.5 साल तक जंगल में ध्यान किया था कैसे ध्यान किया?

18:39मांस मदिरा का उपवास किया था।

18:42और चंदन माला के पास से वो लेके आया ना खाने के लिए क्या?

18:46अड़द के दाने क्या थे?

18:49के दाने क्या था?

18:49वो सब किया था। वो सब बाहर से देखा हमने। अंदर में एक ही काम किया।

18:53अंदर में एक ही काम किया।

18:54अंदर में उन्होंने अपने परमात्मा की दृष्टि से...

19:02भूखा रहने से आगे नहीं बढ़ेगा तो फिर नरक में तो खाने को ही नहीं मिलता है 10,000 साल तक minimum।

19:09Minimum आयु से 10,000 और एक दाना नहीं मिलता है खाने को।

19:13और भूख इतनी लगती है कि सारा अनाज खा जावे इतनी भूख लगती है।

19:17आ जावे इतनी भूख लगती।

19:18अगर वो यहाँ आ जाए तो अपने को खाना ना देवे वो पूरा खा लेवे खुद ही।

19:22यहाँ अपने को ही खा जाए ज्यादा वो गड़बड़ करे।

19:26इतनी भूख लगती।

19:27वो पकाने की जरूरत नहीं कच्चा ही खाए दबा लेवे।

19:31इतनी भूख रहती है।

19:32लेकिन मिलता नहीं है दाना भी नहीं मिलता है।

19:36लेकिन धर्म नहीं होता है।

19:37खाना छोड़ने से धर्म थोड़ा है।

19:41महावीर स्वामी ने मांस सेवन का उपवास किया ना ऐसा।

19:45ने मांस सेवन का उपवास किया, ऐसा अभिग्रह धारण किया।

19:47वो उसका बाहर का रूप है, अंदर का रूप नहीं। अंदर में उन्होंने ये काम किया था।

19:53अपने परमात्मा की दृष्टि की थी।

19:55तो व्रत, तप, साधना सब बाहर में अपने आप होते गए।

19:59ये पर्याय का स्वभाव है। ये कहने में आएगा कि Mahavir Swami ने ऐसा किया, वैसा किया।

20:04लेकिन वो पर्याय की दृष्टि से।

20:07कहने में वैसा आएगा, लेकिन अंदर से देखा जाए तो वो भगवान कैसे बने?

20:13कैसे बने?

20:13भगवान ऐसे बने।

20:16मैं परमात्मा हूँ ऐसी दृष्टि लगाने से परमात्मा बने।

20:20यथार्थ में तो अभ्यास शुरू करना है।

20:26यथार्थ में तो वास्तव में तो पुष्ट अस्तित्व पाने की अखंड दृष्टि के बल पर पर्यायों का क्रम सहज ही अखंड की ओर बढ़ता रहता है।

20:37अपना एक जो अंदर में जो जहाँ नज़र करना...

20:41जो अंदर में जो जहाँ नज़र करनी है उसको बराबर समझ लो।

20:44उसका target बनाओ।

20:46और कहीं नहीं जाकर के वहाँ ही रुकना है, उसको ही देखना है।

20:51ऐसा एक fix कर दो।

20:54कि लफड़े में मत जाओ किधर।

20:56इसने ऐसा क्यों किया वैसा क्यों किया, सर मत खाओ।

21:00सीधा सुखी होना है ना?

21:03हाँ सुखी होना है।

21:04सीधा एक target पकड़ लो।

21:06दृष्टि का विषय क्या?

21:09કિસસે હૈ ક્યા?

21:12કિસકો હમ દેખના હૈ તાકી શાંતિ મિલે?

21:15વો કહાં હૈ?

21:17હું કોણ છું?

21:19ક્યાંથી થયો?

21:21શું સ્વરૂપ છે મારું ખરું?

21:24કોના સંબંધે વળગણા છે?

21:25રાખું કે એ પરિહરું?

21:27એના વિચાર વિવેકપૂર્વક શાંત ભાવે જો કર્યા તો સર્વ આત્મિક જ્ઞાનના...

21:37सर्व आत्मिक ज्ञान ना सिद्धांत तत्व अनुभव।

21:40रे आत्म तारो आत्म तारो शीघ्र हेने ओड़खो।

21:45सर्वात्म समदृष्टि देव आगछल ने हृदयेल।

21:48जिसको अपने आत्मा से प्यार है उसको सारी दुनिया के सभी आत्माओं से प्यार है।

21:56किसी से राग द्वेष नहीं सब मेरे जैसे आत्मा हैं।

21:59कोई जैन नहीं कोई अजैन नहीं कोई स्त्री नहीं।

22:05कोई जैन नहीं, कोई अजैन नहीं, कोई स्त्री नहीं, कोई पुरुष नहीं।

22:09कोई पामर नहीं, कोई परमात्मन नहीं, सब बराबर equal।

22:12कोई ऊँचा नहीं, कोई नीचा नहीं, कोई अमीर नहीं, कोई गरीब नहीं, वो तो सब अवस्थाओं का फर्क है।

22:19कोई तरंग ऊँची है, कोई नीची है।

22:21वो सब फर्क किसमें है?

22:23अवस्थाओं में।

22:25किसी का स्वभाव कैसा, किसी का स्वभाव कैसा।

22:28किसी का atmosphere कैसा, किसी का कैसा।

22:30किसी की बोली कैसी।

22:32ये सब पड़ा है।

22:33ये सब पर्यायों का खेल है।

22:35जिसको अपने आत्मा का दर्शन हुआ उसको सभी में एक ही जैसा आत्मा दिखता है, मेरे जैसा आत्मा है सब।

22:42गड़बड़ करते हैं।

22:43तो वो मेरा देखने का विषय नहीं है।

22:48मैं जब मेरी पर्याय को भी नहीं देखता हूँ,

22:51मैं दूसरों की पर्याय को क्या देखूँगा?

22:54मुझे शांति चाहिए तो मुझे मेरी पर्याय को भी नहीं देखना है कि कैसी चल रही है।

23:01मेरी पर्याय को भी नहीं देखना है कि कैसी चल रही है, तरण कैसे उठ रही है। उपयोग बाहर है कि अंदर है वो मेरे को नहीं देखना है। उपयोग बाहर है कि अंदर है वो वो देखना वो पर्याय को देखना। उसका कोई इतना महत्व नहीं है। महत्व इस चीज का है कि इन पर्यायों के पीछे जो परमात्मा है उधर नजर है या नहीं है। अगर वहां नजर है तो आपकी साधना बराबर चल रही है।

23:29वहाँ नज़र है तो आपकी साधना बराबर चल रही है।

23:31वृद्धिगत है।

23:32तो जहाँ अपनी अवस्थाओं को भी नहीं देखना है।

23:37वहाँ उसने ऐसा क्यों कहा, उसने ऐसा बर्ताव क्यों किया, उसने ऐसा क्यों किया, ये तो कहाँ है? ये तो boundary के बाहर चले गए।

23:46पीछे से राग, उससे द्वेष, ये तो बहुत खराब है भाई। ये साधना कहाँ है?

23:53यथार्थ साधना ऐसी नहीं होती है।

23:59यथार्थ में तो सही में अगर साधना करना है।

24:01पुष्ट अस्तित्व बनेगी शरीर से, कर्म से, भाव कर्म से और उसके से भी गहराई में।

24:08जो शुद्ध तत्व, चैतन्य तत्व है।

24:11यही मैं हूँ ऐसा अस्तित्व की दृष्टि, कैसी दृष्टि? अखंड दृष्टि।

24:16टुकड़े-टुकड़े वाली नहीं, आवे-जावे ऐसी नहीं, continuous धारा चलनी।

24:22अखंड दृष्टि और इसका...

24:25अखंड दृष्टि और इसका जो बल उत्पन्न होता है अखंड दृष्टि अखंड दृष्टि के बल पर ऐसा करने से इसके बल से क्या होता है कि जो ये अवस्था है इसके बल पर जो अवस्था है उसका क्रम step by step एक के बाद।

24:53Step by step एक के बाद और अवस्था एक के एक के बाद एक।

24:56क्योंकि कोई भी अवस्था एक second एक समय से ज्यादा टिकती नहीं है।

25:02आई गई, दूसरी आई गई, तीसरी आई गई।

25:04ऐसे अवस्थाओं का क्रम होता है।

25:06ये अवस्थाओं का क्रम, पर्यायों का क्रम सहज ही बिना प्रयत्न अखंड की ओर बढ़ते रहता है।

25:15सबका controlling कहाँ है?

25:18और दृष्टि कौन सी?

25:21वो दृष्टि कौन सी? मैं परमात्मा हूँ।

25:23ये मैं परमात्मा हूँ वाली जो दृष्टि है वो controlling है।

25:29उसको अगर आपने control कर लिया, अपने वश में कर लिया परमात्मा को,

25:32तो बाद में जो भी होने वाला है अवस्थाओं में,

25:37जो विकास होने वाला है, जो क्रमिक विकास होने वाला है,

25:40जो अशुद्धता खत्म होने और शुद्धता होने वाली है,

25:42वो automatic है।

25:44उसकी फिक्र आपको नहीं करना। कब बनूँगा परमात्मा?

25:48कब मुनि बनूँगा?

25:49कब मुनि बनूँगा वो फिक्र तुमको करने की ज़रूरत नहीं है।

25:52नहीं कब ये राग द्वेष छूटेंगे वो फिक्र तुझे करने की ज़रूरत नहीं है।

25:57नहीं लेकिन अभी भी ऐसा तो हो रहा है।

25:59अभी भी ये गलतियाँ तो हो रही हैं।

26:03उसकी फिक्र तुम मत करो।

26:05क्योंकि उसकी फिक्र करने जाओगे तो नज़र यहाँ से हट जाएगी कहाँ से?

26:10कि मैं परमात्मा हूँ।

26:12नहीं कब मैं आगे बढ़ूँगा?

26:16वही वही इतने साल से।

26:17वही वही इतने साल से आ रहा हूँ वही वही।

26:19क्या आगे नहीं बढ़ रहा हूँ मैं आगे नहीं बढ़ रहा हूँ।

26:25आगे नहीं बढ़ रहा हूँ मैं।

26:33फिकर क्यों करते हो आगे नहीं बढ़ रहा हूँ।

26:35तुम्हारी नज़र अगर परमात्मा हूँ ऐसी रहेगी तुम अपने आप आगे बढ़ोगे।

26:41आगे बढ़ना क्या पीछे बढ़ना क्या अगर ऐसी दृष्टि है तो।

26:45सबसे बढ़ना क्या अगर ऐसी दृष्टि है तो?

26:48परमात्मा ना आगे है ना पीछे है।

26:49ना छोटा है ना बड़ा है, परमात्मा तो जैसा है वैसा है।

26:53एक धर्मदास सुदना जी का मेरे पास हाथ से लिखा हुआ है पुस्तक, अभी मेरे पास पुस्तक नहीं है।

26:57लेकिन एक copy मिली थी तो मैंने अपने हाथ से लिखा है।

27:00क्या?

27:01मेरे को याद नहीं है, उतना लंबा लंबा लिखता है आत्मा के बारे में।

27:07कि वो पढ़ोगे तो हंसी आएगी।

27:08क्या?

27:08ना ऊपर है ना नीचे हो ना आदि में हो।

27:13ना ऊपर हूँ ना नीचे हूँ ना आदि में हूँ ना मध्य में हूँ ना अंत में हूँ।

27:16वो गजब की शैली है।

27:18आत्मा का वर्णन करने की शैली जो है वो पुस्तक का नाम है स्वात्मानुभव मनन।

27:23और धर्मदास सुदक ने अपनी एक किताब लिखी है।

27:27तो उसके जो अंश हैं वो धुंधली हिंदी भाषा में हैं।

27:31और वो book नहीं मिलती थी तो मैंने एक मैंने वो लेकर के मेरे हाथ से लिखा है।

27:37मैं समझता हूँ 25-30 पन्ने मैंने लिख दिए हैं।

27:41लिख दिया है।

27:50शायद ज्यादा भी लिखा होगा वो आत्म अनुभव वर्णन में।

27:54कि ना मैं जैन हूँ, ना दिगंबर हूँ, ना शैतंबर हूँ, ना वेदांती हूँ, ना मनुष्य हूँ।

28:00मैं तो...

28:01ऐसो शुद्धात्मा की जगह भी इतना लंबा लंबा नाम लिखा है आत्मा का।

28:07और फिर भी बोला ये सब...

28:09और फिर भी बोला ये शब्द जो है ना ये वो मैं नहीं।

28:12आत्मा शब्द वो मैं नहीं।

28:14उसके आदि में मैं नहीं, उसके मध्य में मैं नहीं, उसके अंत में मैं नहीं।

28:18और आखिरी में मैं तो जो हूँ सो हूँ।

28:21इतना लंबा लिखने के बाद क्या लिखा?

28:23मैं तो जो हूँ सो हूँ।

28:26वचन से पार, इंद्रियों से पार, मन से पार, पर्यायों से पार।

28:30जो शुद्ध तत्व है वो भी शब्द है, वो उसमें मज़ा नहीं आती है, शब्द के बिना...

28:37उसमें मज़ा नहीं आती है शब्द के बिना।

28:38ऐसा लिखा है।

28:40मैं गजब लिखा है मैं अभी कल देखूंगा घर में।

28:44वो book निकल आएगी तो बताऊंगा मैं।

28:47कैसा लिखा है।

28:49कि उसको कोई नाम नहीं दे सकते परमात्मा कैसा है तो उसको कोई नाम नहीं दे सकते।

28:55उसका रूप क्या उसका रंग क्या उसका color क्या उसका वजन कितना?

28:58ये 3.5 kilo नहीं होता है।

29:00क्या?

29:02वो ठिंगड़ा लंबा टूका।

29:04ना मोटा।

29:05ना मोटा पतला ऐसा नहीं होता।

29:08कोई गजब है।

29:10ऐसा परमात्मा बोले उसकी दृष्टि होगी ना।

29:13तो कैसे आगे बढ़ना चिंता करने की जरूरत नहीं।

29:18कैसे राग द्वेष मिटेंगे चिंता मत करो।

29:20कब भगवान बनेंगे कब मुनि बनेंगे चिंता करने की कोई जरूरत नहीं।

29:25कि मैं क्या करूं फिर?

29:28ये दृष्टि कर कि मैं परमात्मा।

29:31बस बाकी सब भूल जाए।

29:33ये सब भूल जाए।

29:35इसमें बहुत बड़ा कमाल है, ये controlling power ये है।

29:39सब कुछ है, petrol है, गाड़ी तैयार है, नई गाड़ी ली है, first class driving running बन रही है, लेकिन driver नहीं है, क्या करोगे?

29:45तो कैसे चलेगी गाड़ी?

29:47अब आप driving seat पे बैठ जाओ कि मैं परमात्मा हूँ, आप देखो गाड़ी कैसे चलती है।

29:52अब कोई problem नहीं है, लेकिन यहीं गड़बड़ करते हैं।

29:57हम क्या करते हैं, राग द्वेष को मिटाने जाते हैं।

30:00अशांति को मिटाने...

30:02अशांति को मिटाना चाहते हैं, शांति लाना चाहते हैं।

30:05अपने progress करना चाहते हैं, पर जो चाह, जहाँ चाह है ना, वहाँ आग है।

30:11हे जीव क्या इच्छत हवे, है इच्छा दुख मूल, जब इच्छा का नाश तब मिटे अनादि रोग।

30:21निकारो तो कृपा उड़ेगा।

30:23देखो क्या जबरदस्त लिया है।

30:29देखो क्या जबरदस्त लिया है।

30:30कि मुझे आत्मा में दृष्टि करनी है, ध्यान लगाना है, वो बात भी नहीं करना।

30:37उसमें भी गड़बड़ हो जाएगी।

30:40वो बात भी नहीं आनी।

30:42सिर्फ मैं परमात्मा हूँ ऐसा मानना है बस इतने में पूरा आ गया।

30:46वृद्धि कैसे होगी हम परमात्मा कैसे बनेंगे कि मानो।

30:50कि मैं परमात्मा हूँ।

30:52और जब मानोगे तो कुछ करने डरने को रहता नहीं।

30:56देखो 680...

30:57દેખો 680 number first sentence જેની મોક્ષ સિવાય કોઈ પણ વસ્તુની ઈચ્છા કે સ્પૃહા નહોતી એ base ઉઠાયા આત્મજ્ઞાન હોને કા કારણ મૂળ base ક્યાં તો મુજે કુછ નહીં મુજે તો સિર્ફ શાંતિ ચાહીએ મુજે મુક્તિ ચાહીએ મુજે દુઃખ તકલીફ કુછ નહીં ચાહીએ અંશ માત્ર ભી નહીં ચાહીએ કે નહીં નહીં આપકો 99% શાંતિ દેંગે.

31:2599% शांति देंगे, 1% थोड़ा दुख देंगे। नहीं, मेरे को 100% चाहिए।

31:29नहीं, थोड़ा adjust करो तो, नहीं, हम adjust नहीं करना। इस मामले में हम adjust करना नहीं चाहते।

31:38100% बोलो तो 100%।

31:3999.99% मुझे नहीं चाहिए। 100% ही चाहिए।

31:42जिसकी मोक्ष सिवाय कोई पनि वस्तुनि इच्छा के स्पृहा नहीं थी। मोक्ष माने क्या? सारे दुखों का अंत, सारी चिंताओं का अंत, कात्मक।

31:53और कौन? कात्मा। सारे राग द्वेष खत्म। और पूर्ण शांति। थोड़ी शांति नहीं, पूर्ण शांति। इसका नाम मोक्ष। कोई चाहिए और कुछ नहीं चाहिए। दूसरी कोई चीज मुफ्त में भी नहीं चाहिए। नहीं बनना है मुझे इंद्र स्वर्ग का। नहीं चाहिए मुझे राज। नहीं चाहिए मुझे दुनिया। मुझे तो यही चाहिए। ये मेरी वेद था। यहाँ से शुरू हुई यात्रा। और...

32:21और ऐसी चाहना के कारण सद्गुरु मिले, सद्गुरु ने बताया कि तू परमात्मा हो।

32:26और फिर हमने कोशिश की परमात्मा को देखने की।

32:30और जैसा उन्होंने बताया इस प्रकार से कोशिश की, नहीं हुआ तो भक्ति भाव में आए।

32:36संसार में नहीं चले गए, भक्ति भाव में आए।

32:40और भक्ति भाव से अंदर की सफाई पूरी हो गई।

32:44फिर ज्ञानी पुरुष ने कहा ऐसे हमको अपने आप...

32:49आलीभूत ने कहा ऐसे हमको अपने आत्मा की दृष्टि भी हुई।

32:51और अब तो मज़ा आती है जब चाहे तब अंदर आत्मा में रहते हैं।

32:56क्या?

32:56यहाँ तक की यात्रा।

33:00सिर्फ शांति चाहिए यहाँ से लेकर के यात्रा शुरू हुई और अब अखंड स्वरूप में रमणता थी। अब मैं क्या हो गया है?

33:07कि उस भावना से सद्गुरु मिले सद्गुरु का उपदेश सुना भक्ति पूर्वक उनकी आज्ञा उठाई और अपने में दृष्टि की और अपने में परमात्मा हूँ ऐसा देख लिया।

33:17અને આપણે મેં પરમાત્મા હોઉં એસા દેખ લિયા.

33:19અને દેખને કે બાદ વાહી રહા.

33:21અખંડ સ્વરૂપમાં વાસ થવાથી, ભ્રમણતા થવાથી.

33:24ક્યા result આયા?

33:25મોક્ષની ઈચ્છા પણ નિવૃત થઈ ગઈ છે.

33:29આ પૂછો ઉસકો આત્મા આત્મા કે દર્શન હો ગયા ને પૂછો.

33:33નહીં મોક્ષ જાના હૈ?

33:34નહીં મુજે નહીં જાના હૈ.

33:36નહીં આત્મા મેં ઉપયોગ લગાના હૈ?

33:39મુજે નહીં લગા.

33:40બહાર સે ઉપયોગ હટાના હૈ?

33:41નહીં મુજે નહીં લગા.

33:45તો હટાના હૈ.

33:45નહીં મુજે નહીં હટાના.

33:46અબ કોઈ ઈચ્છા નહીં રહી.

33:48તો સમજના કે આપકી સાધના બિલકુલ perfect હૈ.

33:52અખંડ સ્વરૂપમાં રમણતા થવાથી મોક્ષની ઈચ્છા પણ નિવૃત્ત થઈ છે.

33:57તેને હે નાથ,

33:58તું તૃષ્ટમાન થઈને પણ બીજું શું આપવાનું?

34:03જગતમાં મુક્તિ સે બઢકે તો કોઈ ચીજ નહીં હૈ ઔર મુક્તિ નહીં ચાહીએ.

34:07ક્યોકી મુક્તિ સે બઢિયા કોઈ મિલ ગયા હૈ.

34:10મુક્તિ ક્યું નહીં ચાહીએ?

34:13मुक्ति क्यों नहीं चाहिए?

34:16क्योंकि मुक्ति से भी बढ़िया चीज़ कोई उसको मिल गई है। कौन सी चीज़ मिल गई उसको?

34:20मैं ही स्वयं परमात्मा हूँ वो मिल गया उसको।

34:24मैं ही स्वयं परमात्मा हूँ वो मिल गया उसको।

34:30देखो।

34:31तो जिसको परमात्मा के दर्शन होते हैं वो भीख मांगे?

34:37बाहर में? बाहर में भीख मांगने का तो...

34:41बाहर में भीख मांगने का तो सवाल ही नहीं वो मोक्ष देवे तो भी बोले कि नहीं चाहिए मुझे मोक्ष जाओ।

34:47भाई क्यों नहीं चाहिए? मुझे मिल गया मोक्ष।

34:51कैसे मिला? कि मैं परमात्मा हूँ मुझे बंधन था ही कब? जब मोक्ष देने आए हो।

34:57वो बंधन था वो अवस्था में था।

34:59और दृष्टि मेरी परमात्मा में रहने से मुझे अशांति नहीं है तो मैं किससे छूटूँ अब?

35:04अशांति से छूटना और शांति पाना उसका नाम मोक्ष है। लेकिन मुझे अशांति हो तो ना।

35:09मुझे कोई अशांति नहीं है। क्यों अशांति नहीं है? मुझे वो वो चीज़ मिल गई है जिसके लिए मैं अनंत काल से भटका। मैं स्वयं परमात्मा हूँ, ऐसे मुझे बान हो गया है। और ये चीज़ कभी मिटने वाली नहीं है, कभी कोई छीनने वाला नहीं है। क्यों? क्योंकि यही मेरा अस्तित्व है। दो चीज़ होती है तो खींच के लेते हो, लेकिन दो चीज़ नहीं।

35:37लेकिन दो चीज़ नहीं।

35:38कैसे लेके जाओगे अभी आप?

35:40परमात्मा को मेरे से अलग कैसे करोगे जबकि मैं ही स्वयं परमात्मा हूँ?

35:45शक्कर में से मिठास निकाल दो चलो।

35:47अग्नि में से उष्णता निकाल दो।

35:51कैसे बन सकता है?

35:53पानी में से शीतलता निकालो।

35:56कैसे बन सकता है?

35:58ऐसे मैं हूँ मेरे में से परमात्मा को निकाल दो या परमात्मा को डालो बाहर से।

36:02Impossible है।

36:03फिर आप मुझे कुछ नहीं।

36:06फिर अब मुझे कुछ नहीं चाहिए।

36:10क्योंकि मैं परमात्मा हूँ तो मैं पूर्ण शांति में हूँ।

36:13अब मुझे शांति नहीं चाहिए। इतना बड़ा काम होता है।

36:16सम्यक दर्शन माने क्या समझते हो?

36:18गुरुदेव बोलते हैं सही बोलते हैं।

36:21करोड़ अनंत अनंत करोड़ अरब रुपये का कर्जा चुका दिया।

36:25आत्मा का अनुभव हुआ तो क्या हुआ?

36:27पहले अनंत शब्द फिर अनंत से तो कोई value नहीं है ना अनंत की तो।

36:32उसने क्या किया?

36:33अनंत के तो उसने क्या किया करोड़ करोड़ अरब अरब रुपया।

36:36रुपये की value है।

36:40अनंत अनंत करोड़ करोड़ अरब अरब रुपये का कर्जा चुका दिया।

36:43कैसे?

36:44अपने आत्मा का अनुभव किया।

36:46अच्छा?

36:47तो कुछ बाकी रह गया है कि हाँ बाकी तो रह गया है।

36:51कल परमात्मा नहीं बना है ना।

36:54कितना बाकी रहा?

36:55आधे रुपये का कर्जा बाकी रहा।

36:57ये शब्द हैं गुरुदेव के।

37:01शब्द हैं गुरुदेव के।

37:02ये कोई छोटी मोटी सिद्धि नहीं है।

37:05आत्मा का अनुभव करना, मैं परमात्मा हूँ ऐसा अनुभव करना, ये कोई छोटी मोटी बात नहीं है, ये बहुत बड़ी बात है।

37:13लेकिन क्या है ये दुनिया वाले, अपनी खुशी जाहिर करें तो जीने नहीं देते, बेकार के पथरे मारते हैं।

37:24इसलिए छुपा के रखना अपने परमात्मा को।

37:27क्या?

37:29क्या?

37:31बाकी हम ऐसे हैं।

37:31जिसको मिल गया वो कैसे है?

37:34इस दुनिया में मेरे से बढ़कर कोई नहीं है ऐसा मानते हैं। वो उसको आत्मज्ञान होता है।

37:39कि नहीं भगवान मेरे से ऊँचे हैं और मैं थोड़ा नीचे हूँ, मैं चौथे गुणस्थान में हूँ।

37:44भगवान कौन से गुणस्थान में हैं?

37:46तेरहवें गुणस्थान में।

37:48और सिद्ध भगवान?

37:50चौदह गुणस्थान के पार, वो मेरे से ज़्यादा बढ़के अच्छे हैं।

37:55Impossible, मेरे से बढ़िया।

37:57Impossible मेरे से बढ़िया दुनिया में कोई नहीं है दूसरा।

37:59तो समझना कि उसको आत्मा का अनुभव हुआ है।

38:04कि नहीं मेरे से बढ़कर तो मुनिराज है।

38:07मेरे से बढ़कर तो मेरे गुरु है।

38:10नहीं impossible है।

38:11बन ही नहीं सकता।

38:12इस दुनिया में मेरे से बढ़कर कोई हो ही नहीं सकता।

38:15तो ये समझना कि उसको आत्मा का अनुभव हो गया है।

38:19देखो।

38:20वो एक line दोहराया हे नाथ।

38:25हे नाथ।

38:25हे नाथ तू...

38:27हे नाथ तू...

38:27एने तू तुष्ट मन थईने पण बीजे शुं आपवानो?

38:30तुष्ट मन राजी थई।

38:31अगर तू प्रसन्न नहीं होगे तो तुम क्या दे सकते हो?

38:34इससे बढ़िया मुक्ति तो चाहिए नहीं।

38:37इससे बढ़िया तुम क्या दोगे?

38:39तेरी हैसियत क्या है?

38:41और परमात्मा को अपुन देवे?

38:44हमारी क्या औकात?

38:46किसी की क्या औकात कि परमात्मा को कुछ gift देवे?

38:50तो परमात्मा लेवे?

38:52क्या?

38:53क्या अपना कोई relative थगा भाई क्यों ना हो करोड़पति अब्जापति हो क्या उसको जाकर के ₹10 की fountain pen देओ birthday के दिन gift क्या क्या value रखेगा वो ₹10 की ball pen वो gift में देगा और अगर ले भी लिया अगर अपने को बुरा नहीं लगेगा लेकिन उसके नज़र में क्या value है।

39:23क्या उसके fountain pen में ही diamond लगा हुआ है ₹1,00,000 का?

39:29और सोने की ball pen है उसके पास तो।

39:34और Mercedes में घूमता है।

39:36तेरे जैसा कोई furniture नहीं है road पे रहने वाला।

39:41तो ऐसा उसकी कोई value नहीं है फिर वो deal को तकलीफ नहीं हो इसलिए ले लेते हैं लेकिन वो क्या करते हैं ले लेते हैं रख देते हैं किसी को gift देने में काम आएगा।

39:48क्या?

39:50क्या?

39:52कोई दिल को नहीं दुखाते हैं बाकी उसके नजर में उसकी कोई value नहीं है।

39:56ऐसे जिसको परमात्मा मिल गया है परमात्मा की दृष्टि हो गई है उसको आप राजी होकर के क्या दोगे?

40:03इसलिए वो कृपालु देव ने कह दिया कि सुन प्रभु चरण तने धरूं आत्मा थी सहुहीन ते तो प्रभु है आपे।

40:13वर्तुं चरण आदि। मेरी ताकत।

40:17कर तो करना भी मेरी ताकत नहीं है कि मैं आपको कुछ दे सकूं।

40:23देने लेने का कोई question ही नहीं है।

40:27इसीलिए इस दुनिया में ऐसी दृष्टि होना कि इस दुनिया के अंदर मेरे से बढ़िया भगवान भी नहीं है।

40:35मेरे से बढ़िया दुनिया में कोई मेरे से बढ़िया नहीं है।

40:41इसने सोगाणी जी के वचन देखे?

40:42वो compare किया है तराजू का बात।

40:46तराजू का बात।

40:46कि एक तराजू के अंदर सारी दुनिया को रख दो।

40:51सारे भगवान को रख दो।

40:52क्या?

40:53बड़े-बड़े हिमालय, मेरून पर्वत सब डाल दो इसके बाजू।

40:58पले-पले में।

40:58क्या?

40:59और बाद में मैं आ जाता हूँ, इस side में।

41:05क्या होता है?

41:07वजन किसका ज्यादा होगा?

41:11किसका वजन...

41:14किसका वजन ज्यादा है?

41:17अब दुनिया का दुनिया में तो इतने भगवान इतने वो ये सब नीचे आ जाएगा कि वो कौन सा नीचे आएगा?

41:22क्या होगा position क्या होगी?

41:25कि नहीं मेरा value ज्यादा है तो मैं नीचे और वो ऊपर आएंगे वो हल्के हैं मैं भारी हूँ ऐसा होगा?

41:31बहुत अच्छा लिखा है।

41:32फिर सोगाणी जी के वचन की ताकत देखोगे तुम।

41:37कि पूरी दुनिया एक पल्ले में रखता हूँ और दूसरे...

41:41पूरी दुनिया एक पल्ले में रखता हूँ और दूसरे पल्ले में मैं आता हूँ।

41:46तो जैसे मैं जाते ही वो सब उछल के बाहर गिर जाते हैं।

41:50देखो कितनी value है।

41:55अभी चौथे गुणस्थान में हैं।

41:59स्त्री कुटुंब परिवार के बीच रहते हैं।

42:02दिन भर मारे मारे फिरते हैं order के लिए, पैसे कमाने के लिए।

42:07पूरी गृहस्थ द्वेष वाली दशा है।

42:10लेकिन अंदर का power क्या है?

42:14इस दुनिया में मेरे से ऊँचा कोई नहीं है।

42:16हे गुरुदेव आपके इन वचनों ने तो क्या कमाल कर दिया है।

42:21ईश्वर की उत्तम उत्तम चीज़ मुझे दे दी है।

42:25और मुझे यकीन नहीं आता है कि क्या मेरा मोक्ष होने वाला है।

42:29देखो क्या सपना हुआ।

42:30सपने में भी कभी नहीं सोचा वो चीज़ सामने नज़र में आ रही है कि वाह।

42:37वो चीज़ सामने नज़र में आ रही है कि वाह मैं भगवान बनने वाला। भगवान बनने वाला क्या मैं हूँ भगवान। कितनी ताकत और ऐसा भगवान कि दूसरा कोई भगवान मेरे से ज़्यादा ऊँचा नहीं है। कैसा भगवान हूँ? ये इसका नाम है दृष्टि। दृष्टि में सारी दुनिया की महिमा zero होती है। केवल अपनी ही महिमा रहती है। अपनी अवस्था को भी नहीं गिनना है उसमें कि वो मैली है कि अच्छी है कैसी है।

43:05जो मैं नहीं है कि अच्छी है कैसी है वो out boundary के बाहर।

43:08अपने मैं मैं में तो वही चीज़ आएगी बिना अवस्था की चीज़।

43:15ना उसमें राग द्वेष है ना उसमें वितरागता है।

43:18ना शुद्ध पर्याय है ना अशुद्ध पर्याय है।

43:22कोई अवस्था उसमें नहीं है।

43:25और हम जब भी चर्चा करते हैं mostly discussions छानबीन मार्गदर्शन तय कर लेते हैं।

43:33काय का लेते हैं?

43:36अवस्था।

43:36जबकि रास्ता कोई दूसरा ही है, सुखी होने का।

43:44देखो।

43:44ये अवस्था का भूत इतना सवार है दिमाग के अंदर, कि वहां से निकल नहीं सकते हैं।

43:49और ये साधना की रुकावट है।

43:52उसको बार-बार कहना पड़ता है कि भई वहां से हटो।

43:54Investigation.

43:55Investigation में ऐसा क्यों, ऐसा क्यों किया?

43:57क्या किया तेरे में क्या बिगड़ा?

44:00भई देख अंदर में।

44:01या देख अंदर में।

44:01तेरे परमात्मा को किसने गाली दी?

44:04किसने छुआ तक भी नहीं है।

44:06दूसरा तो मारो गोली तेरी अवस्था ने तेरी आत्मा को नहीं छुआ है।

44:11क्या काहे को उठा हुआ हो हल्ला काहे को मचाया इतना?

44:16तेरे में क्या कमी आ गई?

44:17तेरे में कहाँ दाग पड़ा है?

44:21मान्यता में गड़बड़ है।

44:22कि मैं उसने ऐसा कह दिया मैं जैसा नीचे हो गया।

44:29उसने ऐसा कह दिया मैं जैसा नीचे हो गया।

44:32उसने गाली दी तो मैं नीचे हो गया।

44:35तुम नीचे थे ही कब तुम तो हमेशा ऊँचे हो।

44:37लेकिन तुम अपने पर्याय से अपने को मापते हो ना तो घड़ी में ऊँचे होते हो घड़ी में नीचे हो जाते हो।

44:44तुम पर्याय के पार देख लेते हो आप स्वयं भगवान हो।

44:49लेकिन कितना वो वाला मचाया है।

44:52और फिर डायरी लिखना पड़ता है वो करना सर्वभाव समभाव।

44:57पड़ता है वो करना सर्वभाव समर्पण क्या है?

44:59और जो अपने परमात्मा की दृष्टि नहीं करते हैं, जिनकी साधना बराबर नहीं चलती है, उसको diary लिखना पड़ता है ताकि उसकी साधना बराबर चलती रहे।

45:09बाकी diary का कोई value नहीं है।

45:11साधना अगर अच्छी चलती है तो बात क्या करना?

45:17छिपा लेना अपने आप को, साधना अच्छी चल रही है।

45:20बोलने की जरूरत नहीं है कि मेरी साधना अच्छी चल रही है।

45:25और कोई बोले कि नहीं आपकी साधना अच्छी नहीं चल रही है क्योंकि diary नहीं लिखते।

45:31उनका अभिप्राय है।

45:34मेरी नज़र में मैं कौन हूँ?

45:37मैं किसी से कम नहीं हूँ। मैं कुछ हूँ नहीं, मैं सब कुछ हूँ।

45:40क्या? हम भी कुछ हैं?

45:42ऐसा छीना-झपड़ करके भैया तुम ही सब कुछ हो।

45:45कुछ क्या तुम ही परमात्मा हो।

45:48लेकिन अपने को गिरा दिया, हम भी कुछ हैं तो गिरा दिया।

45:52मैं ही सब...

45:53मैं ही सब कुछ हूँ तो ऊँचा रख दिया बराबर है ठीक।

45:58तो दृष्टि में अपनी value करना अपुन सीखो अपने आप को।

46:01कि मैं किसी से कम नहीं हूँ।

46:05यथार्थ में तो उक्त अस्तित्व पने की अखंड दृष्टि के बल पर पर्यायों का क्रम सहज ही अखंड की ओर बढ़ता रहता है।

46:15पुरुषार्थ आदि की इन पर्यायों में कोई उलटफेर...

46:21कोई उलटफेर अधिक व कम पुरुषार्थ ऐसा करना नहीं पड़ता है।

46:26क्या? थोड़ा speed बढ़ा दो, आज अच्छा चला, कल भी ऐसा अच्छा कर दो, जल्दी-जल्दी आगे निकल जाओ।

46:33ना तुम अच्छा कर सकते हो, ना कुछ बुरा कर सकते हो।

46:37ना ज्यादा कर सकते हो, ना कम कर सकते हो।

46:40कुछ करना, नहीं करना, तेरे हाथ की बात नहीं है।

46:44क्योंकि परमात्मा कुछ करता नहीं है।

46:47कारण क्या?

46:49कारण क्या वजह है?

46:50कि क्योंकि कारण की पर्याय में तो मेरा,

46:54यानी कि दृष्टि के विषय का अस्तित्व ही नहीं है।

46:58मैं वहां हूं ही नहीं,

46:59कि मैं उसमें कुछ कर सकूं।

47:02मेरा अस्तित्व कहां है?

47:05मेरा अस्तित्व तो त्रिकालीपन में है।

47:09पर्याय में दृष्टि।

47:10अस्तित्व में।

47:10इससे पहले नहीं, पर्याय में।

47:13पर्याय में तो मेरा,

47:14मेरा माने दृष्टि के विषय।

47:17मेरा माने दृष्टि के विषय।

47:18पर्याय में तो मेरा दृष्टि के विषय का अस्तित्व ही नहीं है।

47:24अब मैं बढ़ा के क्या करूँ घटा के क्या करूँ?

47:27जहाँ मेरा कुछ लेना देना नहीं है वहाँ बढ़ा करके क्या करना है?

47:32ये 2 माले का नहीं 4 माले का बनाओ लेकिन भैया 2 10 माले का बनाओ तेरे को कुछ मिलने वाला नहीं है।

47:36तेरा अस्तित्व वहाँ नहीं है।

47:38जिसको तुम बढ़ाना चाहते हो वो तेरा अस्तित्व नहीं है।

47:43केवल ज्ञान हो जाएगा तो क्या होगा?

47:45केवल ज्ञान हो जाएगा तो क्या होगा?

47:48कि तेरे में सुधार आएगा।

47:51तो वही का वही रहोगे जो अभी हो ना वही का वही रहोगे।

47:55केवल ज्ञान होने से तुमको ना light नहीं हो जाएगी अंदर में?

47:58केवल ज्ञान खुद के आत्मा के आगे।

48:00हाँ।

48:00कि नहीं केवल ज्ञान हो जाएगा तो कड़वा था ना आत्मा तो मीठा हो जाएगा।

48:04क्या?

48:04काला था तो सफेद हो जाएगा white प्रकाश वाला हो जाएगा।

48:09और अशांत था तो बहुत शांत हो जाएगा।

48:12कि नहीं।

48:13तो बहुत शांत हो जाएगा। नहीं वो अशांत नहीं है अभी नहीं, वर्तमान में ही नहीं।

48:16तो केवल ज्ञान होने से और परमात्मा बनने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा उसको।

48:21क्यों? कि पर्याय में बढ़ोतरी हुई है उसमें तेरा अस्तित्व नहीं है तुझे कुछ भी नहीं मिला commission।

48:29और जो भी बढ़ना कम ज्यादा हुआ है वो सब अवस्था में हुआ है। तू तो पहले से ही अवस्थाओं से पार है। ये दृष्टि रखिए।

48:37पर्याय में तो मेरा माने दृष्टि के विषय का।

48:41मेरा माने दृष्टि के विषय का अस्तित्व ही नहीं है कि मैं उसमें कुछ कर सकूँ क्योंकि मेरा अस्तित्व कहाँ है मेरा अस्तित्व तो त्रिकालीपन में है। आशा है मेरा दृष्टिकोण मैं व्यक्त कर सका हूँ। प्रश्न पूछा था ना कैसे वृद्धि करता है? शायद मैंने तो अपने हिसाब से लिख दिया शायद आपको समझ में आ गया होगा।

49:09शायद आपको समझ में आ गया होगा।

49:10क्या?

49:10करना क्या है? आगे बढ़ने के लिए क्या करना है?

49:16कुछ करना है।

49:16कह रहे हैं कि करना सो मरना है। कुछ किया तो गलत।

49:21मतलब जिसको लिखे अगला ज्ञानी है, महात्मा भी है, तो ही वो समझ सकेगा ये चीज। बाकी तो वो समझ में भी नहीं आएगा।

49:28ये लगाने का है, नहीं समझाऊंगा। अपना क्या करना है?

49:30नहीं नहीं, सोगाने जी ने जिसको पत्र लिखा होगा।

49:32वो ये इतनी गहराई में जाने का तो ताकत नहीं है।

49:37ओ देखो साक्षात गुरुदेव वहाँ बिराजते हैं उनको नहीं पूछ सकते हैं।

49:43एक देखने की बात है।

49:45वो Calcutta बैठे हैं उनको letter लिख करके पूछते हैं वृद्धि कैसे करूँ।

49:50इसका मतलब क्या?

49:52उसकी बुद्धि का तो दिवाला निकल ही गया है।

49:55कि जिनसे सोगाणी जी सीख के चले गए Calcutta।

49:58उनको पूछना पड़ता है कि मैं वृद्धि कैसे करूँ।

50:03साक्षात बैठे हैं गुरुदेव पूछो ना।

50:05बैठे हैं गुरुदेव पूछो ना।

50:06कि वहां तो कांप जाते हैं वो।

50:08क्योंकि अंदर में चोर बैठा है।

50:09सब तो विद्वान का ही काम है।

50:11विद्वानों का ही छानबीन करते हैं लेकिन उनको पले एक भी परसत नहीं पढ़ने वाला।

50:14सोगण ही कहां पहुंच गए।

50:16वो उनको पले कहां से पढ़ो।

50:17कितना गहराई है इसके अंदर।

50:19पूरा मोक्ष मार्ग इसके अंदर है।

50:22अब बड़े-बड़े गाथाओं को क्या करोगे।

50:24पूरे शास्त्रों का सार तो इधर आ गया।

50:27तो आशा है मेरा दृष्टिकोण मैं व्यक्त कर सका हूं।

50:32धर्मस्नेही न्याल चंद्र।

50:33Dharmasnehi Nyalchand Sothan. Ye 5 lecture poore hue ek patra.