Avlokan Discourses of Shri Devchand bhai Shah The book Search Photographs About

Shri Dravya Drushti Prakash

8 February 2002 · Patra 22

Transcript

Transcribed automatically and lightly corrected. The recording is the authority where they differ.

Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.

0:12णमो आयरियाणं

0:13णमो उवज्झायाणं

0:14णमो लोए सव्व साहूणं

0:16नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते ।

0:28चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे

0:32मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।

0:40मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥

0:48सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।

0:52प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥

1:00ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।

1:08कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः

1:20श्री द्रव्य दृष्टि प्रकाश।

1:22पूज्य न्यायचंद सोगाणी जी की।

1:24पत्र।

1:28पठन number है 22, 22 का दूसरा।

1:32Chapter number है 22 और इसका दूसरा lecture है।

1:36कलकत्ता से सोनगढ़ ने पत्र लिखा है।

1:40आज से 40 साल पहले की बात है ये।

1:48ये जो 3 महीने उनके बहुत प्रतिकूलता वाले गए।

1:52May June July।

1:56शुरू में उनके पिताजी का स्वर्गवास हुआ।

1:58और 2 महीने।

2:00और 2 महीने पहले उनको किसी ने पेट में छुरा भोंक दिया।

2:08और doctor को नाड़ी नहीं मिल रही और बहुत मुश्किल से बच गए, life मिली।

2:124 साल और बच गए।

2:16ये life मिलने के बाद।

2:183 साल।

2:213 साल की life मिली।

2:24operation आदि होकर अस्पताल में रहना पड़ा।

2:26आज ही।

2:28हाल में रहना पड़ा आज ही घर से बाहर इस accident के बाद पहले पहले निकल रहा हूँ ये July 20 तारीख 61 का है किस प्रकार अपनी किस प्रकार आत्मा अपनी और पुरुषार्थ की वृद्धि का प्रयोग करता है ये पुरुषार्थ की वृद्धि तो आत्मज्ञान के पहले नहीं होती।

2:56के पहले नहीं होती पुरुषार्थ की वृद्धि तो आत्मज्ञान के बाद होती उसके पहले पुरुषार्थ सही है ही नहीं आत्मज्ञान जब तक नहीं होता है तब तक हमारा जो कुछ भी है ज्ञान है बुद्धि है अच्छा आचरण हो सब zero है कोई value नहीं है आत्मज्ञान होने के बाद सही पुरुषार्थ की कला हाथ में आती है।

3:26पुरुषार्थ में हम समझते हैं कुछ करना पड़ता है।

3:28चिंतन करना, मनन करना, गोलन करना,

3:31सत्संग करना, पूजा करना, भक्ति करना, मंत्र जाप करना,

3:36ज्ञानियों के वचनों को याद करना, लेकिन ये कोई भी

3:39पुरुषार्थ में नहीं आता है।

3:41साक्षी भाव में रहना चाहिए।

3:43नहीं ये भी पुरुषार्थ में नहीं आता है, रहना चाहिए नहीं रहना होता है।

3:51रहना चाहिए नहीं रहना होता है।

3:53क्या? 5 इंद्रिय और मन के आधार बिना जो सहज साधना चले उसका नाम पुरुषार्थ है। उसमें करना या नहीं करना दोनों भी नहीं है। सिर्फ जानना देखना।

4:06लेकिन वो अनुभव के बाद सही समझ में आता है। अनुभव नहीं होता है तब तक तो कितना भी करें तो भी एक भाव तो रहता है कब दर्शन होंगे आत्मा के।

4:17एक भाव रहता है।

4:22सद्गुरु को रथ के सारथी बना दिए तो।

4:24वो बोलते हैं कि फिकर क्यों करते हो मैं दरवाजे पे खड़ा हूँ।

4:30संसार को आने नहीं दूँगा।

4:33तुम अंदर में आराम से ढूंढो कोई बात नहीं।

4:381 दिन 2 दिन 4 दिन।

4:39तुम प्रयास करो लेकिन दर्शन की अपेक्षा छोड़ दो।

4:42क्या जल्दी होवे ऐसा भी छोड़ दो।

4:46जब उसके ऊपर।

4:49जब उसके ऊपर छोड़ दो करके।

4:50सद्गुरु के अगर भक्ति आती है तो बहुत easy हो जाता है।

4:54भक्ति नहीं आती है तो बहुत तकलीफ में दिन गुजरते हैं।

4:59क्योंकि भरोसा नहीं होता है कि मिलेगा कि नहीं मिलेगा।

5:02और फिर तकलीफ इस बात की होती है कि।

5:06आत्मदर्शन के लिए संसार पहले छोड़ना पड़ता है।

5:09और।

5:09छोड़ने के बाद भी कभी-कभी आत्मदर्शन।

5:15छोड़ने के बाद भी कभी-कभी आत्मदर्शन होने में देर होती है। छोड़ना मतलब बाहर से नहीं छोड़ना है, अंदर से छोड़ना है। सारी दुनिया के प्रति जो लगाव है, जो आशाएं हैं, अपेक्षाएं हैं, इच्छाएं हैं, वासनाएं हैं, वो अभिप्राय में से निकलना पड़ता है कि मुझे आत्मदर्शन करना है। लेकिन दुकान का फिर क्या, घर का फिर क्या, बच्चों का फिर क्या, उसका क्या, इसका क्या, कोई कैसा।

5:44उसका क्या इसका क्या कोई कैसा बोलेगा तो वो ऐसा करेगा तो कोई क्या बोलेगा ये सब नहीं चलता है। चारों प्रतिबंध से अंदर से जीव मुक्त होवे तो ही कार्य होता है। इसमें समाज का दर्द अड़ोस पड़ोस का दर्द ये सब नहीं रहता है। जिसको जो बोलना है सब बोले। नहीं आप धर्म दूसरे धर्म में चले जाते हो तो जैन धर्म है तो ऐसा है हमारा ये धर्म है। हमारे uncle तो...

6:13हमारे uncle तो दूसरे धर्म का पालन करते हैं, पिताजी दूसरे धर्म के हैं, माताजी वो करते हैं, घर में सब विरोध करते हैं, ये सब नहीं चलता है।

6:22आत्म शांति के लिए तो समाज का, अड़ोस-पड़ोस का प्रतिबंध नहीं चलता है, और पारिवारिक प्रतिबंध भी नहीं चलते।

6:28कितना भी परिवार का मोह हो तो भी, आत्म शांति सबसे top में रहनी चाहिए।

6:35और शरीर का प्रतिबंध भी नहीं होना चाहिए।

6:39भी नहीं होना चाहिए।

6:42कि मैं वहां जाऊं लेकिन फिर वहां भूखा रहना पड़ेगा 1 घंटा तो।

6:47ऐसा हो जाएगा तो बैठने को नहीं हो रहा है तो फिर पैर दुखेंगे तो।

6:50ये सब पंचायत होते हैं वहां।

6:53शरीर में दर्द होते हैं किसी प्रकार के तो भी आलस होता है।

6:58तो नहीं नहीं आज नहीं जाएंगे आज सत्संग नहीं करेंगे।

7:01सत्संग में नहीं आए चलता है लेकिन आत्मशांति की भावना तो top पे रहनी चाहिए।

7:06और शरीर के प्रति...

7:08और शरीर के प्रतिबंध से भी वो रुकनी नहीं चाहिए।

7:12और संकल्प विकल्प होगा कि नहीं होगा, मिलेगा कि नहीं मिलेगा, कहीं ऐसा ना हो कि सारी दुनिया को तो हमने छोड़ दिया है।

7:18और फिर भी हमको आत्मा ना मिले तो?

7:21ऐसे भी बहुत से doubt जिसको संकल्प विकल्प बोलते हैं।

7:27ये चारों प्रतिबंध जिसको गए हैं और पूर्व के आराधक हैं।

7:32उनको जिनवाणी के श्रवण से भी अंदर की line...

7:35श्रवण से भी अंदर की line bill गाती है।

7:38जैसे पूज्य गुरुदेव जी को मिली।

7:41या फिर कृपालु देव को मिली।

7:44लेकिन generally तो क्या होता है।

7:474 प्रतिबंध तोड़ने के बाद भी आत्मशांति की saint प्रसन्न भावना होने के बाद भी।

7:53आत्मदर्शन नहीं होते।

7:56सिवाय सद्गुरु के।

7:59सद्गुरु के प्रत्यक्ष सानिध्य मिले शरण भाव होवे।

8:025वाँ प्रतिबंध जावे।

8:04पाँचवा प्रतिबंध जावे।

8:05सत्पुरुष सत्पुरुष ना लगे परमात्मा लगे।

8:09ऐसी स्थिति जब आवे,

8:11और सद्गुरु हमारे रथ के सारथी बन जावे।

8:14क्या?

8:14जहाँ ले जाना है जहाँ, जो जो होना है सो होने दो, मुझे आप पे पूरा विश्वास है।

8:21मुझे तो आप बोले वही काम करना है।

8:24आगे नहीं देखना है, पीछे नहीं देखना है, उल्टा-सुल्टा, negative, positive, कुछ नहीं सोचना।

8:34तो आत्मज्ञान हो सकता है सद्गुरु के भरोसे पे और अपने साधना के भरोसे पे।

8:40लेकिन वो तो पुरुषार्थ के पहले की बात है।

8:43आत्मज्ञान के पहले जो करना धरना छूटता है उसमें सबसे बड़ा role जो है वो सद्गुरु का है।

8:51सद्गुरु बोलते हैं कि काहे को चिंता करते हो छोड़ दो मेरे पे तुम करना धरना क्यों करते हो तुम सिर्फ देखो तुम सिर्फ देखो तुम सिर्फ।

8:59तुम सिर्फ देखो, तुम सिर्फ देखो, तुम सिर्फ देखो।

9:04ये जानना, जानना, जानना, जानना है और करना और नहीं करना दोनों भी नहीं करना है।

9:08और आत्मदर्शन के पहले ऐसा रहना है, ये जरा difficult तो है।

9:12आत्मदर्शन के बाद तो मालूम पड़ जाता है कि भई हम कुछ कर सकते ही नहीं, आत्मा की कोई ताकत नहीं है, आत्मा बोल नहीं सकता, आत्मा सोच नहीं सकता, आत्मा क्रोधादि भाव नहीं कर सकता, आत्मा रोटी नहीं बना सकता, आत्मा note नहीं गिन सकता, आत्मा...

9:27आत्मा note नहीं गिन सकता, आत्मा उठ नहीं सकता, बैठ नहीं सकता।

9:30क्या होगा?

9:34आत्मा क्या है वो तो आत्मज्ञान के बाद मालूम पड़ता है। इसके पहले कैसे? तो आत्मज्ञान होने के बाद वो वो problem नहीं आते हैं। पुरुषार्थ सहज चलता है क्योंकि ज्ञान सही है। लेकिन इसके पहले? इसके पहले बहुत परेशानी है। अभी भी मुझे गुस्सा आ रहा है, अभी भी मुझे ऐसे विचार आ रहे हैं, ऐसे विचार नहीं करना चाहिए।

9:55ऐसे विचार नहीं करना चाहिए।

9:57हमारी भावना में कमी है, घड़ी में परिणाम अच्छे, घड़ी में परिणाम डगमग जाते हैं।

10:05इसका मतलब हमारा पुरुषार्थ सही नहीं है क्योंकि हमको आत्मज्ञान नहीं है।

10:12आत्मज्ञान के पहले की जो स्थिति है, उसमें तो अगर सद्गुरु को आपके रथ का सारथी बनाओगे तो करना धरना मिट जाएगा और जानने देखने का पुरुषार्थ चालू रहेगा।

10:20वहाँ external force है एक।

10:23Force है।

10:24आत्मज्ञान के पहले।

10:27आत्मज्ञान के बाद ऐसा नहीं, आत्मज्ञान के बाद तो पता है कि मेरा क्या functioning है।

10:34मैं आत्मा हूँ, मेरा क्या functioning है।

10:38वो उसको पता है तो व्यर्थ का problem नहीं है कुछ।

10:42यहाँ जो प्रश्न है वो ये है कि आत्मज्ञान होने के बाद।

10:46किस प्रकार आत्मा अपनी ओर पुरुषार्थ की वृद्धि करने का प्रयोग करता है।

10:51आत्म...

10:53आत्मज्ञान हो गया तो क्या ज़रूरत है प्रोत्साहन करने की?

10:58आत्मज्ञान होने के बाद भी प्रोत्साहन करने की ज़रूरत है, क्यों?

11:03के जो एक समय में झलक देखी है आत्मा की, और कितने खजाने देखे हैं अंदर में?

11:08कितनी संपत्ति है?

11:11के हम अनंत काल तक भोगे ना, तो भी हम खत्म नहीं होवे, इतनी संपत्ति उसके अंदर है।

11:17लेकिन क्या करें?

11:20लेकिन क्या करें दरवाजा खुला और automatic बंद भी हो गए वापस देखने से अनंत शांति मिले अनंत अनंत अनंत शांति मिले देखने से लेकिन दरवाजा बंद हो गया अभी दर्शन नहीं है अब अब काहे के लिए पुरसाद करना है मिला तो थोड़ा 1 second के दर्शन में कितना मिला लेकिन अंदर कितना।

11:47लेकिन अंदर कितना देखा?

11:50बहुत।

11:52₹1,00,00,000 हमारे bank में हो लेकिन एक check में आप ₹100 से ज़्यादा नहीं उठा सकते।

12:00अब क्या हो गया हाल?

12:00और एक check ख़त्म होने के बाद दूसरा check के लिए application करो बाद में मिलेगा।

12:08line में खड़े रहो।

12:09बाद में फिर दूसरा check लेना तब वापिस पैसे आपके हैं।

12:15लेना तब वापस पैसे आपके हैं।

12:17पैसे आपके ही हैं।

12:19लेकिन क्या करें ऐसी terms में policy में savings account में नहीं डाला है।

12:25savings में भी problem है 4 वखत ही उठा सकते हैं monthly।

12:29कितने ही पैसे हो।

12:30और उसमें भी अगर वो limitation आ जाए तो।

12:36कि ₹100 से ज्यादा नहीं उठा सकते तो।

12:40करोड़ रुपया अंदर bank में है लेकिन नहीं उठा।

12:43₹1000 अंदर bank में है लेकिन नहीं उठा सकता।

12:48तो।

12:50वो रह नहीं सकता है आत्मा।

12:52सारा संसार फीका है एक एक दर्शन मात्र से मालूम पड़ जाएगा।

12:55क्या मालूम पड़ता है?

12:56प्रथम दर्शन से मालूम पड़ जाता है कि सारी दुनिया एक बाजू रखो।

13:02और मेरी आत्मा एक बाजू रखो।

13:04कैसे कैसे भिखारी मानता था मैं अपने आप।

13:08जिससे कोई value ही नहीं थी।

13:11छोटी छोटी।

13:11नहीं थी।

13:13छोटी-छोटी चीज़ के लिए भीख मांग लेता था दुनिया वालों के साथ।

13:17इतनी सारी अपेक्षाएं।

13:20लेकिन दर्शन होते ही सारी अपेक्षाएं खत्म।

13:25चक्रवर्ती की संपदा और इंद्रसरी के भोग काग विट सम गिनत है सम्यक दृष्टि लो।

13:33देखो सुपार्श्वदेव कहते थे ये ये दुनिया पूरी सोने की हो जाए तो भी...

13:39तो भी हमारे लिए घास के तिनके के बराबर है।

13:43नहीं चाहिए हमको ये दुनिया।

13:46क्योंकि एक अंश भी तो हमारा नहीं है।

13:49बेकार का बोझा कौन संभाले?

13:50ये जाओ आज से ये पूरा Hyderabad आपका है।

13:54यहाँ अगर सही में अपने को दे दिए ना तो कितनी पंचायत है मालूम है?

13:58अगर अपने को Hyderabad दे दिए तो कितनी पंचायत हो जाती?

14:02साहब यहाँ gutter खुली है वो बंद करा दो उधर वो करा दो इधर...

14:07लिए वो बंद करा दो उधर वो करा दो इधर ये करा दो उधर वो करा दो रोज telephone अपने को नींद नहीं आती।

14:12लाइन एक ना एक application file के ढेर हो जाते हैं इतना।

14:17साहब यहाँ ये गड़बड़ है वो है संभालो आप लोग संभालो।

14:20अगर हमको यहाँ का Hyderabad का सेठ बना दिया तो परेशानी हो जाएगी।

14:25एक घर को नहीं संभाल सकते।

14:30एक building को नहीं संभाल सकते पूरे Hyderabad को कैसे संभालोगे?

14:37और पूरी दुनिया को कैसे संभालोगे?

14:38ज्ञानी के पास कोई फुर्सत नहीं है।

14:41नहीं चाहिए, दुनिया नहीं चाहिए हमारी।

14:44मुफ़्त में भी नहीं चाहिए।

14:45हम हमारा शरीर का भी ध्यान रखना नहीं चाहते हैं।

14:49क्योंकि इतना हम उपयोग लगावे हमारा ही waste है।

14:51शरीर के पीछे अगर हमारा उपयोग लगाया तो हमारा time बर्बाद है, क्या मिलने वाला है?

14:56आखिर तो छूटने वाला है नहीं body।

14:59फिर कर के आखिर सब zero हो जाए।

15:03कर के आखिर सब zero हो जाए।

15:05पूरी दुनिया भागों में दौड़ कर के आखिर में।

15:08सांस छूटे तो सब zero हो जाए वापस।

15:11ऐसी बेकार की मेहनत फालतू की मेहनत ज्ञानी पुरुष नहीं करते।

15:17इसलिए चक्रवर्ती की संपदा और इंद्रसनि के भोग।

15:21काग बीट सब गिनत हैं।

15:23सम्यक दृष्टि लो।

15:25जिसको आत्मदर्शन पहली दफे हो गया है first time हुआ है 1 second के लिए हुआ है।

15:31First time हुआ है, एक second के लिए हुआ है।

15:36इस दुनिया में से जितनी भी अपेक्षाएं हैं, आशाएं हैं, सब खत्म हो जाती हैं।

15:40ये अज्ञानता से आशा रखा है इस जीव ने, कुछ मिलेगा, कुछ मिलेगा, कुछ मिलेगा।

15:45लेकिन हराम बराबर आज तक कुछ मिला नहीं।

15:48ना भविष्य में कभी मिलने वाला है।

15:50ज्ञानी पुरुष कहते हैं एक देला भी मिलने वाला नहीं है, कितना भी करो।

15:55लेकिन ये अज्ञानता के कारण, ये मूर्खता...

15:59ये अज्ञानता के कारण ये मूर्ख जीव।

16:03नहीं अभी और प्रयास करूँ, अभी और प्रयास करूँ, शायद मिल जाएगा, शायद मिल जाएगा।

16:09ऐसा करके सुख के लिए।

16:12पराधीन हो करके उधर भागम दौड़ करता है।

16:18भव वन में जी भर घूम चुका।

16:21कण कण को जी भर भर देखा।

16:23मृग सम मृग तृष्णा के पीछे।

16:26मुझको न मिली।

16:28मुझको न मिली सुख की रेखा।

16:31झूठे जग के सपने सारे।

16:34झूठी मन की सब आशाएं।

16:37तन जीवन यौवन अस्थिर है।

16:40क्षणभंगुर पल में मुरझावे।

16:43हे जीवन तो ऐसा है।

16:45पानी का बुलबुला है।

16:50कब क्या हो जावे पता नहीं चले।

16:58ऐसे असार संसार को ज्ञानी चाहते हैं।

17:00क्योंकि शरीर भी अपना भिन्न है, उसका भी करना नहीं चाहते हैं।

17:04अरे, आत्मदर्शन हुआ तो पता चला ये रहा, मन भी मेरे से अलग है।

17:09मैं उसकी भी चिंता क्यों करूँ कि ये कौन सा भाव करता है, कौन सा भाव करे तो अच्छा।

17:14कि उसको जो करना है करने दो, मेरा तो वो चीज़ नहीं हुआ।

17:19ये भाव करना है और ये भाव नहीं करना है, ये पंचायत भी गई।

17:25आत्मदर्शन करना है, आत्मा का आनंद चाहिए, वो बात भी गई।

17:28क्योंकि वो आता है क्षण भर के लिए, वापस चले जाता है।

17:32उसकी भी क्या value है?

17:34वो भी मेरी चीज़ नहीं।

17:37अवस्था में जो क्षणभंगुर शांति मिले, वो भी चीज़ मेरी नहीं।

17:42शाश्वत रहे वो मेरी चीज़।

17:45कभी खत्म ना होए वो मेरी चीज़।

17:48अपरिणामिक, परम परिणामिक ध्रुव...

17:51परिणामिक परम परिणामिक ध्रुव सत्ता में कारण परमात्मा वो मैं।

17:56समुंदर में नहर में नहीं।

17:59सूर्य में किरण में नहीं भले निकली वहां से।

18:03लेकिन मेरी।

18:05कितना सब अपेक्षाएं छूट जाती हैं।

18:10सारी दुनिया की अपेक्षाएं गई।

18:13मन की गई वचन की गई काया की गई गुरु की गई सबकी अपेक्षा गई।

18:19दर्शन होते ही।

18:19दर्शन होते ही अलग हो गया बिल्कुल अब निर्लेप हो गया आत्मदर्शन होते ही निर्लेप हो गया और इतना अंदर में से शांति मिली शांति क्यों मिली कि इतनी संपत्ति मेरे में है कि अनंत काल तक भी खर्च करें तो भी उतनी की उतनी रहने वाली है उसको depreciation ही नहीं है।

18:47नहीं है।

18:48Furniture एक नया लाओ या TV लाओ तो 10 साल में धीरे-धीरे करके उसकी value खत्म होती है।

18:55ये आत्म संपत्ति ऐसी है।

18:58ये सूरज सूरज के सूरज है उसमें depreciation लगता होगा कि नहीं लगता होगा?

19:03कभी तो एक दिन आएगा ना इतनी किरणें रोज चमकती हैं।

19:07बाहर फेंकता है तो कभी एक दिन आएगा तो किरण खत्म हो जाएगी प्रकाश खत्म हो जाएगा।

19:11उसको depreciation होता है कि नहीं होता है?

19:15होता है कि नहीं होता है? No depreciation. Well में से पानी आता है, बाहर निकालते हैं, कम हो जाता है। दूसरे दिन वापस वैसा का वैसा। क्या उसमें तो कम होता है ऐसा दिखाई देता है, अंदर तो कभी कम होता ही नहीं। आपकी ताकत चाहिए जितना निकालना है निकाल। अंदर खत्म नहीं होने वाला, कम भी नहीं होने वाला, रत्ती भर भी कम नहीं होता। Fixed deposit में थोड़ा।

19:44Fixed deposit में थोड़ा भी कम ज्यादा नहीं होता है।

19:48ब्याज में कम ज्यादा होता है, fixed deposit में कम नहीं होता है।

19:53Fixed deposit का ब्याज जो है इधर आ जाता है savings account में।

19:57उसमें आप कम ज्यादा कर लो जो करना है, उसको हाथ भी नहीं लगा सकते।

20:015 साल तक हाथ नहीं लगा सकते।

20:04छू भी नहीं सकते।

20:06क्योंकि वो fixed deposit है।

20:07ऐसे आत्मा है वो fixed deposit है।

20:09मैं ऐसा हूँ, अनंत संपत्ति है।

20:11पति है भीख मांगने की कोई जरूरत नहीं एक एक बाजू सारी दुनिया है और एक बाजू मेरी आत्मा अब मैं अकेले जी लूँगा मुझे किसी की परवाह नहीं है एक दर्शन मात्र से इतना बड़ा change आता है लेकिन अफसोस क्या अफसोस कि check में ₹100 से ज़्यादा लिख नहीं सकते और एक ही पन्ना check book कर देते हैं।

20:39एक check book कर देते हैं।

20:43दूसरा check के लिए वापस जाना पड़ता है bank वाले के।

20:48और अंदर में जिसने इतना बड़ा खजाना देख लिया है,

20:51वो दुनिया में कहाँ जाएगा शांति के लिए?

20:55उसको तो वापस यहीं आना पड़ेगा।

20:57क्योंकि ऐसी शांति जो अंदर में देखी है,

20:59वो world में और कहीं भी किसी जगह पे भी नहीं है।

21:02क्योंकि भगवान सामने विराजमान हो, उनकी वाणी इतनी अच्छी-अच्छी आ रही है कान में।

21:07वाणी इतनी अच्छी अच्छी आ रही है कान में तो भी वो शांति नहीं है जो हमने अंदर में देखी है जो अपने पास है जिसके मालिक हम हैं। भगवान की वाणी सुनना है तो भी कान का सहारा चाहिए भगवान को देखना है तो भी आँख चाहिए लेकिन इस भगवान को देखने के लिए उसकी शांति को पाने के लिए ना आँख चाहिए ना कान चाहिए।

21:36ना आँख चाहिए, ना कान चाहिए, ना नाक चाहिए, ना स्पर्श इंद्रिय चाहिए।

21:39कुछ नहीं चाहिए, मन भी नहीं चाहिए।

21:42सोचोगे तो उल्टा दूर हो जाओगे।

21:44दर्शन नहीं होंगे। मैं आत्मा, आत्मा, आत्मा ऐसा रटन करोगे तो आत्मा नहीं मिलेगा।

21:49याद करोगे तो भी नहीं मिलेगा।

21:51आत्मा कितना महिमा बनता है ऐसा thinking करोगे ना तो भी आत्मा नहीं मिलेगा। जितना करोगे उतना उलझोगे।

21:57और नहीं करोगे तो मिल जाएगा।

22:01कैसी चाबी है, दरवाजा कैसा है?

22:03ये दरवाजा कैसा है?

22:07अगर कि आत्मा पाने के लिए अगर 5 इंद्रिय में से किसी का सहारा लिया तो नहीं मिलेगा।

22:12भावना कितनी भी अच्छी हो।

22:14मन में अगर आत्मदर्शन के बारे में सोचा कब होगा कब होगा कब होगा।

22:19अभी बैठूं अभी और करूं अभी और जोर करूं।

22:22और अंदर में मैं आत्मा आत्मा आत्मा आत्मा धुन लगाऊं मिलेगा नहीं।

22:27क्यों क्यों नहीं मिलेगा मालूम है?

22:28क्योंकि ये रटन लगा है ना इसलिए नहीं मिलेगा भाई।

22:31रटन लगाए ना इसलिए नहीं मिले भाई नहीं तो मिल जाते क्या गलती हुई कि आत्मा को अपने दर्शन के लिए मन की जरूरत नहीं है और हमने क्या किया मन का सहारा लिया मतलब परमात्मा को देखने के लिए हम स्वयं परमात्मा और स्वयं को देखने के लिए हमको किसी secretary की चपरासी की जरूरत पड़ी।

22:59किसी secretary की चपरासी की ज़रूरत पड़ेगी भैया मैं direct कैसे मिलूँ तुम ज़रा मिला देना मेरे को।

23:11स्वयं परमात्मा बिना रोक टोक अपने घर में जा सकता है।

23:14कभी भी any moment जा सकता है।

23:16लेकिन मन को बोलता है कि नहीं मेरे को डर लगता है वो दर्शन नहीं देगा तो।

23:21request कर ना मेरी ज़रा उधर सिफ़ारिश लगा ना।

23:25और मन सोचता है कि।

23:28और मन सोचता है कि।

23:29प्रभु दर्शन दे दो ना इतना छटपटा रहे हैं प्रभु दर्शन दे दो ना इनको।

23:34क्या?

23:34और फिर।

23:34यही गड़बड़ है कि वो आत्मदर्शन नहीं हो पा रहा है।

23:41नहीं वो biscuit का आता है हक मांगो हक से मांगो।

23:47क्या?

23:47नहीं।

23:47नहीं आता है सुत्ती में आता है।

23:53मेरे को हंसी आती है कि क्या हक से मांगने की चीज है ये।

23:55ये कि क्या हक़ से मांगने की चीज़ है ये पराई चीज़।

23:58अपनी चीज़ तो हक़ से मांग नहीं सकते वहाँ तो भीख मांगते हो।

24:02ये दर्शन देना ये दर्शन देना।

24:04कौन कौन भीख मांगता है स्वयं परमात्मा ही।

24:06और किसके पास गिड़गिड़ाता है मन के पास।

24:10ज़रा सिफ़ारिश लगा मेरे पर।

24:12और ये अपने स्वरूप का अपमान करता है ना इसीलिए उसको आत्मदर्शन नहीं होता।

24:17इसीलिए पुरुषार्थ की वृद्धि करनी पड़ती है।

24:23इसीलिए फुर्सत की वृद्धि करनी पड़ती है आत्मज्ञानी को भी क्योंकि आत्मज्ञानी को ऐसा मन का सहारा लेना नहीं पड़ता है ये तो जिसको नहीं हुआ है वो लेता है।

24:32बात ये चल रही है कि आत्मज्ञानी को फिर फुर्सत करने की क्या जरूरत है?

24:37जरूरत ये है कि जितना अंदर में है उतना मिलता नहीं है ना।

24:41वो ऐसा है कि अंदर में जागते ही दरवाजा बंद हो जाता है।

24:45एक झलक पड़ते ही दरवाजा बंद हो जाता है।

24:48हम चाहते हैं कि wine देखते रहें देखते रहें लेकिन वो...

24:52देखते रहें देखते रहें लेकिन वो दरवाजा ही ऐसा है कुछ।

24:54इनके अंदर देखा नहीं कि बंद हो जाता।

24:57अब मिलता नहीं।

25:02अब कब दरवाजा खुलता है वो भी नहीं मालूम।

25:05दरवाजा हर वक्त खुला रहता है लेकिन हमारी आँख बंद हो जाती है।

25:09कैसे हो जाती है?

25:10Fault परमात्मा के दरवाजे में नहीं है।

25:13परमात्मा का दरवाजा कभी बंद होता ही नहीं।

25:16तो open ही रहता है।

25:16Fault कहाँ है?

25:18हमारी नज़र में।

25:19हमारे नज़र में पानी।

25:22देखते ही इतना ऐसा हो जाते हैं कि बंद हो जाता है।

25:26उसका तेज़ इतना है ज़बरदस्त।

25:28उसकी शांति की किरणें इतनी ज़बरदस्त एक साथ आ जाती हैं।

25:32Tube light को तो हम देख सकते हैं लेकिन search light को?

25:36देख सकते हैं? अंधे हो जाते हैं ऐसा देख के।

25:40सूरज को तो देख ही नहीं सकते।

25:42देख सकते हैं?

25:43सूरज को देख के बता दो थोड़ा।

25:48सूरज को देख के बता दो थोड़ा।

25:50नहीं देख सकते।

25:52ढलते हुए सूरज को शायद देख सको।

25:55लेकिन 12 बजे का जो सूरज है,

25:56full अपने power में है उसको देख के बता दो।

26:01Impossible।

26:01LED तो देख सकते हो लेकिन उसको नहीं देख सकते।

26:05ये 40 watt है उसमें कितना watt है?

26:08सूरज में कितने watt होंगे?

26:11और आत्मा में कितने watt हैं?

26:14अनंत volt है।

26:16अनंत vault है, अनंत vault।

26:18आप अगर झलक में अगर देखोगे तो आप bear नहीं कर पाओगे।

26:23आँखें बंद, आँखें चुंदिया जाएँगी।

26:25उसके शांति की अनंत किरणें जब आपको सामना हो जाएगा, आँखें ऐसे चुंदिया जाएँगी।

26:31परमात्मा है, कोई ordinary चीज़ नहीं है, दुनिया की सर्वश्रेष्ठ चीज़ है।

26:35पूरी दुनिया एक बाजू और अपना आत्मा एक बाजू, इतना बढ़िया है।

26:42लेकिन ये हम...

26:44लेकिन ये हमारे में capacity नहीं है उसका दरवाजा खुला है लेकिन हम जा नहीं सकते झटका लगता है।

26:50अंदर घुसते ही झटका लगते बाहर आते।

26:54देखो।

26:54कितने voltage है?

26:58अनंत voltage है।

27:01देखो।

27:02को ज़रूरत पड़ती है। ज्ञानी को प्रथम दर्शन के बाद बार-बार बार-बार उसको देखने की इच्छा होती है और उसके लिए पुरुषार्थ करना पड़ता है।

27:11और पुरुषार्थ में क्या है? करना नहीं, नहीं करना नहीं, ध्यान ना देखना, देखना ना देखना।

27:17बस ये प्रयोग चलते रहना चाहिए।

27:21किस प्रकार, अब वो पूछते हैं कि क्या करता है?

27:25वो पूछते हैं कि क्या करता है?

27:26एक बार दर्शन होने के बाद दोबारा दर्शन करने के लिए ज्ञानी पुरुष कैसा पुरसाध करते हैं?

27:32₹100 का check तो मिल गया लेकिन दूसरा अभी अनंत देख लिया अंदर में तो फिर ₹100 से कैसे काम चलेगा?

27:39जब करोड़ रुपये पड़े हैं तो क्यों ना बंगला लेवे?

27:42क्यों ना car लेवे?

27:44ऐसे सड़ जावे ऐसे तो अच्छा है ना भोग लेवे।

27:48लेकिन क्या करें ₹100 ही मिला।

27:51नहीं और भी चाहिए।

27:53नहीं और भी चाहिए।

27:54घड़ी घड़ी line में खड़े रहता है, घड़ी घड़ी check book लेता है, घड़ी घड़ी डालता है।

28:02नजर वहीं पड़ी है।

28:04अब नौकरी थोड़ी करेगा किधर?

28:07₹1,00,00,000 देख लिया अपने में फिर नौकरी थोड़ी करेगा?

28:10गुलामगिरी थोड़ी करेगा?

28:11अब कहाँ जाएगा सुख होने का?

28:13सुख तो हर वक्त चाहिए और फिर क्या करेगा हर वक्त queue में लगे रहेगा अंदर।

28:16और वो बार-बार प्रयास करते रहेगा।

28:20ये ये।

28:22ये ये ये और लेकिन कैसे करता है? कैसे वो queue में खड़े रहता है, कैसे वो check बनाता है, कैसे क्या करता है, वो बताइए। ये प्रश्न है यहाँ। किस प्रकार आत्मा अपनी ओर पुरुषार्थ की वृद्धि करने का प्रयोग करता है? आपके इस प्रश्न पर मेरा तो इतना ही लिखना है कि प्रथम की यथार्थ श्रद्धा के समय।

28:51पहले तो first time जब दर्शन होते हैं तब श्रद्धा पलटती है तब ज्ञान आचरण उसके ऊपर dependence नहीं है श्रद्धा बदलनी चाहिए।

29:00अगर मैं आत्मा ऐसा हूँ करने धरने वाला नहीं हूँ ऐसे सब जान लिया PhD कर लिया जो ना आत्मा के ऊपर पूरे शास्त्र पढ़ कर के ज्ञानियों की वाणी पढ़ कर के सब बुद्धि में अच्छी तरह से आ गया तो भी आत्मा के दर्शन नहीं होता है।

29:14क्यों नहीं होता है?

29:17कि आत्मा की जानकारी 100% सच्ची होने पर भी आत्मा के दर्शन नहीं हो सकते।

29:22क्योंकि श्रद्धा में आना चाहिए।

29:26जानना एक बात है और मानना एक बात है।

29:29जानते हैं लेकिन मानते नहीं हैं।

29:31क्या?

29:32जानने के साथ मानना।

29:34तो कार्य हो गए।

29:37इसीलिए बड़े-बड़े विद्वानों को भी आत्मज्ञान नहीं होता है जानकारी होने पर भी।

29:45होता है जानकारी होने पर। क्योंकि मानते नहीं।

29:51क्या होता है मानने और जानने में क्या फर्क? जानते तो वही हैं कि मैं शरीर से भिन्न, राग से भिन्न, मैं भगवान आत्मा हूँ।

30:00मैं भी भगवान से कम नहीं हूँ, मैं स्वयं भगवान हूँ, ऐसा जानते हैं।

30:04वचनों में आता है।

30:04हाँ?

30:05वचनों में आता है, तन में नहीं आता।

30:06नहीं, लेकिन फर्क क्या है? क्यों ऐसा होता है?

30:09ऐसा क्यों होता है?

30:10कि वचन में तो सब बराबर हैं।

30:13के वचन में तो सब बराबर है।

30:16पूरी दुनिया को समझा सकता है कि भगवान आत्मा कैसा है।

30:20लेकिन फिर भी आत्मज्ञान नहीं होता है क्योंकि वो मानता नहीं है ऐसा।

30:26क्या difference है?

30:29के मानता मानेगा ना जब तब मैं देवचंद भाई हूँ वो नहीं रहेगा।

30:35मैं किसी का पिता, किसी का भाई, किसी का बेटा, मेरा मकान ये नहीं रहेगा।

30:39जब मानेगा तो वैसा होगा।

30:40लेकिन...

30:42लेकिन देखो जानते हैं तब हमारा सब रहता है।

30:44मैं देवचंद भाई हूँ मैं जान रहा हूँ मुझे मालूम है आत्मा क्या चीज़ है।

30:48यही फर्क हो गया।

30:51ज्ञानी में और विद्वान में क्या फर्क है?

30:55ज्ञानी जैसे आत्मा का बयान करते हैं वैसा ही बात सुनने के बाद दोबारा विद्वान भी ऐसा ही बोल सकता है।

31:01कि आत्मा ऐसा है।

31:02ज्ञानी ने जो आत्मा के बारे में इतने बड़े-बड़े thesis लिखी है अपने अनुभव...

31:09बड़े-बड़े thesis लिखी है अपने अनुभव से।

31:10अगर विद्वान पढ़ लेता है तो विद्वान को भी लिखना आ जाता है और पढ़ना बोलना सब आ जाता है।

31:16ये फर्क क्या हो गया है दोनों में?

31:20कि वो आत्मा के बारे में बोलते हैं कि मैं भगवान आत्मा हूँ, मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूँ बोलते तो हैं।

31:26लेकिन मानते नहीं हैं क्यों?

31:28कि साथ में मानते हैं कि मैं हुकमचंद बारी हूँ।

31:31अब मैंने ये बनाई है कविता।

31:32अब कितनी famous हो गई कविता।

31:35मैं ज्ञानानंद।

31:37Famous हो गई कविता मैं ज्ञानानंद स्वभावी हूँ किसने बनाई ये कविता? किसका हुकमचंद बारे? तो आप कौन हो हुकमचंद बारे? व्यवहार से निश्चय से मैं हूँ भगवान आत्मा। वापस आ जाएगा problem। निश्चय से मैं भगवान आत्मा हूँ व्यवहार से तो मैं हुकमचंद बारे हूँ। अब दुनिया वाले को तो बोलना ही पड़ेगा ना व्यवहार की भाषा में किसने बनाई मैं।

32:05व्यवहार की भाषा में किसने बनाई मैं ज्ञान स्वभाव ही हूँ हुकमचंद बारिल ने बनाई।

32:09तो व्यवहार से तो कह सकते हैं कि हाँ कह सकते हैं।

32:14और निश्चय से निश्चय से मैं भगवान आत्मा हूँ।

32:18ये भगवान आत्मा बोलने के लिए निश्चय में का सहारा लेना पड़ता है।

32:22क्या नयों के सहारे के बिना नहीं देख सकते नहीं अनुभव कर सकते क्या?

32:29जिस दिन आप मानोगे कि मैं भगवान आत्मा हूँ उस दिन।

32:33कि मैं भगवान आत्मा हूँ उस दिन मैं हुकमचंद बारेल खत्म हो गया हमेशा के लिए। ये मेरी कविता खत्म, मेरा शरीर, मेरा बोलना, मेरा लिखना खत्म। मेरा मकान, मेरी body, मेरा राग, मेरे द्वेष खत्म सब। क्योंकि मैं परमात्मा हूँ और परमात्मा ऐसा कुछ काम नहीं कर सकता है। ना बोल सकता है, ना लिख सकता है, ना सुन सकता है, ना देख सकता है। ये सब काम आँखों का, कान...

33:01ये सब काम आँखों का कान का है।

33:02परमात्मा तो सिर्फ जान सकता है, मान सकता है, अनुभव कर सकता है।

33:07ज्ञान, दर्शन, चारित्र, शांति से रह सकता है, सुख।

33:12उसको किसी की dependence नहीं है, किसी की ज़रूरत नहीं है।

33:18इसलिए जब मैं भगवान आत्मा हूँ ऐसा मानेगा कोई जीव,

33:22तो फिर कहेगा कि कहीं अन्यते परमाणु मात्र।

33:27मारूँ न।

33:30मारू नथी जरिए अरे एक परमाणु भी मेरा नहीं।

33:32फिर वो ऐसा बोलेगा।

33:33क्या?

33:33कि सो करिए।

33:36एक सूखा घास ना कणखला ना बे टुकड़ा करवाने पर हमें समर्थ ना।

33:43क्या बोलेंगे ज्ञानी क्या बोलेंगे?

33:45ने हम तो इतने लोगों को समझा सकते हैं ना इतना बड़ा lecture झाड़ सकते हैं।

33:52इतना बड़ी कहानी लिख सकते हैं इतना बड़ा thesis लिख सकते हैं हमारे पास इतना।

33:57इतना बड़ा thesis लिख सकते हैं हमारे पास इतना ज्ञान है इतने लोगों को समझा देंगे।

34:03मैं समझा नहीं सकता किसी को।

34:07एक सूखे घास के तिनके के दो टुकड़े करने की सामर्थ्य मेरे में नहीं है। ये कौन बोलता है?

34:12जिसने आत्मा हूँ ऐसा माना है।

34:15और जिसने माना है उसने जाना भी है।

34:20क्योंकि जान के ही मानना होता है। बिना देखे बिना जाने...

34:25देखे बिना जाने बिना पहचाने मानना कैसे होगा?

34:28लेकिन value जानने की नहीं है, value पहचानने की नहीं है, value उससे ज्यादा मानने की है।

34:34और जब मानता है तब एक शरीर का एक रजकण भी मेरा नहीं है।

34:38मन में जितने भाव आते हैं वो मेरे नहीं हैं, ये सब पक्का हो जाता है।

34:43देखो, ये मानने में और जानने में फर्क है।

34:47तो प्रथम की यथार्थ श्रद्धा समझ।

34:53प्रथम की यथार्थ श्रद्धा समय श्रद्धा की पर्याय का अखंड की ओर जो झुकाव अथवा लीनता का पुरुषार्थ होता है उसमें काल भेद नहीं है।

35:02प्रथम बार जो उपयोग अंदर जाता है दृष्टि अंदर पड़ती है और लीनता होती है वह जानना होता है उसमें कोई काल भेद नहीं है कि पहले जाना बाद में माना ऐसा नहीं जिस वक्त जाना इसी वक्त ही माना।

35:21वखत ही मानो।

35:23कोई कालभेद नहीं।

35:27वो यथार्थ श्रद्धा में जो पुरुषात का प्रयोग है, बारंबार उसी प्रयोग की वृद्धि होती रहती है।

35:31जो कालभेद नहीं है, जानना, मानना अलग-अलग नहीं है, उसी moment में जानना, उसी moment में मानना।

35:38उसी moment में आत्मा के दरवाजे में घुस जाना, देख लेना।

35:43झलक देख लेना।

35:44तीनों एक साथ, दर्शन, ज्ञान, चारु।

35:48तीनों एक साथ।

35:50तीनों एक साथ।

35:52प्रथम बार ऐसा हुआ।

35:52दूसरी बार भी ऐसा, तीसरी बार भी ऐसा, चौथी बार भी ऐसा।

35:57ये पुरुषार्थ की वृद्धि है।

35:59कोई फर्क नहीं है पहले में और अब में।

36:01जो first time किया था वही second time करेगा, वही third time करेगा, वो fifth time करेगा, वही ऐसे ही करते करते करते करते वो।

36:09अब क्या करें? आत्मज्ञान के बाद क्या करें?

36:12अब तो शांति से picture देखने दो।

36:14अब तो दुकान में चलने दो।

36:17चलने दो ना 6 महीने से घर नहीं देखा दुकान नहीं देखा शरीर नहीं देखा picture देखने नहीं गए party में नहीं गए अब तो हो गया ना certificate मिल गया आपका अब तो कहीं भी जा सकते हैं ना अब तो free हो गए ना भैया अब तो पाबंदी नहीं है ना कुछ जाओ भटको फिर नहीं आत्मज्ञान होने के बाद ऐसा दिन भी नहीं होगा कि अब मैं ये कर लूँगा अभी relax हो गया अब मैं ऐसा करूँगा।

36:45मैं ही कर लूँ अभी relax हो गया मैं ऐसा करूँ वैसा करूँ।

36:47किसी किसी को हो जाता है लेकिन अशुद्धि भावों की होने से उसको बोलते नहीं है कि आत्मज्ञान हो गया है क्यों?

36:53क्योंकि अशुद्धि पड़ी हुई है अंदर।

36:57जल्दी से certificate मिले और हाँ बोले कि मैं ऐसा करूँ मैं वैसा करूँ।

37:02और ढेर सारी संसार की planning।

37:05परंतु क्या?

37:07आजाद पंछी हो जाता है।

37:08क्या वो अपेक्षा से आत्मज्ञान हो जाता है?

37:10नहीं होता है कमी रह जाती है।

37:11कमी नहीं रह जाती।

37:12अशुद्धि...

37:13कमी नहीं।

37:15अशुद्धि के कारण रुका हुआ है मन।

37:17वो अशुद्धि निकल गई तो line clear।

37:19अशुद्धि निकले इतनी देर।

37:20फिर खुद को विश्वास आ जाएगा कि मेरे को हो गया।

37:23कोई हाँ बोले ना बोले तो भी।

37:25खुद को विश्वास आ जाएगा कि मेरे को।

37:27अंदर की शुद्धि ही अपने को जवाब दे देती है।

37:30ये तो क्या है मन पवित्र नहीं।

37:32आत्मज्ञान हो जाए तो मैं ऐसा करूँगा वैसा करूँगा ये आगे।

37:36इसीलिए रुका हुआ है आत्मज्ञान।

37:37आत्मज्ञान रुकने का यही कारण है।

37:41आत्मज्ञान रुकने का यही कारण है।

37:43अशुद्धि है मन चित्त।

37:45चित्त में मलिनता पड़ी हुई है।

37:46अगर होगा ना तो भी उपशम होकर के वापस गिर जाएगा।

37:50ऐसी अशुद्धि वाला टिकेगा नहीं आत्मज्ञान होने के बाद भी।

37:54अगर हो भी गया है तो भी गिर जाता है इसका कारण क्या है?

37:58चित्त की अशुद्धि।

38:00उपशम में क्या होता है?

38:01उपशम में जो कचरा है ना जो मिट्टी के घड़े में कचरा रहता है फटकड़ी डालो।

38:07तो क्या होता है वो कचरा...

38:10क्या होता है वो कचरा नीचे बैठ जाता है।

38:13ये कचरा नीचे बैठ जाना लेकिन बाहर नहीं निकला है।

38:17कचरा नीचे बैठ गया है उसका नाम है उपसम।

38:21थोड़े संयोग गड़बड़ करेंगे कि वापिस ऐसा ऐसा हो घड़े को हिलाओ।

38:25क्या क्या होगा?

38:28वापिस मिट्टी भरा हो जाए अब पीने के काम में नहीं आएगा।

38:34वापिस दोबारा फटकनी डालना पड़ेगा।

38:39क्या? फिर बाद में सब नीचे बैठ जाए वापस, तब जाकर के पी सकूँ।

38:46देखो, इसका नाम उपसम है। चित्त की अशुद्धि रह गई अगर, तो गिरने में देर नहीं लगेगी। क्योंकि उपसम सम्यक दर्शन है, हुआ और second में निकल जाएगा। कभी भी, या विचलित हो जाओगे, ऐसे कोई भयंकर पहाड़ आएगी ना, तूफ़ान आएगी, शरीर में बहुत बड़ी व्याधि आ जाएगी। या कुसम होगा, या कोई...

39:05प्रसंग होगा या कोई ऐसे प्रसंग बने अतिशय क्रोध आ गया ऐसा कुछ भी होगा।

39:09फौरन हिल जाएगा मटका।

39:13जो दोस्त दब गए थे बाहर नहीं निकले थे वापस आ जाएंगे।

39:18खत्म समय दस।

39:19और 5 का हाथ दिए थे वही।

39:21क्रोध आते समय वो अपने में रहे।

39:25हां।

39:25क्रोध आते समय कि वो अपनी आत्मा का अनुभव करता रहे।

39:28हां।

39:28उसके लगते रहे उसे।

39:29कि ये जो क्रोध आ रहा है वो मेरे में नहीं।

39:33ये जो problem आ गया वो मेरे पे नहीं है।

39:36अब तो जागृत रहेगा तो ना, जागृत नहीं रहता है तो हिल जाता है।

39:38जागृत रहा तो तो क्या कोई problem नहीं है।

39:42बड़े से बड़ा चोर भी आपके room में light चालू है, और आप जाग रहे हो, कोई नहीं घुसेगा आपके room में, घर के अंदर।

39:50सो जाओगे तो आएंगे।

39:52आप जागे हैं तो कोई नहीं आएगा घर के अंदर।

39:55जागृत है तो भई सवाल क्या है?

39:58लेकिन गिरने वाला जागृत नहीं होता है।

40:01गिरने वाला जागृत नहीं होता है जब भी गिरता है तो वो जागृत नहीं होता है तभी तो गिरता है इसीलिए उपसम समय दर्शन वाले को ये problem आता है उसका कारण क्या है कि भावना में foundation जो है ना base है ना पवित्र नहीं है कभी भी इस दुनिया का अंश मात्र भी सुख मुझे नहीं चाहिए कभी भी नहीं चाहिए अनंत काल तक नहीं चाहिए मुझे इतनी।

40:30इतनी लात मारना है।

40:31इतना चित्त को शुद्ध करना है।

40:34फिर परमात्मा आपके दर्शन देगा तो कभी जाएगा नहीं आपके।

40:37चित्त की इतनी शुद्धि हो जाए फिर गिरना नहीं हो सकता।

40:42कहते हैं इधर।

40:47कि श्रद्धा की पर्याय का अखंड की ओर जो झुकाव अथवा लीनता का पुरुषार्थ होता है।

40:53उसमें काल भेद नहीं है।

40:55वो यथार्थ श्रद्धा में।

40:57वो यथार्थ श्रद्धा में जो पुरुषार्थ का प्रयोग है।

41:01श्रद्धा क्या?

41:04कि एक भी अवस्था को मैं आगे पीछे कर नहीं सकता हूँ।

41:06हैं तो मैं भगवान।

41:07लेकिन कैसा भगवान? उठापटक करूँ ऐसा भगवान?

41:12हेराफेरी करूँ, रोटी बना दूँ, ऐसा भगवान?

41:16कुछ करूँ ऐसा भगवान?

41:19कुछ लिख सकूँ ऐसा भगवान?

41:20हाथ को हिला सकता हूँ ऐसा भगवान?

41:24हैं ऐसे भगवान कहीं?

41:25ऐसे ही भगवान नहीं हूँ।

41:28राग द्वेष को बंद कर सकूँ ऐसा भगवान हूँ? नहीं।

41:30राग द्वेष करने वाला भी भगवान नहीं हूँ और राग द्वेष को होते हैं तो बंद करूँ ऐसा भी मैं भगवान नहीं हूँ।

41:37सबको जानने वाला हूँ।

41:38सबको जानने वाला भगवान हूँ।

41:42और वो जानने की अवस्था से भी मैं पार हूँ।

41:45वो भी मेरी नहीं है।

41:47वो तो किरण है एक।

41:48ऐसा मैं भगवान हूँ, ऐसा ऐसा समझ में आना चाहिए कि आत्मा ऐसा है।

41:51प्रथम...

41:54प्रथम जब उसको अनुभव होता है तब तो वो मान ही लेता है कि वो सिर्फ जानने वाला।

41:59फिर उसके बाद में जो उसकी जानने की मतलब वो बोल रहे हैं कि काल भेद जो हो रहा है वो विकल्प से जान रहा है तो उसका कारण क्या होगा क्योंकि वो स्वयं अनुभव तो कर लिया है कि वो मान चुका है।

42:12लेकिन वो आचरण में काल भेद आ गया ना वापस आचरण में।

42:16आचरण में gap पड़ गया।

42:17क्योंकि एक ही check था ओसो।

42:21एक ही check था वो ₹100 से ज्यादा नहीं ले सकते तो ₹100 लेने गया।

42:24दूसरा और देखा देखा तो इतना सारा लेकिन दोबारा लेना है तो।

42:28वापिस check book लेके आ।

42:29वापिस मिलेगा तो कितना मिलेगा?

42:32नहीं नहीं ₹200 चाहिए कम से कम ₹200 तो दो permission लेके आ manager को।

42:39permission लेके आ गया मैंने ठीक है आज से ₹200 लेना भैया से।

42:44क्या?

42:44application देना वो formality पूरी करना।

42:49औपचारिकता पूरी करना पूरी। उसमें time जाता है। फिर जा करके अब से मिलता है कितना? at a time ₹200। ऐसे धीरे-धीरे बढ़ता है।

42:56मतलब केवल श्रद्धा का यहाँ पर तो नहीं...

42:58श्रद्धा तो हो गई कि मैं परमात्मा हूँ। मान लिया। जो विद्वान नहीं मान सकते वो काम भी उसने कर लिया। लेकिन अब problem किसका आया?

43:05delivery लेने का problem आया। delivery लेने में तकलीफ होती है। अनंत शांति देखिए लेकिन अनंत शांति एक साथ मिले इसके पास बर्तन भी नहीं है इतना बड़ा।

43:17ले इसके पास बर्तन भी नहीं है इतना बड़ा।

43:18कैसे रखेगा?

43:20ऐसी आँख नहीं है कि वो इसको तेज को देख सके, bear कर सके।

43:24लगता है कि भर कर नहीं पीये, ताश नहीं जीये।

43:29हाँ तो फिर जाता है ना दोबारा check लेने के लिए। अब तो जाएगा किधर?

43:33अब तो फँस गया, अब तो किधर जाएगा ही नहीं।

43:36जो चीज़ यहाँ मिलती है वो कहीं नहीं मिलती है।

43:39अब तो ऐसा फँसा है।

43:40अब तो भगवान के पास जाऊँगा और वहाँ मिलेगा, ये बात भी कहाँ रही?

43:45मिलेगा ये बात भी कहाँ रही?

43:46सद्गुरु के पास जाऊँगा तो सद्गुरु की कृपा होगी तो मिलेगा ऐसा भी बात कहाँ रहा?

43:51अब सद्गुरु का काम role खत्म हो गया।

43:55फिर तो...

43:55हं?

43:58गुरु में नहीं जाएगा और गुरु पर भी नहीं जाएगा तो फिर तो उसको meeting कुछ नहीं मिलेगा।

44:03फिर गुरु के पास जो जाता है वो स्थिरता बढ़ाने के लिए जाता है।

44:06गुरु के पास जो बाद में जाता है ज्ञानी पुरुष को किस लिए जाता है?

44:11अंदर आता है।

44:14कि अंदर आत्मा में जा नहीं सकता है।

44:15और बाहर में जाता है तो संसार है।

44:18ठीक है ना? और संसार में रहेगा तो कुसंग हो जाएगा।

44:21और गुरु के साथ रहेगा तो सत्संग होगा।

44:24संसार में तो कोई आत्मा की महिमा करने वाला नहीं है, जबकि सद्गुरु आत्मा की महिमा करते हैं।

44:29जो वास्तव में मेरी महिमा करते हैं।

44:32तो फिर दोनों संग में उसको कौन सा अच्छा लगेगा?

44:36इसीलिए वो better choice की दृष्टि से जाता है।

44:41की दृष्टि से जाता है।

44:45हम्म।

44:45अच्छा आत्मा की महिमा कर रहे हैं तो आत्मा में ही जाएगा।

44:49यहाँ पे सौभाग भाई की भक्ति में कमी है।

44:54नहीं ये आप सौभाग भाई का नहीं चल रहा है अभी।

44:57ये सोगाणी जी का चल रहा है।

45:00और सोगाणी जी को ये प्रश्न पूछा गया है कि ज्ञानी किस प्रकार से वृद्धि का प्रयत्न करते हैं।

45:04एक बार जिसको आत्मज्ञान हो गया है वो बार-बार कैसे आगे बढ़ता है?

45:08क्योंकि ज्ञानी...

45:09करता है।

45:10क्योंकि ज्ञानी बन गया है बात ठीक है लेकिन परमात्मा तो नहीं बना है।

45:15परमात्मा नहीं बना है तो वो परमात्मा कब बनेगा अब?

45:20कब पहुंचेगा?

45:21कब उसको वो शांति पूरी की पूरी मिलेगी?

45:24कब इसमें ऐसी capacity होगी कि अनंत तेज को वो अच्छी तरह से देख सके जैसे हम tube light को देखते हैं ऐसे सूरज को भी हम देख सकें ऐसी capacity कब पैदा होगी?

45:33अंदर में।

45:37अंदर में वृद्धि होगी तो होगा, capacity बढ़ेगी तो होगा।

45:41नहीं तो देखते ही दरवाजा बंद हो जाता है। दरवाजा दरवाजा परमात्मा का दरवाजा बंद नहीं होता है।

45:48हमारा ही दरवाजा बंद रहता है ये।

45:51कि हम देख नहीं पाते।

45:54और दरवाजा कम से कम 2 second के लिए, 3 second के लिए, 4 second के लिए, 1 minute के लिए, 5 minute के लिए खुला का खुला रहे, तब कम से कम देख तो लेवे अच्छी तरह से कि क्या-क्या है।

46:03और आनंद तो ले लेवे।

46:06और आनंद तो ले रहे वे।

46:06जितनी देर ये आँखें खुली रहेगी, उतना आनंद ज्यादा आएगा।

46:12देखिए उसके लिए practice चाहिए।

46:16और ये practice काहे की चाहिए?

46:17ये लीनता की practice है, श्रद्धा की practice नहीं।

46:21श्रद्धा तो...

46:22श्रद्धा तो, ये लीनता की practice है।

46:25ये check की amount बढ़ाते जाने का है।

46:29उसको बोल करके कैसा भी application पे application डालकर, मेरी माँ बीमार है।

46:33calculation डालकर मेरी माँ बीमार है ज़्यादा खर्चा है ना ₹100 ज़्यादा लग क्या कुछ ना कुछ बहाना लेकर के वो permission लेकर के ₹100 का limit cancel करो ₹200 का रखो ₹300 का रखो ₹400 का ऐसा करके करके लेकिन उसके लिए जो time जाते हैं लफड़े रहते हैं क्या electric का bill भरना है तो भी जल्दी से नहीं भर सकते आप line में खड़े रह के बाद में भर देखो हर जगह क्यों है bank में भी जाओ।

47:02Bank में भी जाओ तो उन लोगों को तो चाय वाला तभी जा रहा है।

47:05Reservation office में जाते हो तो क्या होता है एक तो line में खड़े रहो फिर line में जब अपना number आता है ना।

47:13तो चाय पीने को आए गए सब लोग।

47:14सब उठ के चले जाते हैं।

47:16अरे हमारा तो पता तो अभी आखिरी।

47:18नहीं अभी चाय पी के 15-20 minute के बाद ही होगा।

47:21ऐसा कई बार होता है।

47:22हमारा last number रहता है बारी पे।

47:25जब भाई साहब उठ जाते हैं।

47:26अब गाली भी नहीं देते।

47:30अब गाली भी नहीं दे सकते, गाली दिए तो अपने को ticket नहीं देता वो।

47:34अंदर में तो बहुत गालियां देते हैं।

47:36लेकिन वहां कुछ नहीं बोलता।

47:38Request की करे तो परेशानी है।

47:40कहीं चिढ़ जाएगा तो।

47:42चाय तो पीने दो बोलेगा वो।

47:44देखो ऐसा होता है।

47:46कितने dependent थे, कितनी गुलामगिरी है।

47:48कि दुनिया में कितनी गुलामगिरी है।

47:50और अंदर परमात्मा के शरण लिया तो सारी गुलामगिरी खत्म।

47:54बादशाह हो गए चैतन्य।

47:57बादशाह हो गए चैतन्य बादशाह।

48:00चा गई चिंता गही।

48:01मनवा बेपरवाह।

48:03जिसको न कछु चा।

48:04इसको साधन पेशा।

48:06मेरा heart बंद हो जाएगा तो मरने दो heart को।

48:11अपने को क्या करने का?

48:13फिकर किसको है?

48:15भगवान फिकर करे heart की।

48:18दवा तो लेते हो।

48:20दवा क्यों लेते हो?

48:23मत लेओ।

48:24कैसी बात है?

48:25कैसी बातें हैं?

48:26आचरण का और श्रद्धा का कितना बड़ा difference है।

48:33यहाँ प्रश्न है ये।

48:35कि कैसे वृद्धि का पुरुषार्थ करता है?

48:40कि प्रथम की यथा श्रद्धा समय श्रद्धा की पर्याय का अखंड की ओर जो झुकाव अथवा लीनता का पुरुषार्थ होता है।

48:46उसमें काल भेद नहीं है तीनों एक साथ।

48:49जानना, मानना और देखते रहना।

48:53और देखते रहना।

48:53वो यथार्थ श्रद्धा में जो पुरुषार्थ का फल हो गया, ऐसा ही पुरुषार्थ बार-बार करना, इससे प्रयोग की पुरुषार्थ की वृद्धि होती रहती है।

49:04जैसा पहले किया था वैसा ही दोबारा करना।

49:07ढूंढना नहीं है परमात्मा, मैं हूँ।

49:10और महसूस करना है और मानना है।

49:12ढूंढना तो गलत है।

49:13अभी कहीं खो गया है, अभी वापस ढूंढूं, ढूंढना वाली बात खत्म हो गई अब।

49:19उसको पता मान लेना मैं...

49:22तो पता मालूम रहता है ना भैया।

49:23पता मालूम रहता है और ढूंढना।

49:25सीधा अंदर चले जाना है बेधड़क। peon को बोलना नहीं है कि मैं लेके चलूं ना मेरे को अंदर।

49:30मन को peon को चपरासी की जरूरत नहीं है।

49:33Direct जाओ।

49:34देखो।

49:34इसमें क्या है कि अगर सतगुरु को आदमी भी साथ में रखा।

49:42गिरोगे नहीं।

49:43गिरने की जगह...

49:43एक तो गिरोगे नहीं। दूसरा...

49:49करोगे नहीं। दूसरा, बहुत आसानी से, बहुत speed से अंदर जाना।

49:53आप भक्ति करके ध्यान में बैठो।

49:56अरे भक्ति करते-करते ध्यान लग जाए।

49:59भक्ति में इतनी ताकत है। इसलिए भक्ति के बिना मुक्ति नहीं है।

50:03ज्ञानी भी भक्ति करते हैं इसका कारण ये है।

50:07निंद्र भगवान की भक्ति करते हैं, बड़े-बड़े आचार्य देव क्यों करते हैं?

50:12आसानी से अंदर में entry मिलती है।

50:15भक्ति है gate pass।

50:18भक्ति एक gate pass है।

50:19अपने घर में जाना है परमात्मा के पास तो भक्ति का gate pass लेके जाओ।

50:22आसानी से entry।

50:25VIP pass जैसे, VIP pass तो अभी line में नहीं, तिरुमला में दर्शन करने जाते हैं ना तो VIP special pass रहते हैं।

50:31Line में खड़े रहने की जरूरत नहीं, सीधा चले जाओ।

50:34और बाकी 5000 लोग खड़े हैं उधर line में।

50:364-4 5-5 घंटे से।

50:37ये VIP pass है, भक्ति VIP pass।

50:41ऐसा नहीं है कि आप line में खड़े रहोगे तो दर्शन नहीं मिले।

50:45Line में खड़े रहोगे तो दर्शन नहीं मिलेंगे।

50:47लेकिन देर लगेगी।

50:48और VIP pass लेके जाओगे तो...

50:50Without any obstacle सीधा चले जाओगे।

50:55ये भक्ति का ये रहस्य है।

50:57इसीलिए ज्ञानी भक्ति करते हैं।

51:00इसके पीछे रहस्य क्या है कि जल्दी से परमात्मा के दर्शन हो, जल्दी से स्थिरता बढ़े।

51:04गरज के साथ भक्ति करते हैं।

51:07अंदर में परमात्मा की गरज के लिए...

51:09जल्दी-जल्दी शांति मिले इसीलिए...

51:12सद्गुरु...

51:13इसीलिए वो सद्गुरु की भक्ति करता है।

51:15बाकी कोई नहीं करता है सद्गुरु की भक्ति, परमात्मा होकर के सद्गुरु की भक्ति कौन करे?

51:21लेकिन नहीं, वो gate pass से आसानी हो जाती है।

51:24इसलिए पाठ पाठ करने के लिए।

51:26line में कौन खड़े रहे?

51:28ऊपर से divine लगा देवे ना, हनुमान गुटका लगा देवे।

51:32एक बात अच्छी याद आती है मेरा।

51:34time तो हो गया है लेकिन।

51:38कल से 3 दिन से मेरे दिमाग में आ रही है वो बात।

51:41मैं आ रही हूँ बात।

51:43कि रामचंद्र जी को मालूम है लंका तो जीत लिया था।

51:47सब लोग शांति से बैठे।

51:50रामचंद्र जी को विचार आया कि ए कमाल हो गया।

51:54मेरे नाम पत्थर के ऊपर मेरा नाम था श्री राम फिलहाल था तो पत्थर डूबता नहीं।

51:58इतना बड़ा पुल बनाया सब लोग ऊपर इतने लोग गए।

52:02इतनी मारामरी हुई।

52:04क्या मेरे नाम में इतनी शक्ति है?

52:07क्या किया फिर?

52:10क्या किया फिर?

52:11मैं check कर लेता हूँ ज़रा।

52:14doubt आ गया खुद के नाम के ऊपर।

52:15सब लोग बैठे थे वो चुपचाप पीछे से चले गए।

52:19हनुमान को तो मालूम पड़ जाता है।

52:22लेकिन अभी वो कुछ रहस्य है करके समझ गया है, कुछ सोच में थे और फिर चले गए हैं।

52:28पीछे-पीछे चुप-चुप के नहीं देखे ऐसे जाता है हनुमान।

52:32वो समुंदर किनारे पे गए, एक पत्थर लिया, उसपे श्री राम लिखा, किसने? श्री राम ने।

52:37किसने? श्री राम ने। डाला और डूब गया।

52:39क्या?

52:40अब मालूम है ये तो बात। हनुमान जी लिखे तो तीरता है और मैं लिखूं तो डूबता है।

52:48तो क्या वजह है?

52:49भक्ति की वजह।

52:50भक्ति की वजह।

52:50देखो, ये भक्ति का कमाल है।

52:54ये हनुमान जी लिखेंगे तो ही तीरेगा।

52:59अगर रामचंद्र जी खुद लिखें ना अपना नाम...

53:05अगर रामचंद्र जी खुद लिखे ना अपना नाम तो डूबेंगे ही डूबेंगे।

53:09समय तो संसारे में।

53:10क्या?

53:10अभिमान अभिमान अभिमान।

53:16ज्ञान का अभिमान है ना 5 factor में से एक है ना?

53:18खुद ने अगर खुद का नाम लिखा तो गया।

53:22खड्डे में सीधा।

53:23हनुमान जी ने लिखे तो कोई बात।

53:26इसलिए ये सब photo छप रहे हैं ना जब आगे पीछे उधर नीचे pose में।

53:31वितरा सत्संग मंडल।

53:33उसमें वित्रा सत्संग मंडल करे तो कोई बात नहीं लेकिन देवचंद भाई करे जिस दिन उस दिन समय तो संग है समझ लेना।

53:39गुरु हो जाएंगे वो गुरु।

53:42वित्रा सत्संग मंडल को सब पहले नाच सकते हैं गा सकते हैं मुकुट पहना सकते हैं बड़ा सिंहासन उठा सकते हैं सब कर सकते हैं।

53:49लेकिन जिस दिन देवचंद भाई को ऐसा विचार आया कि मेरी प्रसिद्धि हो जाए।

53:54क्या?

53:54सब मुझे ज्ञानी की तरह पूजे और सब मेरे को परमात्मा तुल्य माने।

54:01परमात्मा खुले माने।

54:02उस दिन उनकी खटिया खड़ी हो जाएगी।

54:06सीधा समय दर्शन में से नीचे आ जाएंगे वापस।

54:09देखो।

54:10ये रामचंद्र जी अपना नाम का पत्थर डाले तो डूबने वाला है।

54:17पत्थर क्या कंकरी डालेंगे तो कंकरी डूब जाएगी, पत्थर तो दूर की बात है।

54:22बड़ा पत्थर लिया था शायद छोटा लेके देखूं, शायद गिर जाए।

54:26छोटा पत्थर लिया।

54:27वो भी डूब गया, फिर मैं...

54:29वो भी दुख है अभी मैं छोटी कंकर ले लेता।

54:31पुष्पेली का श्री राम वो भी दुख है।

54:34और हनुमान जी इतना बड़ा पत्थर लेके लिखते ना तो भी तीर जाता है।

54:39वाह।

54:39ये भक्ति में शक्ति है।

54:44किधर भी नहीं।

54:45ये VIP gate pass।

54:47अगर सद्गुरु को साथ में रख कर के बार-बार प्रयत्न करो देखो कैसी entry होती है।

54:52आप कभी गिर भी नहीं सकोगे क्योंकि रथ के सारथी तो...

54:57सकोगे क्योंकि रथ के सारथी तो कृष्ण भगवान हैं। आप कैसे हार सकते हो? आप कैसे आपकी जीत कैसे नहीं हो सकती है? ज़रूर होगी। बारंबार उसी प्रयोग की वृद्धि होती रहती है। उससे वृद्धि का पुरुषार्थ करते हैं। जो पहली बार किया वही दोबारा तीसरी बार। पहले के व बाद के पुरुषार्थ के प्रकार में कोई प्रकार का फ़र्क नहीं है। इसीलिए।

55:25इसीलिए गुरुदेव श्री का यथार्थ समझण पर बारंबार ज़ोर रहता है।

55:30क्योंकि इस प्रथम समझण में ही भविष्य का सम्यक पुरुषार्थ गर्भित है।

55:37ये जो यथार्थ समझ है, उसके बारे में हम कल खुलासा करेंगे।

55:41अवलोकन से ये बात set होती है।

55:43अवलोकन से ही हम जानने देखने में आ जाते हैं।

55:47और इसका बार-बार बार-बार practice-practice करते-करते...

55:53बार बार practice practice करते करते करते करते वो बैठ जाती है mind।

55:58ये ये base है।

56:00अगर ये base नहीं होता तो अनुभव भी नहीं।

56:02और अनुभव के बाद का जो पुरुषार्थ है वो भी नहीं।

56:06सबका main वो है।

56:09प्रथम समझण में ही भविष्य का सम्यक पुरुषार्थ गर्भित।

56:12ये लिखा है।

56:13सोगाणी जी।

56:15यहाँ पूरा।