Shri Dravya Drushti Prakash
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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.
0:12णमो अरिहंताणं
0:14णमो सिद्धाणं
0:16णमो आयरियाणं
0:18णमो उवज्झायाणं
0:20णमो लोए सव्व साहूणं
0:22नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते ।
0:28चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे
0:32मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
0:38मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥
0:44सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।
0:48प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥
0:52ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
0:58कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः
1:09पूज्य नेहलचंद जी सोगाणी जी के आध्यात्मिक पत्र।
1:19पत्र number 22 चल रहा है।
1:25आज तीसरा letter है, तीसरा है।
1:32प्रश्न पूछा था कि किस प्रकार आत्मा अपनी ओर पुरुषार्थ की वृद्धि करने का प्रयोग करता है उसका जवाब चल रहा है पुरुषार्थ की वृद्धि तो पुरुषार्थ सही हो इसके बाद होती है और पुरुषार्थ सही कहाँ से होता है जब प्रथम बार आत्मा का अनुभव होता है।
1:59जब प्रथम बार आत्मा का अनुभव होता है वहाँ से पुरुषार्थ सही होता है इसके पहले अगर योग्य मुमुक्षु है तो सद्गुरु की आज्ञा अनुसार अपने उल्टे पुरुषार्थ को सुल्टा करने की कोशिश करता है लेकिन जब तक final सम्यक दर्शन ना हो जाए तीसरा third सम्यक दर्शन पहला तो।
2:28पहला तो है गुरु की आज्ञा उठाना।
2:32दूसरा है आंशिक रूप से अपने स्वरूप को देख लेना।
2:36और तीसरा है संपूर्ण रूप से निर्विकल्प अपने आत्मस्वरूप को देखना, अनुभव करना।
2:43और तीसरा सम्यक दर्शन जब तक नहीं हुए तब तक कहीं ना कहीं उसका उल्टा पुरुषार्थ चल रहा।
2:51वो पुरुष...
2:55वो पुरुषार्थ को सुलटा करने का प्रयत्न जरूर हो सकता है योग्य जीव को लेकिन अभी पुरुषार्थ सुलटा हुआ नहीं है तो अनुभव के बाद।
3:06Drawbacks अनुभव होने के बाद परमात्मा बनने के लिए एक चाल होती है एक पुरुषार्थ होता है अगर उसी प्रकार से चले।
3:23अगर उसी प्रकार से चले तो तो जल्दी-जल्दी परमात्मा बन जाते हैं।
3:27इसमें अगर up and downs होवे तो देर लगती है।
3:30लेकिन ये up and downs होने पर भी वो श्रद्धा का पुरुषार्थ सही होता है, आचरण का पुरुषार्थ गलत हो सकता है।
3:42बाकी के गुणों में विकृतियां बहुत ज्यादा हो सकती हैं, लेकिन श्रद्धा गुण में विकृति कभी नहीं होती।
3:51श्रद्धा गुण में विकृति कभी नहीं होती।
3:53और ये मैं परमात्मा हूँ ऐसी जो श्रद्धा अनुभव पूर्वक है।
3:57वही परमात्मा का बीज है।
4:00ऐसा आत्मा का अनुभव हो इसके लिए अवलोकन बीज है।
4:05और पुरुषार्थ की दृष्टि से।
4:08और भावना की दृष्टि से।
4:11मुझे इस दुनिया में कुछ नहीं चाहिए सिर्फ शांति चाहिए ये भावना का बीज है।
4:19चाहिए ये भावना का भेद भावना और पुरुषार्थ in addition external force में सत्संग सद्गुरु का guidance ये अगर चार मिल जाए तो आत्मा का अनुभव हो सकता है। अनंत काल से जो उल्टा हम चल रहे हैं वो पूरी बाजी पलट सकती है। चार चीज़ चाहिए भावना के भेद चाहिए मुझे शांति के अलावा कुछ नहीं चाहिए।
4:47अलावा कुछ नहीं चाहिए मुफ्त में भी नहीं चाहिए दूसरा फुर्सत की दृष्टि से सिर्फ अवलोकन करना जानना देखना तीसरा ये सद्गुरु के personal guidance में रहना और fourth सत्संग रहना है ये चार चीज़ें अगर हैं तो आज तक भले ही हमने अनंत जन्म मरण उल्टे करे।
5:15भले हमने अनंत जन्म मरण उल्टे कर लिए बहुत भटके लेकिन इसका फायदा अपने को पूरी बाजी पलट सकते हैं।
5:22दो internal है भावना और अवलोकन आत्मशक्ति है।
5:27दो external force है सत्संग और सद्गुरु का guidance मार्गदर्शन।
5:33बस इससे पूरी अपनी एक नई दुनिया खड़ी हो जाती है।
5:39इसके बाद सम्यक दर्शन होने के बाद।
5:43सम्यक दर्शन होने के बाद आत्मा का अनुभव होने के बाद अब पुरुषार्थ कैसे वृद्धिगत करना।
5:48वो अलग chapter है और यहाँ ये chapter की बात चल रही।
5:53कि किस प्रकार आत्मा अपनी ओर पुरुषार्थ की वृद्धि करने का प्रयोग करता है।
5:59पुरुषार्थ करना हो तो भी आत्मा के दर्शन चाहिए और पुरुषार्थ की वृद्धि करना हो तो भी वही है दूसरा कोई उपाय नहीं है।
6:09कौन शरण ही।
6:11कौन शरण है इस दुनिया में अपने आत्मा के सिवाय?
6:14इस दुनिया में अपनी आत्मा के सिवाय कोई शरण नहीं है।
6:18हमारा उपयोग बाहर जाता है तब सद्गुरु के ऊपर नज़र जाती है तब भक्ति होती है तब फिर कहते हैं कि सद्गुरु ने हमको बचाया।
6:26क्यों बचाया कि अगर सद्गुरु के ऊपर नज़र नहीं जाती तो आप ही संसार के लफड़े में जाती।
6:33बाहर तो निकल ही गए हैं।
6:36तो सद्गुरु ने हमको बचाया मतलब...
6:39गुरु ने हमको बचाया मतलब संसार के दावानल से राग द्वेष से हमको बचाया। gate पे खड़े थे किसी को अंदर नहीं आने दिए ना बाहर वाले को अंदर आने दिए। सद्गुरु gate पे खड़े हो गए ना बाहर वाले को अंदर आने दिए ना मेरे को अंदर से बाहर जाने दिए। देखो कैसी बात है double काम करते हैं double double है क्या? नहीं नहीं मुझे तीर।
7:07क्या?
7:07नहीं नहीं मुझे तीर नहीं चलाना है।
7:09कि नहीं तो ये चलाना ही पड़ेगा।
7:12देखो।
7:12और दूसरा कोई तीर नहीं चलावे इसके ऊपर इसके लिए वो रथ को ऐसा चलाते थे।
7:18कि पूछो नहीं ऐसा।
7:19बस सद्गुरु का role देखो कैसा है।
7:22बाहर वाले को अंदर नहीं घुसने देवे और अंदर वाले को अगर बाहर की ऊँची होवे और जाना चाहे तो नहीं।
7:29Without permission you cannot go.
7:30कहें मेरी permission है तो ही जाना बाक़ी नहीं।
7:35कहे मेरी permission है तो ही जाना, पाठ में किधर भी जाना और दूसरे का विचार करना है, किसी की निंदा करना है, कुछ गड़बड़ करना है, मेरे को कुछ बिना नहीं करना।
7:43देखो कैसा है, ये बहुत जबरदस्त role है।
7:46इसीलिए बड़े-बड़े मुनिराज भी जिनेश्वर के समोसरण में जाते हैं।
7:51जो दिन में हजारों बार अनुभव करते हैं ना आत्मा को, वो भी समोसरण में भगवान के पास तो जाते हैं।
7:59नहीं, कितना भी हम अच्छे हमारे साधना...
8:03कितना भी हम अच्छे हमारे साथ ना हो लेकिन आप जैसी नहीं है।
8:06का आप और का हम।
8:08दिन में 1000 बार आत्मा का अनुभव होता है।
8:12लेकिन समो शरण में 12 सभा में एक सभा है मुनिराजों की।
8:16दिनेन्द्र भगवान के चरण कमल में ही रहना है किसको रहना है?
8:22महामुनिराजों को आचार्यों को गणधरों को रहना है उधर दिनेश्वर के चरण में रहना है।
8:30हाँ।
8:31अलौकिक भारत अनुभव होने के बाद जो जल्दी से परमात्मा बनने की जो चाल है जो प्रसाद की वृद्धि करना है उसमें काम तो हमको ही करना है और शरण तो हमारी आत्मा ही है लेकिन जितना हम अपने से आगे वालों का बहुमान गुणों की भक्ति अनुराग ये जितना हम बाहर से करेंगे उतना हम।
8:59जितना हम बाहर से करेंगे उतना हम बचे रहेंगे।
9:02ना बाहर वाले हमारे अंदर आएंगे, ना हम बाहर जाना चाहें तो भी जा सकेंगे।
9:07ये परम पुरुष के आज्ञा में रहना, परम पुरुष के सानिध्य में रहना, उनके चरण कमलों में रहना,
9:15ये एक बहुत बड़ा... ये सौभाग्य होता है तो ही मिलता है नहीं तो नहीं मिलता।
9:22सम्यक दृष्टिकोण आत्मज्ञान होने के बाद...
9:27होने के बाद अभी जो ये भाव पूरा होने के बाद कभी भी सर्वज्ञ भगवान का भी योग नहीं होगा।
9:34इसका कारण क्या है?
9:37यही कारण।
9:39पूर्व में आयुष्य बंध गया और तेज गति में जाना पड़े वो अलग बात है।
9:44लेकिन आयुष्य नहीं बंधा हो तो ये भाव खत्म होते ही स्वर्ग में जाएंगे और हमेशा सर्वज्ञ भगवान का...
9:55सर्वज्ञ भगवान का साथ मिलेगा। जब चाहे तब जा सकते हैं जहाँ भी आना हो।
10:012500 2600 साल पहले मुनिया स्वर्ग से देवों के टोलियां इस धरती पे आती थी महावीर भगवान की वाणी सुनने के लिए।
10:13देखो आकाश से कितने करोड़ों इंद्र देव आते थे इधर सुनने के लिए।
10:21आकाश से ऐसा आ जाता।
10:23आकाश में ऐसा अलग।
10:24भक्ति करते।
10:27मनुष्य क्या?
10:28स्वर्ग के देव भक्ति करते हैं।
10:31क्यों आए इधर? स्वर्ग में मज़ा नहीं है क्या?
10:36स्वर्ग में मज़ा है लेकिन वो वाणी कहाँ?
10:40वो दर्शन कहाँ जो स्वर्ग में हुए?
10:43ऐसे अकृत्रिम जिन चैत्यालय जिन बिंब है वहाँ पर।
10:45एक से एक बढ़िया।
10:47लेकिन साक्षात की बात ही कोई अलग रहती है।
10:52हर एक स्वर्ग में हर एक देव के पास अपना और खुद का personal private बड़ा जिन मंदिर होता है।
10:57देखो।
10:58जब चाहे तब दर्शन कर लो कहीं बाहर जाने की जरूरत नहीं है।
11:03लेकिन प्रत्यक्ष अप्रत्यक्ष।
11:06उसकी तो कोई comparison नहीं है तो ये लोग।
11:09स्वर्ग के अपने वैभव को छोड़ कर के जिनेन्द्र देव को देखने के लिए।
11:14साक्षात परमात्मा को देखने के लिए धरती पे आते हैं क्यों आते हैं?
11:19आते हैं क्यों आते हैं क्योंकि ऐसा करने से और प्रत्यक्ष दर्शन से पुरुषार्थ की वृद्धि होगी। हमारा आत्मा हमारे पास ही है लेकिन उस पर नज़र करने के लिए आईना चाहिए। उस पर नज़र करना है तो क्या चाहिए? आईना चाहिए। और सद्गुरुदेव हिनेंद्र देव क्या है? आईना है।
11:47आईना है।
11:47अपना मुँह देखना है तो।
11:51तो आईने के सामने खड़े हो जाओ तो अपना मुँह दिखे।
11:55ऐसे पुरुषार्थ की वृद्धि करनी है तो।
11:57तो क्या करना?
12:00सद्गुरु के चरण में रहना।
12:03आईने के सामने खड़े हो जाना।
12:06सद्गुरु की कृपा से सद्गुरु नहीं दिखेंगे, परम गुरु दिखेंगे।
12:12लेकिन कब दिखेंगे?
12:15लेकिन कब दिखेंगे जब आप सद्गुरु के सामने खड़े हो जाएंगे तब।
12:19सद्गुरु से बहुत दूरी थी सोगाणी जी को प्रत्यक्ष सत्संग नहीं मिलता था।
12:29लेकिन visualization के द्वारा वो निरंतर अपने सद्गुरु को साथ में रखते थे।
12:37और उनमें उन पर नज़र पड़ते ही सीधा अंदर आ जाते थे नज़र।
12:43रहा है नजर इसीलिए भक्ति की top level भी सोगाणी जी के पास मिलता है इनकी भक्ति देखो तो क्या है इसके बिना ऐसी साधना कर ही नहीं सकते भक्ति के बिना नहीं बताऊँ कैसे बात शब्द देखो वाव की मतलब सोनगढ़ की धूल के लिए भी तड़पना पड़ता है गुरुदेव के।
13:11गुरुदेव के दृष्टांत अनुसार भक्ति भट्ठी में गिरने का अनुभव एक दिन में ही मालूम हो गया।
13:18सोनगढ़ से बिछड़े वापस कलकत्ता आए और कैसा लग रहा है?
13:23जैसे जमशेदपुर की लोहे की जो भट्ठी रहती है ना कारखाने की उसमें चले गए हम।
13:29एक दिन के अंदर इतना फर्क।
13:31धन्य हैं आपके सर्व मुमुक्षु जिनको सत्पुरुष का निरंतर सहयोग प्राप्त है।
13:38देखिए।
13:39देखिए।
13:40मैं अभागी हूँ लेकिन वो लोग धन्य हैं।
13:43ऐसा नहीं।
13:44दूसरा देखो।
13:45हे गुरुदेव, आपकी वाणी का स्पर्श होते ही,
13:49मानो विश्व कीर्तिमोत्तम वस्तु की प्राप्ति हो गई।
13:53उत्तम नहीं, उत्तमोत्तम...
13:54ये राजा नहीं है, राजाओं का राजा, राजाधिराज, जिसको बोलते हैं, चक्रवर्ती।
14:03देव नहीं, देवों के देव, देवेंद्र।
14:07देव नहीं देवों के देव देवेंद्र।
14:10देवों के भी इंद्र।
14:12ऐसे उत्तम नहीं विश्व की उत्तम वस्तु नहीं उत्तम में भी उत्तम।
14:16ऐसी वस्तु की प्राप्ति हो गई है।
14:19नहीं मेरे ज्ञान में अंदर हो गया ध्यान लगाया आत्मा को देखा इसलिए मुझे प्राप्त हुआ।
14:25Credit goes to सद्गुरु।
14:29मुझे परमात्मा मिला लेकिन credit goes to सद्गुरु।
14:35सद्गुरु।
14:36आपकी वाणी का स्पर्श होते ही मानो विश्व की उत्तम उत्तम वस्तु की प्राप्ति हो गई।
14:43क्या मैं मुक्त होने वाला हूँ? यकीन नहीं आता है?
14:46मैं पावन मुक्त हो जाऊँगा?
14:48कितने काल से पिंजरे में था शरीर में कैद।
14:56अनंत शरीर छोड़ते हैं वापस दूसरा मिल जाता है।
15:00Death होते ही दूसरी जगह जन्म ले लेते हैं।
15:03सोते ही दूसरी जगह जन्म ले लेते हैं।
15:06महादेव सोते ही तीसरी जगह जन्म ले लेते हैं। ऐसा करते-करते अनंत काल से शरीर की कैद में रहा हूँ।
15:12राग द्वेष की जंजाल में रहा हूँ।
15:14एक दुख जावे दूसरा आवे, दूसरा जावे तीसरा आवे, दुखों के बवंडर में, समुंदर में घिरा हुआ हूँ।
15:23ओहो, अब वो चीज़ मिल गई है, क्या मैं मुक्त होने वाला हूँ?
15:28मुझे यकीन नहीं आता है।
15:31मुझे यकीन नहीं आता है।
15:35वाह क्या चीज़ मिल गई है।
15:38अरे शास्त्रों में जिस मुक्ति की इतनी महिमा बखानी है, मुक्ति होगी तो ऐसा होगा ना, ऐसा होगा ना।
15:44उसे आपके शब्द मात्र ने इतना सरल कर लिया है।
15:48देखो, सद्गुरु के वचन की तारीफ देखो।
15:51ये जो मैं कल्पना के बाहर था कि मैं कभी इन जेलखाने में से छुटकारा मिलेगा।
15:57ये जन्म मरण की chain...
15:59ये जन्म मरण की channel का कभी अंत आएगा मुझे यकीन नहीं मुझे सपना भी कभी नहीं आया है।
16:07लेकिन वाह आपके वाणी का स्पर्श होते ही।
16:10मानो विश्व की उत्तमोत्तम वस्तु की प्राप्ति हो गई।
16:15और ऐसा आ गया ओहो मैं तो मुक्त होने वाला हूँ उसकी खुशी अभी से ही है।
16:20और देखो।
16:23सतत दृष्टि।
16:27सतत दृष्टि धारा बरसाते।
16:29अखंड चैतन्य के प्रदेश प्रदेश सहज,
16:33महान दीपोत्सव की क्षणे क्षणे वृद्धि करते।
16:38श्री गुरुदेव को अत्यंत भक्ति भावे नमस्कार।
16:42अखंड दृष्टि धारा बरसाते। श्रद्धा की परिणति छूटती नहीं है।
16:48अखंड चैतन्य के प्रदेश प्रदेश सहज,
16:51महान दीपोत्सव की,
16:53क्षण...
16:55उत्सव की क्षण क्षण में वृद्धि करने वाले।
16:58कौन मेरा ज्ञान नहीं।
17:01credit goes to श्री गुरुदेव की अत्यंत भक्ति भाव है नमस्कार।
17:08और देखो दरिद्री को चक्रवर्ती बनने की कल्पना नहीं होती।
17:15एक footpath पे रहने वाला मैं चक्रवर्ती बनूँगा वो सपना भी नहीं आता है।
17:20भले चाहना कितनी भी हो।
17:23भले चाहना कितनी भी हो लेकिन मेरी life में मैं ऐसा दिन देखूंगा।
17:27उसको सपना भी नहीं आता है।
17:30दरिद्री को चक्रवर्ती बनने की कल्पना नहीं होती।
17:34पामर दशा वाले को भगवान हूँ भगवान हूँ ऐसी रटन लगाना।
17:38तो साधारण बात नहीं हे प्रभु ये आप जैसे असाधारण निमित्त काहे का है।
17:46हमारी तो हेसियत औकात ही नहीं है।
17:49कि हम बोल सकें कि।
17:51कि हम बोल सकें कि हम भगवान हैं।
17:53रटन लगाना तो दूर की बात है।
17:57हम बोल सकें कि मैं भगवान हूँ इतनी भी हमारी औकात नहीं है।
18:02लेकिन ऐसे पावन जीव को आपने ऐसी कृपा कर दी कि अब सतत मेरे को रटन चल रहा है मैं भगवान हूँ, मैं भगवान हूँ, मैं भगवान हूँ।
18:11ये कोई ordinary निमित्त का काम नहीं है।
18:14क्या?
18:15ये असाधारण निमित्त का काम है।
18:20ये असाधारण निमित्त का कार्य है।
18:22वो गुरु की शक्ति है, गुरु की कृपा दृष्टि है।
18:25आज मेरे परिणमन में इतना बड़ा change आया है।
18:28कहाँ चली गई पाखंडता मुझे पता ही नहीं है।
18:32सारे दुख दर्द नाम लेते ही मिट गए पूरे।
18:35वाह।
18:35एक दरिद्री को चक्रवर्ती बनने की कल्पना नहीं होती।
18:41लेकिन पाखंड दशा वाले को भगवान हूँ, भगवान हूँ की रटन लगाना...
18:47की रटन लगाना हे प्रभु आप जैसे असाधारण निमित्त का ही कार्य हो।
18:52और देखो।
18:52अतः तीर्थंकर से भी अधिक सत्पुरुष का योग प्राप्त हुआ है।
18:59जिनकी नित्य प्रेरणा।
19:02नित्य प्रेरणा कैसे वो तो दूर बैठे थे कहाँ सोनगढ़ कहाँ कलकत्ता।
19:07ये visualization होता था।
19:11उस time में VCD नहीं था।
19:13था।
19:13तो।
19:15था?
19:15रोज़ cassette नहीं लगाते थे बीच में।
19:21लेकिन गुरुदेव को यहाँ बिठाया था।
19:27देखो, जिनकी नित्य प्रेरणा उधर से विमुख कराकर।
19:30उधर से माने?
19:32सही सही।
19:32जैसे सद्गुरु बोलते हैं कि क्या सोनगढ़ में रखा है? जो भी रखा है तेरे पास ही है।
19:36क्या मेरे पास है?
19:37जो भी है तेरे पास है।
19:39तो उधर से विमुख कराती है।
19:43तो उधर से ही मुक कराती है। दिल चाहता है कि वहाँ जाऊँ।
19:46लेकिन फिर गुरुदेव की अंदर से ही आवाज़ आती है कि क्या करोगे यहाँ आकर?
19:51जाना अंदर में, तेरे पास तो है सब।
19:53ऐसा करके वहाँ से वहीं ticket, भाड़ा, traveling सब, कोई ज़रूरत नहीं है किसी चीज़ की।
19:59देख।
19:59जिनकी नित्य प्रेरणा है, रोज़ हमको ऐसा ही बोलते हैं गुरुदेव, अंदर से ही।
20:06अंदर ही बैठे हैं गुरुदेव और ज़रा भी कुछ भाव आया, सोमनाथ जाना है।
20:11कुछ भाव आया सोनगढ़ जाना है।
20:12ऐ क्या करते हो? ध्यान धर।
20:14ये नित्य प्रेरणा देखो।
20:16नित्य प्रेरणा उदर से विमुख कराकर स्वयं के नित्य भंडार की ओर लक्ष कराती रहती है।
20:23यहाँ से ही पूज्य गुरुदेव के न्याय अनुभव सिद्ध होकर दृढ़ता प्राप्त करते हैं। यहाँ से न्याय निकलते हैं गुरुदेव के।
20:31सोनगढ़ से वो cassette नहीं आती है?
20:34क्या? यहाँ से न्याय निकलते हैं। और...
20:39यहाँ से न्याय निकालें।
20:40और वो मेरे न्याय नहीं है, अरे उनके ही न्याय हैं।
20:43taking credit goes to...
20:46नहीं नहीं गुरुदेव ने न्याय निकाले हैं, मैंने...
20:51मेरी कहाँ औकात है? गुरुदेव ने न्याय निकाला।
20:54यहाँ तो कुछ अच्छे विचार आए तो देखो कितने अच्छे विचार आ रहे हैं।
20:58नहीं पुरुषार्थ की वृद्धि नहीं होती है ऐसे।
21:02अपने गुण गंभीरता रहना चाहिए, गुण बढ़े तो छुपा देना चाहिए।
21:07होना चाहिए गुण बढ़े तो छुपा देना चाहिए।
21:10और फिर भी अगर बहुत खुशी होती है तो credit goes to सद्गुरुदेव।
21:15ये हमारी क्या औकात है? वो तो सद्गुरुदेव की औकात है इतनी कृपा है उनकी शक्ति है तभी ऐसा हो रहा है बाकी हमारे में कोई दम नहीं है।
21:24ऐसा होना चाहिए ये ये सोगाणी जी की साधना है सिर्फ।
21:29उन्होंने ये सब बातें नहीं लिखी है इसके अंदर।
21:32लेकिन जहां प्रश्न वो है...
21:35प्रश्न वो है।
21:35किस प्रकार आत्मा अपनी ओर पुरुषार्थ की वृद्धि करता है, तो मैं उस chapter को भी खोलना चाहता हूँ।
21:43जो उन्होंने अपने हृदय में छिपा के रखा है सोगाणी जी।
21:48वो secret रहस्य कृपावदंत भी खोलते हैं।
21:51सोगाणी जी नहीं खोलते हैं, ये secret रहस्य है।
21:54निरंतर सद्गुरु के चरणों में रहना, ये सीखना है तो कृपावदंत।
22:00और दृष्टि कैसे लगाना आत्मा में?
22:03और दृष्टि कैसे लगाना आत्मा में ये सीखना है तो सोगाणी जी।
22:06देखो क्या कहते हैं अब वो तो ये side से बात करेंगे।
22:10दृष्टि के level से बात करेंगे।
22:14कैसे वृद्धि करता है पुरुषार्थ की?
22:18अखंड ज्ञान घन।
22:19अखंड माने one piece।
22:20ज्ञान घन माने शक्कर का दृष्टांत दिया था।
22:25जैसे शक्कर में मिठास है, सफेदीपना है।
22:28ऊपर में ही नहीं है अंदर में भी है।
22:31ऊपर में ही नहीं है अंदर में भी है।
22:36जैसे ज्ञान घन ऊपर अंदर सब सब जगह ज्ञान।
22:39ज्ञान की मूर्ति है।
22:42पुरुषाकार मतलब देहाकार।
22:45आत्मा का जो आकार है वो कैसा है? देहाकार।
22:50पुरुषाकार मतलब स्त्री पुरुष की बात नहीं चल रही है।
22:55देह जो है उस आकार में।
22:59उस आकार में।
23:00ज्ञान की मूर्ति कैसी आकार में है? कि देहाकार आकार। इसको बोलते हैं पुरुष आकार।
23:06शरीर, ये खोखा दिखने वाला।
23:10कर्म, जो अंदर में 8 प्रकार के सारे carbon शरीर हैं।
23:15इसको वेदांत में कहते हैं ना, संचित कर्म, प्रारब्ध कर्म, क्रियमाण कर्म, ये तीनों कर्मों का एक पोटली अंदर में है।
23:26Invisible।
23:27Invisible।
23:28ये तो दिखता है लेकिन वो नहीं दिखता है।
23:32जैन भाषा में 8 कर्म कहते हैं ज्ञानावाणी दर्शनावाणी वाली।
23:35उसका बना हुआ एक शरीर है कार्मण शरीर।
23:37जो हमको आँखों से नहीं दिखता है।
23:42अनंत काल के राग द्वेष के और अनंत शरीर छोड़कर के जन्म मरण किए हैं और जितना हमने अच्छे बुरे भाव किए हैं।
23:48उसके जो कर्मों का बंधन हुआ है।
23:50वो पूरा download है इधर कार्मण शरीर।
23:55पूरा download है इधर carbon शरीर के अंदर।
23:57Totally अंदर में है गर्भित।
24:02कब इसका उदे आएगा पता नहीं।
24:05क्या लेकिन सत्ता में तो है।
24:08File तो अंदर पड़ी है।
24:10Computer में जैसे file रहती है वो पड़ी है।
24:15कब खुलेगी पता नहीं।
24:16Death की file कब खुलेगी पता नहीं।
24:19बीमारी की file कब खुलेगी पता नहीं।
24:24Lottery कब लगने वाली है पता नहीं। ये भी file अंदर में है।
24:29लेकिन हमको time का नहीं मालूम है कौन से time में क्या होने वाला है।
24:33कब accident होने वाला है पता नहीं।
24:36कब मकान बनने वाला है पता नहीं।
24:40सब अंदर में file पड़ी है total।
24:43इसको बोलते हैं carbon शरीर।
24:45तो बाहर में दिखने वाला शरीर अंदर में...
24:51वाला शरीर अंदर में 8 कर्मों का जो शरीर है वो कर्म फिर राग द्वेष के भाव पल पल में बदलने वाले कितने 1 second में तो कितने भाव हो जाते हैं अच्छे हो या बुरे हो इसको बोलते हैं भाव कर्म द्रव्य कर्म के बाद भाव शरीर कर्म माने द्रव्य कर्म और तीसरा राग द्वेष में वर्तमान में चलने वाले भाव कर्म और इसके आगे।
25:20और इसके आगे शुद्ध पर्याय।
25:21शुद्ध पर्याय माने क्या?
25:25आत्मा की ऐसी अवस्था,
25:26कि जहाँ अंश मात्र भी राग द्वेष नहीं हो रहे हैं, उस घड़ी।
25:31जैसे हम ध्यान में बैठे और थोड़ी देर में पूरे भाव चले गए।
25:38ना अच्छे ना बुरे।
25:39शांत अवस्था हुई।
25:42तो ऐसी जो अवस्था है, उसको बोलते हैं,
25:45शुद्ध पर्याय।
25:47शुद्ध पर्याय और ऐसी जब अवस्था होती है तब जीव जानने देखने में ही रहता है करने नहीं करने में नहीं रहता न भूतकाल को याद करता है न वर्तमान के कोई आग्रह होते हैं न भविष्यकाल की कोई कल्पनाएं होती हैं जब जानने देखने में रहता है तब शुद्ध पर्याय उत्पन्न होती है जानने देखने से विपरीत रहना मतलब करना नहीं करना करना खुराक।
26:15करना नहीं करना करना खुराक द्वेष वाले बाबा।
26:17और करना धरना छोड़ कर के जो होवे उसको जानना देखना।
26:21और शून्यता में चले जाना।
26:24उसका नाम है।
26:26निरविकल्प अवस्था।
26:28इसमें भी अगर आत्मा की दृष्टि होवे तो उसको बोलते हैं।
26:32शुद्ध पर्याय।
26:32अब देखो।
26:33साधना की वृद्धि कैसे करते हैं।
26:38तो साधना की वृद्धि कैसे करना है।
26:41कि आत्मा को जिस प्रकार से।
26:44कि आत्मा को जिस प्रकार से देख कर के सही पुरुषार्थ किया।
26:48वही बार-बार देखना आत्मा को।
26:50तो उसको साधना की वृद्धि हो, पुरुषार्थ की वृद्धि हो।
26:56कैसा है आत्मा?
26:59अखंड है।
26:59ज्ञान घन है।
27:01पुरुषाकार है।
27:03शरीर से, आठ कर्मों से, अंदर के राग द्वेष के भावों से, और शून्यता से।
27:09Blankness।
27:12Blankness जो आती है वो, उन सबसे भी उंदा, उन सबसे अलग, ये सब के अंदर में, भीतर में।
27:20नीचे नहीं, भीतर।
27:21भीतर में और नीचे में फर्क है।
27:26भीतर और नीचे में कितना फर्क है?
27:30बहुत फर्क।
27:31गहराई।
27:32गहराई।
27:34हाँ, ये उंदा की बात करते हैं कि आत्मा कहाँ है?
27:38के शरीर...
27:39के शरीर कर्म भाव कर्म और blankness शुद्ध पर्याय उनके अंदर गहराई में और गहराई में और गहराई में जाओ उससे भी ऊँडा चैतन्य तत्व मैं हूँ चैतन्य तत्व है ऐसा नहीं लिया ऐसा बोलते तो गड़बड़ होती क्या देखिए कितना।
28:07क्या?
28:08देखिए कितना फर्क है, एक शब्द में कितना फर्क पड़ गया है।
28:14शरीर, कर्म, भाव कर्म और शुद्ध पर्याय से भी उंडा चैतन्य तत्व है।
28:18नहीं, ये बात नहीं है।
28:21नहीं, पुरुषार्थ की वृद्धि कैसे करना है? प्रश्न वो है।
28:25तो गड़बड़ हो गई।
28:28फर्क देखना क्या है? शरीर, कर्म, भाव कर्म और शुद्ध पर्याय से भी उंडा...
28:35शुद्ध पर्याय से भी उंडा चैतन्य तत्व है नहीं ऐसा नहीं शरीर कर्म भाव कर्म व शुद्ध पर्याय से भी उंडा चैतन्य तत्व मैं हूँ कितना change हो गया कितना change हुआ first sentence के अंदर वो जैसे दूसरे आत्मा की बात चल रही है।
29:03और second sentence में।
29:06ये मैं ऐसा।
29:09स्वयं।
29:09स्वयं।
29:10कितना फर्क पड़ गया?
29:12बहुत बड़ा फर्क पड़ा।
29:19शरीर, कर्म, भाव कर्म व शुद्ध पर्याय से भी,
29:26उड़ा,
29:26चैतन्य तत्व,
29:29मैं, हूँ।
29:33ढूंढना है, खोजना है, देखना है, कैसे देखोगे? आँखों से। कैसे सुनोगे? कानों से। कैसे सोचोगे? मन से। कभी नहीं मिलेगा। मैं हूँ, ये अनुभव का विषय है। ये अस्तित्व का ग्रहण करना है।
30:01उंदा मतलब भीतर और गहराई में चैतन्य माने जानने देखने वाला वाला मत कहो ज्ञान दर्शनमयी चैतन्य और तत्व तत्व माने क्या कि इस world में जितने भी पदार्थ हैं तत्व।
30:28तत्व उसका त्व छाछ का मक्खन पदार्थों का सार या cream इस पूरे world के अंदर cream क्या चीज़ है top most चीज़ क्या है ये जानने देखने वाली चैतन्य ज्ञान दर्शनमयी चैतन्य।
30:56चैतन्य तत्व सब तत्वों का राजा सब तत्वों का सार मैं हूँ अभी पूरा नहीं हुआ वचन देखो अभी आगे देखना कैसा concentrate कराते हैं फिर से अखंड ज्ञान घन पुरुषाकार।
31:25अखंड का one piece कि यहाँ brain में या हृदय में ऐसा नहीं।
31:29पांव में vibration होता है तो वहाँ ऐसा नहीं।
31:32सर में होता है तो वहाँ ऐसा नहीं।
31:35अखंड one piece।
31:38अखंड।
31:38ज्ञान धन।
31:39पूरा ज्ञान से भरा हुआ खाली नहीं है कुछ।
31:45Blankness है लेकिन वो blankness है वो आत्मा नहीं।
31:48Blankness में तो खालीपना है।
31:50और ये तो...
31:51और ये तो खाली थोड़ा है।
31:53शक्कर की मिठास खाली है कि अंदर ऊपर है अंदर खाली है कि?
31:59नहीं।
31:59शक्कर में हर जगह मिठास है।
32:03ऐसे ज्ञान घन।
32:07खाली नहीं है blankness तो वो blankness को देखने वाला ज्ञान घन।
32:12ऐसा।
32:12कोई मा... फोकट की zero चीज है शून्यता है।
32:19Zero चीज़ है, शून्यता है, ऐसा कुछ नहीं है, ज्ञान घन है।
32:22पुरुषाकार ये क्षेत्र बताया है।
32:24लेकिन इस area में देखते हैं तो शरीर दिखता है, कि नहीं वो नहीं, शरीर नहीं।
32:30अंदर देखते हैं तो कर्म दिखते हैं, कि नहीं वो नहीं।
32:33और अंदर जाते हो, राग द्वेष के भाव दिखते हैं, कि नहीं वो भी नहीं।
32:38और अंदर जाते हो, तो blankness आती है, कि नहीं वो भी नहीं।
32:42फिर क्यों?
32:43इससे भी गहरा...
32:47इससे भी गहराई में हम कौन अब कह नहीं सकते।
32:50क्योंकि शब्दों से पार है वो।
32:54इसलिए ये नहीं, ये नहीं, ये नहीं, ये नहीं।
32:58शरीर नहीं, कर्म नहीं।
33:01भाव कर्म नहीं।
33:04शुद्ध पर्याय नहीं।
33:06फिर कौन?
33:07वो कह नहीं सकते।
33:10उससे भी गहरा है, चारों से भी गहरा।
33:13कुंडा।
33:13अब अध्याय हो जाएगा।
33:15गुंडा।
33:15अबाध्य अनुभव जे रहे तेसे जीव सरो।
33:18बात करता करता।
33:19अबाध्य अनुभव जे रहे तेसे जीव सरो।
33:22बात करता करता।
33:25ये नहीं, ये नहीं, ये नहीं, ये नहीं।
33:29और फिर कौन?
33:30नहीं इससे भी अंदर गहरा, लेकिन कैसा?
33:33वो कह नहीं सकते।
33:36फिर भी एक बार लिखा है, चैतन्य तत्व।
33:39जानने देखने वाला।
33:43जानने देखने वाले।
33:46अब तो ठीक है ना?
33:57नहीं अभी भी ठीक नहीं है।
33:59चैतन्य तत्व ठीक नहीं है।
34:01शरीर, कर्म, भाव कर्म, शुद्ध पराय से भी, उंडा, चैतन्य तत्व।
34:07ठीक?
34:08नहीं अभी भी ठीक नहीं है।
34:11ठीक है वो तो दूसरों की बात हो मैं हूँ मैं अपनापन हूँ अस्तित्व हाज़िर है जैसे कि सामने देख रहा हूँ visualize कर रहा हूँ feel कर रहा हूँ सामने नहीं अपने में feel कर रहा हूँ मैं हूँ यही मेरा अस्तित्व है अभी भी वाक्य पूरा नहीं हुआ है मैं हूँ के बाद comma आप कहते हैं यही।
34:40अब कहते हैं यही मेरा अस्तित्व है, इतना ही मैं हूँ।
34:43यही मेरा जो भी है, यही है।
34:46मेरा घर, मेरा flat, मेरा बंगला, मेरी ज़मीन, यही है।
34:49जो कभी जाने वाली नहीं है, कोई चुराने वाला नहीं है।
34:53कोई ले नहीं सकता है, अग्नि जला नहीं सकती है।
34:58पानी भिगा नहीं सकता है, पवन उड़ा के ले नहीं आ सकता है, तलवार काट नहीं सकती है, वो कोई ये मैं।
35:05क्या? ये मैं।
35:07यह यही यह मेरा अस्तित्व नहीं, यह ही मेरा अस्तित्व है।
35:11इतना ही है, साथ में शरीर मेरा कहते हैं तो व्यवहार से कहते हैं।
35:16राग द्वेष तुम करते हो तो व्यवहार से।
35:20ये वेदना मुझे आया ये व्यवहार से है, मेरे को वेदना नहीं आ सकता है।
35:25मैं तो वेदना से भी हूँ गहरा हूँ।
35:27और हम वेदना की चाहना करते हैं तो कितने मूर्ख हैं।
35:33वेदांत...
35:35वेदन तो...
35:38वेदन नहीं आ रहा है। अरे भैया कपार तेरा। क्या वेदन के पीछे पड़े हो? परमात्मा होकर के भीख मांगते हो? शर्म नहीं आती है?
35:44वेदन नहीं आ रहा है। नहीं आया तो नहीं आया है।
35:49देखो।
35:49लेकिन बंद क्यों हो गया? अरे हो गया तो और ज्यादा। तू थोड़े बंद हो गया है। तू देख अभी अंदर में।
35:59वो तो बंद होने वाला है क्योंकि वो तेरा नहीं था। वो...
36:03वाला है क्योंकि वो तेरा नहीं था वो permanent रूप नहीं था तेरा।
36:08ये permanent ये है यही यही मेरा अस्तित्व है। देख वो है कि नहीं है वेदन माया होली कि वो है कि नहीं है देख।
36:17वो है कि नहीं है यही मेरा अस्तित्व है।
36:22अभी वाक्य पूरा नहीं हुआ।
36:25अब कहते हैं।
36:26तो वेदन क्या था कि वेदन का क्या हुआ?
36:31कि वेदन का क्या हुआ?
36:32कोई प्रश्न पूछेगा भई वेदन तो नहीं आ रहा ना?
36:36वेदन का क्या हुआ?
36:37उसका answer।
36:38शुद्ध पर्याय का अस्तित्व भी इसमें गौण है।
36:41clear कर दिया उस बात को।
36:44भैया वेदन भले ही आवे या नहीं आवे लेकिन वो उसके अस्तित्व में वेदन नहीं होगा।
36:52और गौण कहाँ है?
36:54गौण इसलिए कहा है,
36:55कि जब वो तत्व के ऊपर नज़र जाएगी ना,
37:01कैसे तत्व के ऊपर शरीर से भिन्न कर्म से भिन्न भाव कर्म से भिन्न शुद्ध पर्याय से भिन्न शुद्ध पर्याय से भिन्न का मतलब क्या कि अपेक्षा छोड़ देना वेदन में जब तक अपेक्षा है तब तक आप भिन्न नहीं हो शुद्ध पर्याय से भिन्न का मतलब क्या देखना है आत्मा को वेदन आवे तो अच्छा है वेदन आवे तो अच्छा है।
37:27आराम से।
37:27अच्छा बैठो, ध्यान से बैठो।
37:28अभी आएगा, देखो अभी आएगा।
37:30आ जाएगा।
37:30ये भिन्नता नहीं है ये।
37:33ये आत्मा का ध्यान नहीं है, ये वेदन का ध्यान है।
37:37किसका ध्यान है?
37:38गजब है।
37:39ये पुरुषार्थ की वृद्धि नहीं होती, उल्टी down हो जाता है, downfall आता है।
37:47पुरुषार्थ की वृद्धि कैसे होती है? ये प्रश्न ये है, पुरुषार्थ की वृद्धि कैसे होती है?
37:54देखिए क्या...
37:55देखिए क्या कमाल रखा है इसके अंदर। गजब का है इसके अंदर।
38:01एक शब्द भी फर्क पड़ गया।
38:02हाँ बहुत फर्क पड़ गया।
38:03सुपरिया का अस्तित्व भी इसमें गलत है। ऐसा भी लिख दिए तो गलत है।
38:07तरबंदा।
38:09सुपरिया से भी उंडा।
38:10जब ऐसे उंडे चेतन तत्व के ऊपर मैं हूँ ऐसा अपनापन होगा, तो क्या होगा?
38:17वेदन नहीं आएगा?
38:18वेदन तो अपने आप...
38:21वेदन आएगा।
38:23नहीं आएगा।
38:23आएगा अपने आप आएगा।
38:24वो तो अपने आप आएगा।
38:26तो फिर क्या कहते हैं?
38:28कि यही मेरा अस्तित्व है माने वेदन बिना का जो तत्व है ना, जिसमें मैंने अपनापन किया, वो मेरा अस्तित्व है।
38:37लेकिन साथ में ये भी जो वेदन आना शुरू हो गया है ना, वो क्या है?
38:42कि नहीं वो गौण है।
38:44वो boundary के बाहर है, मेरे में नहीं है।
38:48ये clear कर दिया।
38:51ये clear कर दिया।
38:52Clear करने में ये बात बता दी उन्होंने कि जब यहाँ main तत्वों के ऊपर नज़र जाएगी ना,
39:00तो वेदन 100% होगा होगा और
39:02ऐसा कभी नहीं बनता है,
39:05कि आपका केंद्र स्थान में आपका तत्व हो, चैतन्य तत्व,
39:10नज़र वहाँ टिकी हो,
39:11Goal setting कर दिया हो,
39:13और आपको वेदन नहीं आवे, ऐसा बंद।
39:19आपको वेदन नहीं आवे ऐसा बन नहीं सकता है।
39:21वेदन आएगा भी और आप उसको गौण भी करना है।
39:27वेदन आएगा भी।
39:27आप मना करोगे तो भी आएगा।
39:32आप बोलोगे बंद हो जाओ, नहीं बंद नहीं होने वाला है, आएगा ही आएगा।
39:38क्यों?
39:38बंद करना है तो नज़र हटा दो केंद्र स्थान से।
39:41आत्मा से नज़र हटा दो और वेदन के पीछे भागो, वेदन बंद हो जाएगा।
39:47आओ वेदन बंद हो जाएगा।
39:48वेदन बंद करना आसान है बहुत। पर हम इसमें तो master हैं।
39:53हम लोग सब बहुत master हैं। वेदन को बंद करने में तो माहिर हैं।
39:57लेकिन अगर वेदन को continue रखना है,
40:02तो रख सकते हो। फुर्सत की वृद्धि कर सकते हो।
40:05आसानी से कर सकते हो।
40:07Normally ऐसा check करते हैं वेदन नहीं आ रहा है। मतलब ध्यान नहीं हो रहा है check...
40:15मतलब ध्यान नहीं हो रहा है checking point पे इधर उधर।
40:18हाँ हाँ हाँ।
40:19बहुत गलत।
40:20ये एक तो भूसा है जो सोगाणी जी को नहीं था।
40:23आश्चर्य की बात है कि सद्गुरु के सामने नहीं होते वो भी कैसे कैसे निकली बात समझ में?
40:28ये अंदर से निकली और credit goes to गुरुदेव।
40:31वाह।
40:31कैसी भक्ति ये भक्ति का प्रताप है।
40:35ये अंदर से निकलने के बाद क्या कारण क्या है?
40:38ये अंदर की भक्ति थी।
40:39जो किसी को दिखाई देती नहीं थी।
40:43जो किसी को दिखाई देती नहीं थी ऐसी भक्ति।
40:46लेकिन भक्ति की।
40:48जबरदस्त।
40:50ज्ञान खोल देती है।
40:52और ज्ञान को clarity को निर्मलता ला देती है भक्ति।
40:55भक्ति वो चारनी है छरनी छरनी बोलते हैं ना क्या बोलते हैं।
40:59कचरा पूरा बाहर और अंदर सीधा फिर और ज्ञान जावे।
41:05ज्ञान में जो दूसरा कचरा है ना।
41:07Filter।
41:07और filter filter।
41:09Correct।
41:10This is white।
41:11Correct, this is right.
41:12यही सोच रहा था चार नहीं वचन बोल रहा था।
41:15Double refined, triple refined.
41:17या ये अनंत refine है भक्ति।
41:19भक्ति तलवार है।
41:20भक्ति दर्पण है, क्या क्या बोल सकते हैं भक्ति को?
41:27सिर्फ भक्ति ही मुक्ति है।
41:29भक्ति ही शक्ति है।
41:30वो filter होकर के जो disturbed ज्ञान होता है वो भक्ति के द्वारा filter होकर के एक...
41:39Filter होकर के एक बार नहीं दो बार नहीं अनंत बार refine होकर के pure आता है ज्ञान अंदर।
41:46ज्ञान में से ये सब निकलता है।
41:50देखो।
41:50क्या कहते हैं?
41:51कि जब मूल तत्व के ऊपर नज़र जाएगी ना।
41:55तो वेदन को बंद करना चाहोगे तो वो बंद नहीं होगा।
42:00कितना भी रोको नहीं रोके नहीं रुकेगा अगर आपकी नज़र तत्व के ऊपर रहेगी तो।
42:07के ऊपर रहेगी तो।
42:07क्या?
42:08तो फिर क्या करना उसको अपना अर्थित्व में शामिल करना।
42:14खबरदार किया है तू।
42:15खबरदार किया है तू।
42:17मुनियाज को सभी कल्प स्वसंवेदन 24 hours रहता है।
42:24लेकिन मुनियाज को मालूम है कि मेरी boundary के बाहर हो रहा है मेरे में नहीं हो रहा है।
42:30तभी तो चल रहा है नहीं तो चलता ही नहीं था इतना।
42:35तो चलता ही नहीं था इतना।
42:36शामिल करना उस time ये सब विकल्प नहीं थे।
42:38सबको ये समझ में नहीं आ रहा था।
42:40उस time नहीं लेकिन बाद में तो होते हैं।
42:43और बाद में होते हैं उसमें पुरुषार्थ की वृद्धि नहीं होती।
42:48उसके बाद अगर वो जाने के बाद उस time तो कितना देते हो?
42:52बाद में कचरा बहुत है।
42:53बाद में बोलते हैं एक second के बाद की बात है।
42:59एक समय के बाद एक समय अंदर रहते हो क्यों दो समय नहीं रहते?
43:03समय अंदर रहते हो क्यों दो समय नहीं रहते हो क्योंकि ये कचरा है इसलिए।
43:07दो समय कचरा है।
43:08गाड़ी कैसे चले carbon घुस जावे तो अंदर।
43:12साफ कराओ plug।
43:13गाड़ी चलेगी।
43:15carbon आ गया तो कैसे होगी गाड़ी?
43:18गाड़ी रुक जाती है बार-बार।
43:21तो ये कचरे के कारण रुकती है।
43:25और यहां clear कर दिया है कि शुद्धि करना है तो।
43:2824 hours सविकल पेदन हो सकता है।
43:31हो सकता है।
43:31आखिरी ताकत है।
43:33खास तौर पे जब समाधि मरण का time आता है।
43:37तब तो धड़धड़ाट ही हो जाती है।
43:38सभी कल्प की क्या वो तो निरिकल्पता में चले जाता है।
43:44क्योंकि वो तो do or die रहता है फिर तो फिर तो कोई chances नहीं है।
43:49अभी करो या बाद में कल करना है वो बात नहीं रहती अभी करना पड़ता है।
43:53On the spot करना पड़ता है।
43:54वो तो लड़ाई का रण रण मैदान में आ गए हो।
43:59रण मैदान में आ गए हो।
44:00उस time में अगर आप बोलो कि नहीं थोड़ा time है थोड़ा अच्छा सोचूँ विचारूँ, नहीं विचारने का time नहीं है, उस time तो 1 2 3 करो।
44:09थोड़ा उसको ये सलाह दे दूँ उसको ये कह दूँ कि नहीं ये चलेगा ही नहीं।
44:15इसीलिए अगर 4 दिन 5 दिन पहले अगर मृत्यु आने वाली है पक्का हो जाए तो क्या साधना बढ़ती है?
44:20बहुत जबरदस्त साधना बढ़ती है।
44:23उसमें भी शरीर में वेदना होवे।
44:29उसमें भी उठ भी नहीं सके क्योंकि उठे तो चेहरा पूरा काट रखा है, काट दिया है ना, कैसे उठाओगे?
44:36ऐसा ऐसा भी change नहीं कर सकते आप, ऐसी हालत होवे तो।
44:41नलियां लगी हुई हो तो।
44:42visualize करना उस situation में क्या होता है।
44:45जो अंदर में साधना है उस time में जवाब दे देगी।
44:49यहां अच्छे बच्चों का पानी पसीना निकल जाता है।
44:54वीर वीर।
44:56वीर वीरता का काम है। जैसे वैसों का काम नहीं।
44:59ये जो अल्प भाव में दो चार भाव में मोक्ष जाने वाले हैं,
45:04क्या वो leader का काम है?
45:07ऐसे time पर तो वो एक ही शरण मात्र है।
45:09है?
45:09ऐसे time में नहीं हर वक्त वो एक ही शरण है।
45:14जो हर वक्त ऐसी शरण लेता है,
45:16वो ऐसे time पे ले सकता है।
45:18वो ऐसे time में ऐसे शरण में रहता है।
45:20एक तो नहीं ले सकता।
45:21क्या?
45:23क्या?
45:23सोचते हैं कि समय बीत रहा है।
45:26नहीं नहीं, हम बीत रहे हैं।
45:29ऐसा समझकर जो जी रहे हैं,
45:32वो जंग जीत रहे हैं।
45:34समय नहीं बीत रहा है, हम बीत रहे हैं।
45:39ये हर पल याद रख कर के जो जी रहे हैं,
45:44वो मैदान-ए-जंग में
45:45जीत रहे हैं।
45:47सबकी बात नहीं है,
45:48वीरों की बात है।
45:51नहीं है।
45:51विरलों की बात है।
45:53ये तो सूर्य का भाव है, सूर्यता का भाव।
45:57Josh आ जाते हैं।
45:58Do or die, आप कौन आता है सामने?
46:00एक मोर नहीं टिकने देते हैं, एक मोर नहीं, सब आपकी cutting हो जाएगा वहां पर।
46:06सुत परे है, हद नहीं चाहिए सुत परे है।
46:09उठा के फेंक देंगे बाहर भेदन में।
46:11और फिर क्या वेदना आवे?
46:12और क्या मस्ती होवे?
46:14भले ही आवे, मेरे boundary के बाहर है।
46:19मेरे boundary के बाहर है मेरे में नहीं है ऐसी प्रथम यथार्थ श्रद्धा जब ही कही जाती है कि ऐसी श्रद्धा के प्रसार के साथ लीनता का प्रथम आत्मा का अनुभव होता है पूरी बातें तो हम भी बोल करके कर देंगे ऐसा नहीं चलता है।
46:47पता नहीं चलता है आपको इस प्रकार का अनुभव हुआ है जब आप ऐसे त्रिकाली ध्रुव को लक्ष्य में रखते हो तब आपको ऐसे वेदन का अनुभव होता है और होता है तो भी आप उसको गौण रखते हो आपका दृष्टि का दौर कहीं फिसलता तो नहीं है उसको कहीं शामिल तो नहीं करते हो ना शुद्ध पर्याय को अपने में।
47:15में।
47:15अगर शामिल किया तो श्रद्धा बराबर नहीं।
47:20शुद्ध पराय को वेदन को शामिल किया तो श्रद्धा बराबर नहीं।
47:24बाहर क्या होता है वो कोई important नहीं है लेकिन श्रद्धा कैसे किया है वो थोड़ा important है।
47:29इसी इसी point के ऊपर तो हरि भाई को निकाल दिया गुरुदेव ने। 32 साल पानी में गए।
47:33हटाओ यहां से।
47:34आतंक धर्म बंद कर दो कोई नहीं लिखता है।
47:38लेकिन ये नहीं चाहिए हमारे को एक भी वेदन को शामिल किया।
47:43वेदन को शामिल किया आत्मा में।
47:44नहीं चाहिए, get out.
47:47पहले पूछा भई गलती से लिखा है, मेरे मानने में नहीं आता है, तुमने गलती से लिखा हो।
47:53मैंने तो ऐसा प्रवचन में कहा नहीं।
47:56कि नहीं, correct है जो लिखा है।
48:00तूने अपना मिलाया है मेरी बात में, तूने अपना मिला दिया है।
48:05प्रवचन तुम मेरे लिखते हो, छापते हो और तूने अपना...
48:11छापते हो और तूने अपनी बात मिला दी।
48:13माफ़ी मांग लो।
48:16और change करो ये statement।
48:18नहीं मैंने जो भी लिखा है बराबर लिखा है।
48:21आत्मा के अनुभव के वक्त ऐसा ही होता है।
48:25या तो मेरे नज़र के सामने 32 साल से जिसने सेवा की निस्वार्थता से।
48:29इतने बड़े-बड़े ग्रंथ लिखे गए।
48:32नहीं तारीफ भी इतनी की है कि इनके जैसा कोई लिखने वाला नहीं मिले।
48:39नहीं मिले।
48:39जब उठाया जब एक second में उठाया।
48:43परमागम sir मंदिर में एकदम खड़ा कर दिया उसको।
48:47बोलो क्या करते हो?
48:49सबके सामने बोलो अब जो भी बोलना है अपन।
48:52मेरे room में आके बोले ऐसा नहीं चलता यहाँ बोलो।
48:56नहीं।
48:56कभी भी सुधर जाओ।
48:58Get out.
48:59गुर्दे की ताकत क्या है इसी point के ऊपर तो है।
49:04उस time में मैं ही था उधर 75 में।
49:0775 में परमागम मंदिर में फंगड़ में। क्योंकि उन्होंने वेदन को अपने अस्तित्व में शामिल किया।