Shri Dravya Drushti Prakash
Also on this day: Shri Dravya Drushti Prakash 1 · Shri Dravya Drushti Prakash 2
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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.
0:28No more in front.
0:56णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते ।
चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे
1:24मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥
1:52purushasanam. ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः
2:20श्री द्रव्य दृष्टि प्रकाश।
पूज्य महाराज जी शोभा ने लिखी आध्यात्मिक पत्र।
पत्र नौमा सत्राध्याय।
उसका अठारहवां।
पाँचवा।
पढ़ो।
पढ़ो।
पढ़ो।
आगे बढ़ते हैं।
अपनी बात को।
2:48अपनी बात को अनुभव से लिखिए उस बात को गुरुदेव के आधार से वचनामृत के आधार से और स्पष्ट करते हैं और जो कल जो चला था वो आखिरी करेगा अरे चैतन्य तेरी इतनी चौड़ाई विस्मित सा कर देती है हे गुरुदेव।
3:16हे गुरुदेव आप कितनी चौड़ाई तक प्रसर चुके हो?
चौड़ाई भी है साथ ही ठोसपना भी।
हे गुरुदेव आपकी वाणी का स्पर्श होते ही मानो विश्व की उत्तमोत्तम वस्तु की प्राप्ति हो गई।
क्या मैं मुक्त होने वाला हूँ?
अरे शास्त्रों में...
3:44अरे शास्त्रों में जिस मुक्ति की इतनी महिमा बखाड़ी, उसे आपके शब्द मात्रा ने इतना सरल कर दिया।
क्या विश्व में अब और भी कुछ चाहना बाकी रह गई?
अरे निरीक्षित वस्तु, राग रहित, अतींद्रिय, आनंद का अपूर्व स्वाद, पूर्व सहज ज्ञान प्राप्त।
यहाँ तक चला था।
4:12ત્યાં તો ચરતો.
હવે આગળ.
ગુરુદેવ કહેતે હૈ.
મારું જ્ઞાન તત્વ જ મને ગમે છે.
ગુરુદેવ કા અંદર કી બાત કાનજી સ્વામીને અંદર કી બાત.
જો અપને પ્રવચનો મેં કી.
વો અંદર કી બાત તો સોગણજીને પકડી.
મારું જ્ઞાન તત્વ જ મને ગમે છે.
જવા આવી દે ને સાહેબ.
4:40मारु ज्ञान तत्व मने गमे सेम नहीं। मारु ज्ञान तत्व ज मने गमे।
पात्र हो।
इसका मतलब के मेरे चैतन्य परमात्मा के अलावा मुझे कुछ भी अच्छा लगता नहीं है और मेरी दृष्टि कहीं जाती नहीं है, कहीं रहना चाहती नहीं।
चैतन्य के साथ बांध दिया।
5:08સાત બંધિયા.
મારું જ્ઞાન તત્વ જ મને ગમે છે.
ગમે તે ક્ષેત્ર હોય, અનુકૂળ પ્રતિકૂળ, ગુરુના સાનિધ્યમાં કે ગુરુના વિયોગમાં.
ક્ષેત્ર પૂછ બી હો.
સાધર્મ્યો કો સંગ હો યા ફિર અસત્સંગ કા વાતાવરણ હો, કુસંગ કે વાતાવરણ હો.
સ્વર્ગ હો નરક હો.
મહેલ હો શમશાન હો.
ગમે તે ક્ષેત્ર હો.
5:36ગમે તે ક્ષેત્ર હોય.
સદગુરુ સાથ હો,
સાનિધ્ય હો,
યા ઉનકા વિરહોપાય.
ગમે તે ક્ષેત્ર હોય પણ પોતાના જ્ઞાનમાં જ વ્યાપીને રહેવું છે.
લેકિન મુજે ક્યાં જાના છે? મુજે તો મેરે જ્ઞાન તત્વમે જ રહેના હૈ.
કૈસે રહેના હૈ? પ્રસન્ન કરકે રહેના હૈ.
ઓ પ્રસન્ન કૈસે હોતા હૈ? કે દ્રષ્ટિ અંદર જાતે હી સર્વાણુમે જો વેદન આતા હૈ...
6:04वेदन आता है।
ये व्यापकता है।
चैतन्य की व्यापकता है, मुझे वहाँ रहना है।
सद्गुरु के सामने है तो भी सद्गुरु मुझे वहाँ रहने को कहते हैं, कहाँ?
अपने चैतन्य में।
और अपने चैतन्य में रहना तो मैं किधर भी रहूँ तो नहीं सकता हूँ।
देखो।
अपने चैतन्य की अनुभूतियाँ में हर जगह हर place...
6:32चैतन्य की अनुभूति हम हर जगह हर place कर सकते हैं। अपने चैतन्य की अनुभूति मंदिर में भी होती है, जंगल में भी होती है। अरे हम bathroom में स्नान करते करते भी अपने चैतन्य की अनुभूति कर सकते हैं। कौन रोकता है? कोई भी क्षेत्र में कोई भी कार्य करते करते हमको अगर अपने चैतन्य में रहना है तो रह सकते हैं और वही हमारा क्षेत्र बाकी।
7:00क्षेत्र बाकी क्षेत्र तो ये permanent नहीं।
आज देखो यहाँ है office यहाँ से छोड़ के जाना है।
कितना भी अच्छा लगे।
लेकिन क्षेत्र पर क्षेत्र पर क्षेत्र और स्वक्षेत्र स्वक्षेत्र।
बाकी सबको अपने अपने घर जाना है।
हम तो कबहुँ न निज घर आए।
पर घर फिरक बहुत दिन बिते।
7:28फिर बहुत दिन बीते, नाव अनेक चलाए।
अब हम कबहुँ न निज घर आए।
ये कोई घर अपना नहीं है।
ना ये चिंचनी अपना है, ना वो जहाँ जाने वाले हैं वो घर अपना है।
क्या? Bangalore, Bellary, Hyderabad, Secunderabad, ये कोई घर अपने थोड़े हैं?
7:56ये जो घर कोखा है ना ये भी घर है।
ये भी अपना नहीं है।
सब संयोग है, संयोग है तो वियोग।
संयोग होवे तो खुशी होवे।
वियोग होवे तो दुख होवे।
और मैं तो इन दोनों को जानने वाला चैतन्य परमात्मा हूँ।
मुझे मेरे क्षेत्र में रहना है, मुझे तो मेरा ज्ञान तत्व ही अच्छा लगता है।
ना वो घर अच्छा लगता है ना ये चिन्तन।
8:24ना वो घर अच्छा लगता है ना ये चीटनी का घर अच्छा लगता है।
ना महल अच्छा लगता है ना जंगल अच्छा लगता है।
ना सत्संग अच्छा लगता है ना कुसंग बुरा लगता है।
कुछ neutral भाव, इतरभाव।
जैसा picture में role आता है।
और जैसा-जैसा shooting होती है, हो गई है shooting तो।
जो-जो बनेगा हम जानने देखने वाले हैं।
हम...
8:52ને દેખને વાલે હૈ.
હમકો યહાં સે નહીં ખિસકના હૈ.
ગુરુદેવ કહેતે હૈ કે મારુ જ્ઞાન તત્વ જ મને ગમે છે.
ગમે તે ક્ષેત્ર હોય.
પણ પોતાના જ્ઞાનમાં જ વ્યાપીને રહેવું છે.
જ્ઞાની જિસકો આત્મદર્શન હો ગયે હૈ.
એસા પુરુષ એસી આત્મા.
પુણ્ય પાપ.
જે બુરે ભાવ જે મન મેં આતે હૈ વો.
ઓર શરીર જડ.
કે...
9:20કેશ એ બંનેને નિમિત્ત થનારા જગતના પદાર્થો નિમિત્ત એમાં અવગાહન કરતો નથી.
કુશમેવું રહેતા નહીં.
બસ જિનકા ચિત્ત ગુપા મેં આનંદ આનંદ મેં રહું.
9:48कहाँ रहते हैं मुनिराज?
हमको लगता है मैं छोड़ दिया वो जंगल में।
बिल्कुल नहीं।
मुनिराज चैतन्य जी की गुफा में रहते हैं।
वहाँ उनका वास है, वहाँ उनका बसेरा है।
अपना घर तो वो है, permanent घर है।
अपना घर अगर होता तो अपने को छोड़ के क्यों जाता?
जो छूट जावे वो हमारा धर्म है।
10:16કેટલા ભી અચ્છા હો લેકિન જો છૂટ જાયે વો હમારા નહીં.
જો શાશ્વત હૈ વો હમારા.
જો હમસે કભી અલગ ના હો એ બિછડે નહીં વો હમારા નહીં.
જ્ઞાની પુણ્ય પાપ,
શરીર,
કે નિમિત્તમાં અવગાહન કરતો નથી, ત્યાં રહેતો નથી, ત્યાં એનો વાસ નથી.
પણ ક્યાં રહે છે પછી જ્ઞાની?
પણ...
10:44જ્ઞાની પણ પોતાના જ્ઞાન સ્વરૂપી ગગન મંડળમાં જ વ્યાપે છે.
ચૈતન્ય વિહારી હૈ.
પોતાના જ્ઞાન સ્વરૂપી અસંખ્ય પ્રદેશી ગગન મંડળ.
કેટલા વિસ્તૃત મંડળ હૈ ચૈતન્યનું.
એમાં જ વ્યાપે છે, એમાં જ રહે છે, એમાં જ એમાંથી બહાર નીકળવું એને ગમતું નથી.
11:12इन्हें गम तो नहीं।
ये गुरुदेव का statement है, अशोकानी जी को उद्गार दे दो।
देखी गुरुदेव की ज्ञानानंद मस्ती।
देखो, कितना प्रमोद व्यक्त किया है।
Police ने वाले, आप बोलते हैं ना, कथा में क्या रहते हो, गुरु से दूर, आ जाओ संगट, गुरु के चरणों में, मुक्ति मिल जाएगी, जल्दी से आगे बढ़ोगे।
11:40मिल जाएगी जल्दी से आगे बढ़ोगे।
बोले आपने गुरुदेव के वचन बराबर सुने नहीं।
गुरुदेव क्या कहते हैं?
गुरुदेव कहते हैं कि कोई क्षेत्र अपना नहीं है।
कलकत्ता खराब और सोनगढ़ अच्छा?
नहीं नहीं वो भी मेरा घर कहाँ है?
मेरा घर वो है और आप मेरे को वहाँ से वहाँ भटकाते हो।
आपने गुरुदेव के वचन बराबर सुने नहीं।
12:08नहीं।
मुझे अब अटकना नहीं है, मुझे तो गुरुदेव की ये बात पसंद है।
कौन सी बात?
कि बाहर का कोई भी क्षेत्र अपनाना, मेरा ज्ञान तत्व ही मेरा क्षेत्र है।
और वो तो कलकत्ता में भी है मेरे पास।
मुझे मेरे चैतन्य घर में रहने के लिए train पकड़ कर के सोमगढ़ आने की, गुरु चरणों में रहने की, मुझे कोई जरूरत नहीं।
मैं जहाँ हूँ वहाँ, जैसे गुरुदेव अपने लगन मदन में...
12:36जैसे गुरुदेव अपने गगन मंगल में विहार करते हैं।
अपने ज्ञान गगन में रहते हैं, घूमते हैं, विहार करते हैं।
बस मैं तो गुरुदेव की copy करूँगा।
गुरुदेव के मार्ग पे जाना है ना, जिस पद पर गुरुदेव जाते हैं, उस पद पे मुझे जाना है।
तो मुझे कहाँ जाना है, मुझे क्या करना है, कि जैसे गुरुदेव अपने चैतन्य गगन में विहार करते हैं, ऐसे मैं...
13:04करते हैं ऐसे मैं भले ही गुरु से दूर हूँ तो क्या हो गया लेकिन मैं उनका ही शिष्य हूँ जिस पद पे वो चलेंगे उस पद पे ही मैं चलना चाहता हूँ मैं यहाँ कलकत्ता में बैठे बैठे अपने चैतन्य का घर में विहार करना चाहता हूँ देखो तकलीफ तो होए गुरु विरह गुरु का सानिध्य नहीं हो क्योंकि गुरु के सानिध्य में।
13:32क्योंकि गुरु के सानिध्य में रहने से अपनी साधना बहुत अच्छी होती है।
उपयोग को दो एक ही दो जगह में से एक जगह रहता है या स्व में या अंदर में चैतन्य में रहता है या तो फिर बाहर रहता है।
और साधना की निम्न कक्षा में शुरुआत हो आत्मदर्शन के बाद जो सारा...
14:00दर्शन के बाद जो साधना होती है वो beginning प्रारंभिक साधना है प्रथम गुणस्थान में वहाँ पर अंदर उपयोग बहुत कम रहता है और बाहर ज़्यादा रहता है तो इसीलिए बाहर करने वाले उपयोग को ऐसा सानिध्य चाहिए कि वो संसार में न फँस जाए और वो सानिध्य उसको बार-बार।
14:28वो सानिध्य उसको बार-बार अपने मूल तत्वों की, मूल घर की याद दिलाता है।
धक्का मारेगा, यहाँ क्यों आए? जा तेरे घर में।
ऐसा सानिध्य चाहिए और ऐसा सानिध्य क्या है? किसका साथ है?
सद्गुरु का साथ।
इसीलिए सद्गुरु के साथ में रहना अच्छा लगता है और विरह होता है तो अच्छा नहीं लगता है।
फिर भी सद्गुरु ने चैतन्य घर दिखा दिया है।
14:56सद्गुरु ने चैतन्य घर दिखा दिया है।
इसीलिए,
जैसे सद्गुरु अपने चैतन्य घर में रहते हैं,
और मजे में हैं,
इसी प्रकार मैं भी चाहे कोई भी क्षेत्र हो,
कहीं भी हो, संयोग में या वियोग में, मन में या उपवन में,
महल में या जंगल में,
मैं तो मेरे चैतन्य घर में ही रहना चाहता हूँ।
कहते हैं कि देखो गुरुदेव।
15:24कहते हैं कि देखो गुरुदेव के वचन।
कैसे भूल गए आप?
आप मुझे ऐसा लिखना था कि आप अपने चैतन्य गगन में रहो।
क्या?
इसके बदले आप तो बोलते हैं कलकत्ता छोड़ो सोनगढ़ आओ।
और जबरदस्ती करते हो।
कि नहीं आना होता है तो।
कि विकल्प नु काई आवी नहीं।
मैंने बेकार सा विकल्प किया और कुछ फायदा नहीं हुआ।
15:52विकल्प किया और कुछ फायदा नहीं हुआ।
लिख दिया कि विकल्प से होता है तो फिर बात ही क्या थी तो तो अभी mock में चले जा।
लेकिन क्या फायदा विकल्प का विकल्प से होता ही नहीं है।
विकल्प विकल्प में और कार्यो...
जो शुरुआत में first paragraph में लिखा था ये बात।
मुझे तो ऐसी भावना भी नहीं करनी है कि गुरु के वियोग वाला जो ये पाप का उड़े है वो पलट करके पुण्य का उड़े होवे सद...
16:20के पुण्य का उड़े होवे सतगुरु मिले सामने।
ऐसा ऐसी पुण्य की भावना भी ऐसी परावलंबी भावना भी मुझे नहीं करनी।
मुझे नहीं चाहिए परानुभूति।
मुझे नहीं चाहिए सहानुभूति।
मुझे तो चाहिए स्वानुभूति।
क्या?
और गुरु ने मुझे मेरा परमात्मा दिखा दिया है।
वही मुझे पसंद है।
16:48वही मुझे पसंद है। गुरुदेव को अपना ज्ञान तत्व पसंद है, मुझे मेरा ज्ञान तत्व पसंद है।
मैं वहां से बाहर क्यों निकली?
बाहर में तो Kolkata हो या Sonagadh हो।
क्या फर्क पड़ता है?
Kolkata भी मेरे क्षेत्र से बाहर है और Sonagadh भी मेरे क्षेत्र से बाहर है।
मुझे कोई choice नहीं है। Kolkata पूरा Sonagadh अच्छा।
17:16સંગઠ અચ્છા ગુરુ કા વિયોગ બુરા ઔર ગુરુ કા સંયોગ અચ્છા હો.
નહીં.
હો તો બહાર નિકલતે હૈ તો ફિર ક્યા વિવેક કરના હો બાત હૈ.
નહીં બહાર નિકલે તબ કી બાત હૈ મેં તો બહાર નિકલના ચાહતા.
મને તો મારું જ્ઞાન તત્વ જ ગમે છે.
ગમે તે ક્ષેત્ર હોય.
પણ પોતાના જ્ઞાનમાં જ વ્યાપીને રહેવું છે.
17:44વ્યાપીને રહેવું છે.
જ્ઞાની પુણ્ય પાપ શરીર કે નિમિત્તમાં અવગાહન કરતો નથી.
પણ પોતાના જ્ઞાન સ્વરૂપી ગગન મંડલમાં જ વ્યાપે છે.
દેખી ગુરુદેવ કી જ્ઞાનાનુ મસ્તી.
ગુરુદેવ કા વો જે વચન હૈ ઉસકે પર ધ્યાન આકર્ષિત કિયા હૈ.
પોલો મેં કહાં જાઓ.
Kolkata છોડકરકે.
18:12कलकत्ता छोड़ कर के सोनगढ़ आऊँ कि कलकत्ता को दृष्टि हटा कर के अंदर चैतन्य में दृष्टि लगाऊँ?
मैं कौन सी भावना बनाऊँ?
भावना तो वो भावना है कौन सी तीव्र भावना बता दिया ना आगे।
कौन सी भावना?
प्रदेश से प्रदेश से।
मैं मात्र चैतन्य चैतन्य व आनंद आनंद की ओतप्रोत वस्तु हूँ।
18:40प्रोत वस्तु ऐसी तीव्र भावना एक बार अवश्य अवश्य भा लेना चाहिए।
एक बार तो भाना ही चाहिए जोरदार।
ताकि दृष्टि बाहर से पलट करके अंदर आ जाए।
फिर एक बार अंदर आया तो फिर तभी बाहर जाएगी।
संसार का रस हमेशा के लिए खत्म हो जाएगा।
सहज आनंद का समुद्र सहज में उमट पड़ेगा।
19:08सहज में उमड़ पड़ेगा।
ये भिखारीपना सब हमेशा के लिए चुमंतर हो जाएगा।
भावना तो ऐसी भावना है, भावना ऐसी नहीं भावना है कि पाप का उदय मिट जाए और पुण्य का उदय हो जाए।
ऐसी भावना नहीं भावना।
ये संयोग की भावना अच्छी नहीं है।
ये चैतन्य का अपमान है, परमात्मा का अपमान है।
ये भिखारी को मुक्ति नहीं मिलती है।
मैं परमात्मा हूँ, ऐसे...
19:36परमात्माओं ऐसी मान्यता ऐसी श्रद्धा वाले को ही मुक्ति मिलती है।
और परमात्मा कहीं भीख मांगता नहीं।
ये समझ में आता है।
आगे कहते हैं गुरुदेव के ऊपर बहुत महिमा आती है।
कलकत्ता में बैठे-बैठे गुरुदेव के वचन का रहस्य वो समझते थे।
और यहाँ सोनगढ़ में बैठे-बैठे लोग गुरुदेव का वचन का रहस्य नहीं समझते थे।
देखो तो लीला है।
20:04देखो तो लीला है।
कैसी लीला है?
होना तो उल्टा चाहिए था। गुरुदेव के आजू-बाजू वालों को आत्मा की महिमा है।
वो कोई क्षेत्र की पुण्य योग की महिमा ही नहीं है।
हर lecture में गुरुदेव बोले पुण्य को तो झाड़ू लेकर मारते।
डंडा लेकर।
फिर भी देखो।
गुरुदेव के सानिध्य में रहना।
दूर तो नहीं रहना है।
क्या?
पूजा-व्रती करना। वो पूजा-व्रती में हर...
20:32दिखाना वो पूजा भक्ति में हर हर प्रवचन में डांटे इसको ये रास्ता नहीं है ये प्रभु का मार्ग नहीं है ये वितराग का मार्ग नहीं है।
और ये रोज सुने और रोज उसका ही अवलंबन।
अभी गुरुदेव की tape तो लगानी थी इसके बाद आपका आपका क्या lecture?
गुरुदेव का lecture।
भले समझ में नहीं आए तो नींद ले सकते हो।
सुनते सुनते।
और समझ में नहीं आता है अंदर में मालूम है लेकिन दबाते नियम बना लिया।
21:00एक डब्बा से नियम बना लिया।
कि भई यहाँ तो सुबह में tap ही चलेगा।
तो भई क्या होता है?
कि 8 से 9 tap हो तो पौने 9 बजे हाजिरी पूराने के लिए आ जाऊँ।
कौन सी गाथा चल रही?
कौन सा अर्थ कर रहे हैं?
भगवान को मान रहे हैं।
क्या?
हर मंदिर में ऐसा हो गया।
और कानून बनाया गया है कि यहाँ पर गुरुदेव जी tap ही चलेगा।
21:28देख।
कहता कितना है 24 घंटे में मान मान 1 घंटा 2 घंटा मिलता है। इसमें 1 घंटा अभिषेक पूजा में चले जाता हूँ।
बाकी जो 1 घंटा रहता है गुरुदेव की tape समझ में आवे नहीं आवे सुनना है बस।
एक कान को मोक्ष दिलाना है। किसको?
कान को।
आत्मा को क्या जरूरत?
कान के कान में घुस जाएंगे ना कुछ भी आवाज समझ में आवे नहीं आवे कोई बात नहीं है।
कम से कम...
21:56कोई बात नहीं है।
कम से कम कान का मोक्ष तो हो जाएगा।
अपुन भले ही भटके, हमका आत्मा है।
बाबूजी को बोलना कि कान को मोक्ष दिलाना है आपके।
आगरा जाते हो ना बोलना।
आपका कान को मोक्ष हो जाएगा, आपको तो नहीं होगा।
बोल दिए हमने पूछा तो बोले बोल रहे थे कि बाबूजी के आत्मा का मोक्ष नहीं होगा जब तक ये change नहीं करेंगे।
कान का मोक्ष जरूर होगा।
ये हृदय की वाणी जो मिलती है।
22:24ये गुरुदेव की वाणी जो मिलती है।
पांव को सुनाओ।
पांव जी को बोलो।
आपको बहुत याद करेंगे। बहुत miss miss किए हैं miss।
पकड़ के सुंवाएंगे।
पकड़ के कान पकड़ के सुंवाएंगे।
क्या?
पूरा lecture सुनाओगे तो बात जाएंगे। थोड़ा ये जो गालियां दी है ना वो सुना दो।
कमरे में कान में बांध के बाहर से कड़े ना।
पहले ये सुनो।
देखो क्या कहते हैं।
22:52देखो क्या कहता हूँ।
कि गुरुदेव की कथन शैली तो देखो।
गुरुदेव की कहने की style तो देखो।
कहते हैं कि अशुद्धता रोकाई जाए।
अशुद्धता रोकाई जाए से।
इतले।
इतले के अशुद्धता प्रगट ज थती नथी।
चैतन्य में जब उपयोग जाता है।
तो पुण्य पाप के भाव जो अशुद्धता है वो रुक जाती है।
23:20પુસ્તકમાં અર્થ નીકળે ગુરુદેવને.
કે અશુદ્ધતા રોકાઈ જાય છે એટલે શું?
અશુદ્ધતા ઉત્પન્ન થતી નથી.
તેને અશુદ્ધતાને રોકતો એમ કહેવાય છે. ખરેખર રોકે છે ક્યાંથી?
પહેલા અશુદ્ધતાને જાણે.
પછી એને ગૌણ કરીને વિકલ્પોને.
પછી અંતરમાં ચૈતન્યને જાણે.
ત્યાં ચૈતન્યને જાણવાનો ઉપયોગ રોકાય.
23:48જ્યારે ચૈતન્યને જાણવાનો ઉપયોગ રોકાય, ત્યારે શું થાય?
કે અશુદ્ધતા એની મેળે રોકાઈ જાય છે.
પછી એના પર આરોપ આવે કે જો એણે શું કર્યું?
અશુદ્ધતાને રોક્યું.
પુણ્ય પાપ કે ભાવો કો નિર્મૂલ કર દિયા. નિર્મૂલ થોડા કિયા હૈ પુણ્ય પાપ કે ભાવો કો.
પુણ્ય પાપ કે ભાવો તો મન મેં હૈ.
ઓર ઇસને અપના જ્ઞાન કા ઉપયોગ અપને ચૈતન્ય મેં કર દિયા.
પર વોનો ઉપયોગ અલગ હૈ.
24:16प्रभाव उपयोग लग गया तो क्या हुआ?
कि मन में पुण्य पाप के भाव बंद हो गए।
निर्विकलता आ गई अपने आप।
किसी क्रोधादि भाव को हटाया नहीं।
कोई भी क्रोध मान माया लोभ के भाव हैं,
जो अशुद्ध भाव हैं,
वो हमारे चैतन्य परमात्मा के दर्शन करने में बाधारूप नहीं हैं।
क्यों?
कि ये...
24:44कि ये जितने भी पुण्य पाप के भाव हैं, विकारी भाव हैं, वो कहाँ हो रहे हैं? आत्मा में कि मन में?
मन में।
और हम तो चैतन्य आत्मा हैं, वो तो अलग ही है।
ये ये हाथ में दर्द हुआ है, तो पट्टी इधर क्यों बांधना?
इसको क्या हुआ है? ये तो काम कर सकता है।
लेकिन हमने मन में राग द्वेष हुए,
और हमने पट्टी इधर लगा...
25:12और हमने पट्टी इधर लगा दी कि हाँ इधर इसको हटा देना राग में। कैसे हटाओगे? यहाँ तो है ही नहीं चैतन्य में राग में।
नहीं हम इसलिए आत्मदर्शन नहीं कर सकते हैं क्योंकि हम संसारी हैं, रागी द्वेषी हैं, पामर हैं, हमको शास्त्र का अनुभव नहीं है, पूजा पाठ आती नहीं है।
और इतनी सारी जिम्मेदारी है घर की, दुकान की, सबकी। अब हमको आत्मदर्शन कैसे होगा?
अरे भैया घर भी तेरे से अलग है।
25:40अलग है।
और अंदर में मन में जो राजगुष होते हैं वो भी तेरे से अलग है।
का तेरे में घुस गए?
तुम मानते हो कि तेरे में घुस गए।
पर ये बंध का का है? ये रुकावट है।
क्रोधमान माया लोग रुकावट नहीं है।
लेकिन मैं क्रोधी हूँ, मैं रागी हूँ, मैं द्वेषी हूँ, मैं ग्रस्त हूँ।
और मैं परमात्मा नहीं हूँ ऐसा मानना वो बड़ी रुकावट है।
क्रोधमान माया लोग के परिणाम...
26:08क्रोधादि माया लोक के परिणाम तो जब तक हम पूर्ण वितराग नहीं होंगे तब तक तो रहेंगे।
ज्ञानी को भी क्रोधादि भाव होते हैं।
क्रोधादि भाव करना नहीं चाहता कोई भी लेकिन जब तक पूर्ण वितराग नहीं होंगे तब तक ये भाव उत्पन्न हुए बिना रहेंगे।
फिर ज्ञानी क्या करते हैं?
जांचते हैं।
जान करके गौण करके अपने चैतन्य की दृष्टि करते हैं, खत्म बात।
चैतन्य...
26:36चैतन्य की दृष्टि करते करते अंदर की स्थिरता बढ़ाते बढ़ाते और पुण्य पाप में नहीं उलझते उलझते उनको गौण करते करते उसकी यात्रा आगे बढ़ती है।
और जल्दी से मोक्ष में चले जाते हैं।
बीच में रुकता नहीं है कि ऐसे भाव क्यों आए हटाओ उसको ऐसे भाव क्यों आए ऐसा हटाओ उसको।
ये आने दो ना ये मन में आते हैं।
आप अपने अंदर ज्ञान में ज्ञान...
27:04आप अपने अंदर ज्ञान में ज्ञान से direct आत्मा को देख लो और गाड़ी आगे बढ़ाओ।
पर रास्ते में खड्डा आया तो क्या करोगे?
रुक जाओगे?
बाजू से चले जाओ।
खतम।
अपनी यात्रा क्यों रोकते हो? मेरे में इतनी सामर्थ्य है तो अभी मेरे को अब कैसे वो करना? रुकना क्या?
उसको overtake करो, चले जाओ अपनी गाड़ी।
देखो।
इतना सरल है लेकिन हमको अपनी...
27:32इतना सरल है लेकिन हमको अपनी पर्याय को देखते हैं तो हमारे में योग्यतार नहीं है।
हमको ज्यादा सोचन का डर लगता है।
सोचन का डर है तो गुरु के चरण में रहो और गुरु बोले ऐसा तो।
क्या?
सोचन का डर लगता है कहीं गिर ना जाऊं भैया तुम गिरे हो ही हो।
चले कब हो?
ये गुरु की बात है ना गुरु क्या कहते हैं?
कि मन में आए हुए विकारों को तुम care मत करो तुम अपने परमात्मा में लीन होकर के रहो।
28:00दीन नौकर के रहो।
अब ये बात नहीं मानता है।
अब बाना क्या बताता है?
कि ऐसा करेंगे तो फिर पाप पुण्य का ध्यान नहीं देंगे तो पाप पुण्य बंद कैसे होंगे?
क्या? तो हम और तो गिर जाएंगे।
गुरु के वचन पे विश्वास नहीं।
गुरु को नहीं मालूम है कि ऐसा भी एक खतरा है।
कि राक्षस होते हुए भी राक्षस को बाजू पे रख कर के अगर हम आत्मा का दर्शन करेंगे, अगर नहीं हुआ...
28:28हम करेंगे अगर नहीं हुआ तो राग द्वेष और बढ़ जाएगा। गुरु को नहीं मालूम है।
फिर भी क्यों बोलते हैं हमारे गुरु?
क्योंकि गुरु इस रास्ते से गुजर चुके हैं।
और वचन का डर लगता है वो भाषा है असल में उसको गुरु की आज्ञा मानना ही नहीं। क्यों?
कि गुरु के वचन के ऊपर उसको पूरा विश्वास नहीं।
क्यों गुरु के वचन पे विश्वास नहीं है?
क्योंकि...
28:56नहीं है।
क्योंकि इसका अंतःकरण शुद्ध नहीं है।
उसके कहाँ अपने आत्मा से प्रेम है।
ना खुद अपने आत्मा को देखता है, ना गुरु बता-बता के उस रास्ते से जाकर के अपने आत्मा को देखता है।
देखो, ये कितनी बड़ी गड़बड़ है।
और फिर बोलता है, हम तो इसीलिए आत्मा को नहीं देखते हैं और पुण्य पाप को बंद करना चाहते हैं ताकि स्वच्छंदता हो जाए।
एक गुरु की आज्ञा नहीं मानना ये स्वच्छंदता है।
29:24गुरु की आज्ञा नहीं मानना ये स्वच्छंद नहीं है।
इतना बहानाबाजी क्यों?
इतनी सारी।
गुरु बोले ऐसा कर।
फायदा नहीं हुआ वापस आकर के मिलो।
देखो आपने बोला ऐसा किया लेकिन मुझे लगता है कि मेरे परिणाम और ज्यादा बिगड़ गए।
पहले राग द्वेष में ध्यान देता था तो control में थे।
अब राग द्वेष को ध्यान देना छोड़ दिया।
और जैसे बोले ऐसे चैतन्य में दृष्टि लगाई।
लेकिन मेरे को तो फायदा नहीं हुआ।
29:52लेकिन मेरे को तो फायदा नहीं हुआ। मेरे को ऐसा लगता है कि रात में स्वर बढ़ रहे हैं।
आकर के बोलना।
आपकी दवा ली है तो फायदा होना चाहिए ऐसा क्यों नुकसान हो रहा है? लेकिन दवाई नहीं लिया है।
क्यों नहीं लिया? डर लगता है, स्वच्छंद नहीं हो जाए।
स्वच्छंद न हो जाए।
अब फायदा नहीं हो रहा, ऐसे ही फायदा नहीं हो रहा, ये स्वच्छंद नहीं है। गुरु की बात नहीं मानना वो स्वच्छंद है।
स्वच्छंद करने वाले...
30:20स्वचन करने वाला स्वचन से डरता है।
स्वचन करते जाता है, करते जाता है और बात पूछे तो क्या बोलता है?
मुझे डर लगता है कहीं स्वचन ना हो जाए।
कैसी अटपटी बात लगती है।
देखो ये हमारी बुद्धि हमको misguide करती है।
स्वचन कैसे होता है वो हमको पता नहीं था।
एक बकरी को निकालने गया।
पीछे से ऊंट बैठ गया।
30:48बैठ जाएगा।
अब उसको कैसे निकालोगे? बकरी को तो लकड़ी लेके हटा दिए।
उनको लगाना एक लात मारेगा तो...
ये सब गति से बाहर निकल जाएगी।
क्या? लकड़ी टूट जाती है मारे तो।
क्योंकि पूरा हड्डी का ढांचा है, हड्डी को मारो लकड़ी तो क्या होता है?
हड्डी नहीं टूटती है, लकड़ी टूट जाती है।
उनको कैसे हटाओगे?
ये स्वचयन से डरने से डरने से और गुरु भावना नहीं मानने से...
31:16गुरु आज्ञा नहीं मानने से।
गुरु आज्ञा नहीं मानने का स्वच्छंद आ गया पीछे से।
तो ये आता है। और गुरु ने कहा है कि भैया तुम राग द्वेष को छोड़ो, ये पंचावस्थाओं को, ये हटाना छोड़ो, अपने चैतन्य में दृष्टि लगाओ।
नहीं नहीं फिर हम नहीं ध्यान देंगे राग द्वेष पे तो राग द्वेष बढ़ नहीं जाएंगे?
कहीं स्वच्छंद ना हो जाए।
फिर क्या हुआ?
फिर।
31:44फिर गुरु को मालूम है कि तेरे को मालूम है रास्ता।
गुरु को नहीं मालूम है कि हम रागी द्वेषी संसारी हैं।
नहीं मालूम।
फिर भी हमको क्या बोलते हैं? ऐसा नहीं बोलते हैं पहले संसार छोड़ के आओ।
पहले बीड़ी पीना छोड़ के आओ।
पहले खाना पीना छोड़ के आ जाओ, झूठ मत बोलना, खबरदार झूठ बोला है।
अगर झूठ बोला है तो आत्मज्ञान नहीं होगा, दो नंबर का धंधा बंद करो पहले।
चलो।
सब छोड़ के...
32:12सब छोड़ के आ जाओ घर बार सब दुकान दुकान तो।
इसके बाद आत्मा का दर्शन होगा तब तक नहीं होगा। तो आप लोगों में से कितने लोग आएंगे गुरु के पास?
कितने लोग आएंगे?
अगर ऐसी शर्त गुरुदेव रखे,
क्या? शांति चाहिए आत्मा का दर्शन करना।
और आत्मा का दर्शन करना है तो,
सब छोड़ के आओ।
घर बार रुपया नाम इज्जत सब।
क्या?
32:40इज्जत सब।
क्या?
छोड़ के फिर मेरे पास आओ मैं तुझे आत्माओं के दर्शन करने की दवा देता हूँ।
और फिर तुझे आत्मा का दर्शन होगा।
झूठ नहीं बोलना, खाना नहीं खाना, पीना नहीं, कुछ नहीं दूसरा।
चार नहीं करना, द्वेष नहीं करना, कुछ भी नहीं करना।
ऐसा बोले तो कितने लोग आएँगे?
फिर तो सुधर गया फिर गुरु की ज़रूरत क्या है?
ऐसे की तो ज़रूरत ही नहीं है अगर ऐसा है तो।
33:08की तो ज़रूरत ही नहीं है अगर ऐसा है तो।
गुरु की ज़रूरत किसको है?
गुरु की ज़रूरत तो पामर जीवों को है।
क्योंकि पामर जीवों को प्रभु के दर्शन नहीं हुए।
तो ऐसे पामर जीव हमारे सामने आवे तो गुरु क्या कहे?
कि नहीं पहले सब राग द्वेष मिटाओ।
शास्त्र इतने सारे पढ़े सबका अभ्यास करो।
इतनी प्रार्थना करो इतना ये करो पहले हमारे धर्म में आओ।
सच्चे देव गुरु शास्त्र को मानो।
33:36सच्चे देव गुरु शास्त्र को मानो तुम्हारा ये धर्म नहीं झूठा है। सब छोड़ो।
क्या?
थोड़ा भी क्रोध मान माया लोभ नहीं होना। थोड़ा भी क्रोध मान माया लोभ नहीं होना तो तो फिर उसको गुरु की जरूरत ही क्या है?
ये गलत।
गुरु ऐसा नहीं बोलते हैं कि पहले सब छोड़ के आओ। गुरु ऐसा बोलते हैं कि पहले चैतन्य में दृष्टि करो।
आत्मा का power मिलेगा, परमात्मा का साथ तुझे मिलेगा।
34:04परमात्मा का साथ तुझे मिलेगा।
तो ये तो सब विराम, ये क्रोध, मन, माया लोग तो अपने आप भाग जाएंगे।
हम लोग क्रोध को मिटाना चाहते हैं, भगा भगा मिटाना चाहते हैं।
गुरु बोलते हैं मिटाने की जरूरत नहीं है क्रोधादि भावों को।
पाप और पुण्य के सारे मन के विचार हैं।
उनको मिटाने की कोई जरूरत नहीं है।
तुम अपने चैतन्य की दृष्टि करो।
परमात्मा की दृष्टि करो।
परमात्मा की दृष्टि करने में करने...
34:32मन की दृष्टि करने में, करने में, ये जितने भी पाप पुण्य के भाव हैं, वो बाधारूप नहीं हैं। क्यों नहीं हैं?
क्योंकि ये विचार कहाँ होते हैं? चैतन्य में होते हैं कि मन में होते हैं?
फिर आपको क्या फिक्र करना है? आप कौन हो?
चैतन्य।
चैतन्य चैतन्य का काम करे और मन, मन का काम करे। तकलीफ कहाँ है?
पड़ोसी अपने घर में रहे, और आप अपने घर में रहो, तकलीफ कहाँ है बताइए?
35:00कहाँ है बताइए?
Even एक ही घर में रहने वाले सब लोग,
दांत में मेरे को दर्द है तो कौन लेता है मेरा दर्द?
माँ, बाप, भाई कौन लेता है? पत्नी, पति कौन लेता है?
देखो कितने स्वतंत्र हैं हम लोग?
साथ में एक ही घर में रहने वाले भी कितने स्वतंत्र हैं, विचार कितने अलग-अलग हैं।
सबकी आदतें कितनी अलग-अलग हैं।
ऐसे मन की आदत अलग है और चैतन्य की आदत...
35:28और चैतन्य की आदत दोनों के स्वभाव में fair है।
मन जड़ है और परमात्मा चेतन है।
और चेतन होकर के जड़ की भीख मांगे कि मन हे भगवान हाथ जोड़ता हूं हे मन राग द्वेष के विचार नहीं करना क्यों कि मुझे मेरे परमात्मा के दर्शन करना है।
कौन भीख मांगता है?
किसकी?
जड़ मन की।
ये गलती हो रही है।
35:56जड़ को तो मालूम नहीं है कि मुझे कौन नमस्कार करता है। उसको कहाँ पता है कि चेतन कौन है और जड़ कौन। जड़ को ये भी पता नहीं है मन को कि मैं मन हूँ।
उसको भी जानने वाला कौन है?
फिर भी ऐसे बुद्धू जड़ पत्थर,
उसके पास आकर के परमात्मा भीख मांगे।
हे भगवान, आज बोलता हूँ राजवेश मत करना भाई।
क्यों मुझे ऐलान करते हो?
और जी...
36:24और जितना वो पैर पड़ता है, पैर पड़ने से वो थोड़ा सुनता है, उसको तो कान ही नहीं है, मन को कान है?
मन को कान है क्या? मन को आँख है क्या?
मन जड़ है।
वो कैसे हमारी बात सुनेगा? वो मानता ही नहीं, राग द्वेष करते रहता है।
और हम चाहते हैं कि हमको हमारे परमात्मा के दर्शन होवे, इसीलिए पहले मन, मन को सुधर जाना चाहिए, राग द्वेष से दूर होने को, इसके बाद में आत्मा में जाना।
36:52आत्मा में जाना।
गुरु ने सीधा सरल रास्ता बताया कि भैया देख,
ये भीख मांगना छोड़ दे।
ये पुण्य पाप के भाव, पुण्य पाप के भाव मन में होने दे, तुम उनको रोकने के लिए भी मत जा।
तेजे पहले सबसे पहले आत्मा में दर्शन कर ले।
तो ज्ञान के द्वारा तुम अपने चैतन्य में दृष्टि कर। कैसे करने को बोले थे अपने को?
मंत्र दिया था?
प्रदेश ही प्रदेश ही।
37:20प्रदेशे प्रदेशे।
में मात्र एतन चेतन व आनंद आनंद की ओत प्रोत वस्तु हूँ। ये मंत्र है। ये भगवान तक direct पहुँचने का। मन भले राग द्वेष करे।
जब इधर दृष्टि हुई परमात्मा के दर्शन हुए तो क्या हुआ देखो गुरुदेव के वचन।
गुरुदेव की कथन शैली तो देखो।
37:48કે કથન છે નહીં તો દેખો કહેતે હૈ કે અશુભતા રોકાઈ જાય છે એટલે કે ચૈતન્ય કી દ્રષ્ટિ હોય તો પુણ્ય પાપ કે ભાવ અપને આપને જોગે બિના હટાએ હટ ગયે.
અશુભતા રોકાઈ જાય છે એટલે અશુભતા પ્રગટ થતી નથી તેને અશુભતાને જોગતો એમ કહેવાય.
અસલ મેં રાગ દ્વેષ કો હટને નહીં ગયા હતા.
સાધના કરને વાલા...
38:16साधना करने वाला जीव राग द्वेष के सामने देखता भी नहीं। किसके सामने देखता है?
और गुरु ने यही कहा कि भैया तुम राग द्वेष कितने हो रहे मत गिना मेरे को।
Direct परमात्मा की दृष्टि करो।
क्या?
फिर अवलोकन करने को काहे को बोला था? राग द्वेष को देखो।
अब ये सवाल होगा यहाँ पर।
आपके यहाँ direct तो ऐसा नहीं बोलते हैं कि चेतने की दृष्टि करो।
पहले अवलोकन करो और अवलोकन में किसको देखना था?
38:44अवलोकन करो। अवलोकन में किसको देखना था?
साग देश के मन में चलने वाले भावों को।
क्या वजह है?
ये ये उसका operation करने का नहीं था, X-ray निकालने का था।
हटाने का नहीं था, हटाने को काम हुआ है अवलोकन।
कि क्रोध को देखो बोला है, लेकिन क्रोध को हटाओ, मिटाओ, आने मत दो, ऐसा कहाँ बोला है?
क्या?
ये तो X-ray निकालने को बोला है।
ताकि हमको पता चले कि हमारे...
39:12ताकि हमको पता चले कि हमारी रुचि आत्मा में है कि संसार में।
बस इतना ही काम है, अवलोकन का काम इतना ही है।
अगर ऐसे देखने से क्या होगा?
हम कहाँ खड़े हैं पता चलता है।
और संसार की रुचि अपने आप मिट जाती है और आत्मा की रुचि अपने आप हो जाती है।
जब आत्मा की रुचि अपने आप होती है तो मालूम कैसे पड़ेगा?
कि जब भी हम अवलोकन करेंगे तब विचार आना बंद हो जाएंगे 1 second के लिए।
ऐसी...
39:40अभ्यास के लिए ऐसी practice हो जाए और 24 घंटा हर काम करते करते अंदर में अवलोकन चले।
ये कैसे चलेगा?
दृष्टम बताता हूँ।
कि अवलोकन हम तो आधा घंटा घंटा में थक जाते हैं बाद में दूसरे काम पड़े रहते हैं।
खाने के पीने के business के।
continue कैसे करना अवलोकन?
ये continue होता है कैसे होता है मैं बताता हूँ।
समझो हम किसी party में गए।
₹1,00,000 का diamond खरीदा।
40:08₹1,00,000 का diamond का necklace पहन के गए और सब देखते रह गए।
कितने party में कोई चोर भी था।
तो हम खाने पीने में बातों करने में इतने लीन हो गए थे कि उस चोर ने।
यहाँ से काट लिया रस्सी काट दी।
और diamond का हार चुरा लिया।
चुरा लेने के बाद आधे घंटे के बाद।
नजर गई।
किसी ने कहा अरे आपका diamond कहाँ गया?
40:36अरे आपका diamond था अभी पहचान कहाँ गया?
हाँ।
वो जो लड्डू है ना आधा मुँह में आधा बाहर ऐसा रह गया।
क्या?
हाँ?
अभी बाहर निकल गया इसमें।
गया ना पूरा?
देखो कैसा हो गया।
परसों ही बनाया था नया नया party के लिए specially तब देखते रह जाएंगे फिर।
fees उठ गया ना?
अब कितनी देर के लिए fees उठ गया है?
41:04अब कितनी देर के लिए फिर उठ गया है?
कितनी देर के लिए नहीं बोला?
बस मालूम पड़ा अब जाना नहीं है जाना।
खाओ पियो मज़ाक करो।
ऐसा?
असज के बात करते थे ना थोड़ी देर पहले।
नाच नाच करके।
सामने से अगर वो नहीं बुलाए तो भी वो हार दिखाने के लिए सामने से।
ऐसा जाता है।
क्या?
ताकि तो लोग target करे के बाद।
41:32काहे नहीं करेगा?
का बनवाया? इतने का बना? बनाओ ₹1,00,000 का? ₹1,50,000 लगे।
त्रिभुवनदास भीम जी।
वो अपना जो personality बताया जैसा कि वो बहुत बड़ा छाती फूल जाए वैसा।
पूरा पूंछ निकल गया ऐसे करके।
क्या अब खाएंगे नहीं पिएंगे नहीं क्योंकि अभी खाना खाया है शुरुआत ही की थी।
भूख तो बहुत लगी थी और बहुत सपने देखे थे।
जब से imitation...
42:00देखे थे।
जब से invitation card आया था ना तब से बहुत सपने थे।
बहुत मज़ा करेंगे party में।
क्या?
अब लड्डू आधा ही खाया था आधा आधा ही नहीं खाया।
पहला पहला आप लड्डू पे जाता है ना।
भूख खत्म हो गई?
खत्म?
नहीं भूख तो खत्म नहीं हुई है लेकिन खाने का दिल...
खत्म हो गया।
देखो मन के ऊपर इतने रंग राग हैं।
music party है गाना गा रहे हैं।
42:28Music party है गाना गा रहे हैं लोग इधर चीथ है अब हर जगह जाने का दिन है हाथ दिखाने का नहीं है क्या होगा और हँसता चेहरा था पलटी कैसे मार दिया एकदम cut कर दो ये सब लोगों को बोलना पड़ा क्या हुआ और सब लोगों को record चालू कर दिया किसने यहाँ कुछ कर दिया है।
42:56इसने यहाँ कुछ कर दिया है।
कार नहीं अभी तक पहले पहले पहना था।
कैसा था कैसा था?
और वर्णन करने में भी उसका दिल नहीं था।
बोलते थे कि ऐसा था वैसा था लेकिन उसका चित्त किसमें था?
बातें कर रही थी लेकिन उसका होश किधर था ध्यान किधर था?
कैसा हो जाता है?
फिर बहुत ढूंढते हैं वो करते हैं मिलता नहीं है।
आखिर घर जाते हैं।
नींद आती है।
43:24नींद आती है?
Yes.
ये ये हामा 24 घंटा साथ में रहता है कि ना मन में?
क्या दूसरा खाना पीना सोना उठना नहाना धोना नहीं होता है?
पक्का।
लेकिन आहार को भूलते हैं।
इसी प्रकार से अवलोकन की क्रिया हर शारीरिक क्रिया हो, बाह्य प्रवृत्ति धंधे व्यापार की घर की होते होते भी अंदर में चैतन्य के साथ connection जुड़ा रहता है। अवलोकन की क्रिया...
43:52connection जुड़ा रहता है अवलोकन नहीं क्रिया चालू रहती है।
कहाँ हमको क्रोध को हटाना है हमको तो देखना है।
क्रोध, राग, माया, लोभ जो भी भाव होते हैं इनको सिर्फ देखना है हटाना कहाँ है?
चालू है बस।
और जब ऐसी साधना 24 घंटा चलती है तब क्या होगा?
कि चित्त एकदम शांत हो जाता है।
संसार की रुचि बिल्कुल zero level पे आ जाती है।
संसार में रहने पर भी संसार की रुचि zero है।
और...
44:20હીરો.
ઓર આત્મા કી રુચિ બઢતી હૈ.
બસ આત્મા કી રુચિ બઢતી હૈ ફિર સીધા તારકાજ લગાના હૈ ચૈતન્ય પર.
ચૈતન્ય પે લગાતે હૈ ક્યા હોતા હૈ?
કે અંદર મેં કાઈ છિપે હુએ રાગ દ્વેષ કે ભાવ હૈ વો ભી બિલકુલ ઉત્પન્ન હોતે નહીં હોતા.
દેખ રાગ દ્વેષ કો પુણ્ય પાપ કો હટાડના નહીં હૈ ચૈતન્ય કી દ્રષ્ટિ કરને સે અશુદ્ધતા રોકાઈ જાય છે એટલે સો...
44:48રોકાઈ જાય છે એટલે શું અશુભતા ઉત્પન્ન થતી નથી.
એને અશુભતાને રોકવામાં આવી એમ કહેવામાં આવ્યું છે.
એ ભાવ અહીંયા.
ઇસીલીયે અપને પરમાત્મા કો રોકને મેં અશુભ પ્રવૃત્તિ ઔર અશુભ ભાવ.
દોનો ભી બાત હૈ.
ઉનકા ક્યાં કહેના થા?
કે કલકત્તા મેં તો કેસે સંગીઓ યા સત્સંગ નહીં.
આ પ્રવૃત્તિ કેસી હૈ અશુભ.
45:16और प्रवृत्ति कैसी है? अशुभ। और भाव कैसे होते हैं ऐसे ऐसे माहौल में रहने से? अशुभ भाव होते हैं।
ये छोड़ो, सोनगढ़ में अच्छे place पे आओ सत्संग के वातावरण में।
अब क्या करो?
शुभ विचार में आ जाओ।
आपका कल्याण होगा। ये बोलते हैं भैया ऐसा नहीं होता है।
पाप छोड़कर के हमको पुण्य नहीं करना है, हमको पाप और पुण्य दोनों छोड़कर के...
चेतन में...
45:44चैतन्य में।
और जब हम चैतन्य में आएंगे तब ये पाप और पुण्य की जो अशुद्धता है वो अपने आप उत्पन्न होगी नहीं।
हमको उनको रोकने की कोई double मेहनत करने की जरूरत ही नहीं।
कि सोगा जी को एक प्रश्न पूछा था।
कि हम गुरुदेव का प्रवचन सुनते हैं।
तो उनकी भगवान आत्मा की जो बात है इतनी अच्छी लगती है बहुत अच्छी बात है।
और दूसरा।
देखो हमारे।
46:12देखो हमारे दुकान पे जाते हैं तो दुकान के काम भी बहुत अच्छे लगते हैं।
हमको खुद ऐसा कहते हैं कि,
एक म्यान में दो तलवार नहीं रहती है।
क्या?
तुझे आत्मदर्शन करना है और ज्ञानी बनना है और मोक्ष जाना है तो,
दो में से एक को चुनो।
क्या?
या आत्मा का रंग होना चाहिए या फिर संसार का रंग होना चाहिए।
देखिए मुझे...
46:40देखिए मुझे लगता है कि मेरे को दोनों वर्ण हैं कौन से?
दुखांत भी अच्छी लगती है और गुरुदेव की बात भी अच्छी लगती है।
और गुरुदेव को ये बात मुझे समझ में नहीं आती गुरुदेव बोलते हैं नहीं एक मेल में दो तलवार कैसे रहती है?
रह ही नहीं सकती है।
फिर मेरे चित्त में दोनों भाव कैसे हैं?
कि गुरुदेव की आत्मा की बात भी अच्छी लगे और संसार भी अच्छा लगे।
ये मुझे कुछ समझ में नहीं आता।
47:08ये मुझे कुछ समझ में नहीं आता आप जरा समझाइए।
ये सोगाण जी को ये प्रश्न पूछा गया सोगाण जी ने क्या जवाब दिया होगा?
अद्भुत जवाब दिया है अद्भुत।
बोलते हैं कि संसार दुकान अच्छी लगती है वो और दुर्दैव की बात अच्छी लगती है वो।
ये पाप और पुण्य दोनों एक तलवार है।
क्या? आपको दो तलवार लगती है दो नहीं एक तलवार।
एक side है।
47:36एक side है पाप की और दूसरी side है।
ये दो तलवार नहीं है।
आप इन दोनों तलवार दो मतलब वो आपको लगता है बाकी एक ही तलवार है उस तलवार को छोड़ो।
और चैतन्य परमात्मा को इस तलवार को अंदर रखो।
प्रेम किससे करो?
अगर आपको चैतन्य भगवान आत्मा से प्रेम होता तो ना दुकान अच्छी लगती ना गुरुदेव की वाणी अच्छी लगती।
48:04अच्छी लगती है।
ये पाप के और पुण्य के भाव अच्छे नहीं लगते। पाप तो सिर्फ अपना अंदर चेतन आत्मा है ना, वही अच्छा लगता है।
इसीलिए दोनों को छोड़ो और इधर आ जाओ।
कहाँ?
चेतन की दृष्टि में।
फिर देखो क्या होता है।
फिर मोक्ष जो अपने आप को मिल ही जाता है। आनंद आनंद हो जाएगा।
गुरुदेव का कहने का रहस्य ये है कि एक में आन...
48:32रसे ये एक म्यान में दो तलवार रहती।
तारा चित में जहाँ तक संसार का रस है।
तहाँ तक तने आत्मा का प्रेम आएगा।
आगे कहते हैं आप।
कि इसका मतलब ये है कि कलकत्ता छोड़कर के सोनगढ़ आऊंगा तो भी कोई मतलब नहीं।
इसीलिए आपकी जो बात है ना मुझे पसंद नहीं।
मुझे गुरुदेव की बात पसंद है।
49:00मुझे गुरुदेव की बात पसंद है।
और आपकी बात में और गुरुदेव की बात में दोनों में क्या है?
एक बातें हैं कि अलग-अलग बातें हैं?
अलग-अलग।
तो मैं किसकी बात सुनूं?
गुरुदेव की बात सुनूं।
आपकी बात नहीं सुनूं।
मुझे Kolkata से कोई द्वेष नहीं, सोनगढ़ से कोई प्रेम नहीं।
क्या?
मुझे तो मेरे परमात्मा से प्रेम है और गुरुदेव की भी यही कहानी है, सलाह है मेरे को।
मारु ज्ञान तत्वज मने गमे।
49:28તત્વ જ મને ગમે છે.
એ વાત અમે આગે દેખને.
અભાન દશામાં.
અભાન દશામાં ચૈતન્ય ગાંઠ.
કર્મો કે સંગ મેં કભી ઇધર લુટકતી હૈ કભી ઉધર.
કભી પાપ મેં ઘુસાતી હૈ કભી પુણ્યમાં.
કબ?
અભાન દશામાં.
અભાન દશામાં.
અપને કો જબ ભૂલતે હૈ તબ.
અપના ભાર નહીં રહેતા હૈ તબ.
એ ચૈતન્ય કી જો ગાંઠ હૈ ને.
49:56की जो गांठ है ना वो कर्मों के साथ में पूर्व कर्मों का उड़े तो है।
यहाँ से भूल गया वापस जुड़ेगा या पाप के भाव होंगे या पुण्य के।
तो कभी इधर लुड़कती है कभी उधर।
परंतु भान दशा में ऐसा बोध होता है।
चैतन्य की दृष्टि में ऐसा बोध होता है।
अरे।
परिणाम परिणाम गया।
पर मैं यूँ का यूँ रह गया।
50:24और मैं यूँ का यूँ रह गया।
देखो जबरदस्त बात है।
ये एक ही sentence बस है वेदन करना है।
अगर इसको पकड़ लिया निरपेक्षता हो गया है second row।
अरे।
इधर दृष्टि होती तो क्या होता? अरे।
परिणाम परिणाम गया।
परिणाम परिणाम गया जो जैसे परिणाम होने वाले थे अच्छे बुरे।
पाप के पुण्य के या फिर निरपेक्षता के।
वो।
50:52नहीं निकलता कि वो मेरा का है थोड़ा है।
वो जैसा होना था ऐसा हो गया और मैं ज्यों का त्यों रह गया।
कि ज्यों का त्यों रह गया कौन?
मैं।
परिणाम नहीं मैं।
परिणाम बदलते हैं और मैं तो उसी समय अपरिवर्ती हूँ।
तो जब इधर दृष्टि होती है तब क्या होता है?
कि कर्मों के संग में इधर उधर लुढ़क...
51:20कर्मों के संग में इधर उधर लुढ़कना नहीं होता है।
जैसा होना होता है ऐसा परिणमन हो जाता है और मैं...
यूं का त्यों रह गया।
ये बहुत मर्म है।
ये प्रयोग का subject है।
ऐसा मैं त्रिकालीन, नित्य, ध्रुव, अद्भुत रत्न हूँ।
अपनी महिमा देखो चैतन्य।
पर निरीच्छिक वस्तु कहा और यहाँ क्या कहते हैं?
51:48क्या क्या कहते हैं?
त्रिकाली नित्य ध्रुव अद्भुत रत्न हूँ।
मैं भिखारी नहीं हूँ।
जब परिणाम को सुधारने निकलो।
मैं स्वयं परमात्मा हूँ।
मुझे भीख नहीं मांगनी है परिणाम।
कि नहीं राग द्वेष के भाव मुकुल खत्म हो जाएंगे तब ही मैं आत्मा का दर्शन कर सकूँ।
इसीलिए पहले आप योग्य ही नहीं हो अभी तो आत्मदर्शन करने के लिए।
इसीलिए अभी क्या करो?
52:16इसीलिए अभी क्या करो?
कि खाने का पाप भाव मिटाने के लिए क्या करो? उपवास का भाव करो।
का फंसा दिया?
पाप में से निकाला।
क्या बकरी को निकाला और कौन सा ऊंट बैठ गया पीछे से?
पुण्य का ऊंट।
अब तो और भी मुश्किल हो गई।
बकरी निकल के बकरी को तो अभी भी हकाल सकते थे हम।
लेकिन ऊंट को कैसे हकालें?
52:44और चैतन्य की दृष्टि तो रह गई बाकी की बातें ऐसी की वैसी।
अच्छा आपको मन में बहुत बुरे विचार आते हैं, राग द्वेष बहुत होते हैं, एक काम करो।
सुबह जल्दी उठकर के।
माला लेकर के नमस्कार मंत्र का जाप 108 बार करो।
क्या?
और श्रद्धा से करो तो अच्छा हो जाएगा, श्रद्धा से कि।
53:12श्रद्धा से करो तो अच्छा हो जाएगा श्रद्धा से कितनी देर करोगे?
आधा घंटा, घंटा, दो घंटा और क्या? फिर दुकान याद आएगी।
क्या? और थोड़े दिन करने के बाद क्या होता है माला पहन के?
माला चलते रहती है, दुकान के विचार चालू रहते हैं मन में।
नहीं होता है ऐसा? practical क्या है?
दांत में दर्द है या सर में दर्द है तो माला तो अब नियम ले लिया है ना भैया।
53:40किसका याद कर रहे हैं भैया?
ऐसा होता है।
और फिर नमस्कार मंत्र बोलते हैं कौन सा शब्द बीच में घुस गया कौन सी लाइन आगे पीछे हो गई कुछ पता नहीं चलता।
फिर उसको क्या बोलना पड़ता है कि नहीं अभी देखो नमस्कार मंत्र बोलना है तो फिर routine नहीं बोलना।
क्या वो आगे पीछे अननुपूरक भी आता है ना अननुपूरक भी ना?
हाँ?
पहले ना अमोरियंताणम ना।
54:08पहले नमो अरियंताणम नमो सिद्धाणम ऐसा शुरू करो फिर next में जब दूसरा मंत्र बोलोगे ना जब।
तो नमो अरियंताणम नमो सिद्धाणम नहीं बोलना नमो अरियंतम करके last में नमो सिद्धाणम आए।
फिर third time जब बोलोगे ना।
क्या?
तो नमो अरियंताणम नमो सिद्धाणम आए अरियंतम को आजित कर देना।
हाँ over school के अंदर।
होय अरियंतम नमो लोय साधु फिर आए अरियंतम ताकि ध्यान बराबर रहे अंदर।
क्योंकि मालूम है।
54:36क्योंकि मालूम है कि नमस्कार मंत्र अगर रट लगाई तो ध्यान तो किधर रहेगा।
और मुँह नमस्कार मंत्र बोलेगा और हाथ में माला ऐसे ऐसे होते रहेगी।
और फिर कब छूटे जल्दी कब?
आधा घंटा पूरा होवे उसका इस आदमी tension रहता है।
माला भी जल्दी हो नहीं सकती।
अब जल्दी fast-fast।
फिर।
क्योंकि रोज की practice इतनी हो गई ना अब तो मंत्र आधा ही बोलते हैं आधे खत्म आधे तो अंदर समझ लेना।
नवं दंष्ट्रं नमोस्तुते ऐसा कुछ है।
और राम हो जाता है फिर।
55:04मरा मरा मरा मरा मरा मरा हो जाता है फिर आगे।
क्या?
पाठ चलता है क्योंकि जल्दी से दूसरा काम करना है।
तो घंटा दो घंटा अशुभ विचारों को हटाने के लिए घंटा दो घंटा ऐसी प्रवृत्ति चलती है।
मतलब पाप करना है तो 24 घंटा।
और उसको हटाने के लिए पुण्य करना है तो कितना घंटा? सुबह घंटा शाम घंटा।
मुसलमान मान लो 5-5 नमाज़ पढ़ते हैं।
या 15-15 minute की 5 नमाज़।
55:32पंद्रह minute की पाँच नमाज़।
और पाप कितना करना?
चौबीस घंटा।
रात और दिन।
क्या होने वाला है?
चौबीस घंटा में से बाईस घंटा हम पीछे हटे और दो घंटा हम आगे बढ़े, क्या होगा?
कितने घंटे पीछे गए?
बाईस।
ऐसा रोज़ होवे तो बाईस बाईस करके पूरी ज़िंदगी में कितना पीछे चले गए हैं?
मोक्ष के तरफ जा रहे हैं कि फिर कहाँ जा रहे हैं?
गति तो दो ही है।
56:00गति तो दो ही है।
क्या?
दो ही गति है, कहाँ जाते हैं?
ये समझना है तो यहाँ क्या कहते हैं?
कि मार्ग वितराग का ऐसा नहीं।
परिणाम में राग द्वेष हो तो भी,
आप उसको overtake करके,
ज्ञान के द्वारा direct चैतन्य की दृष्टि करके,
अपने परमात्मा का अनुभव करके,
तो परमात्मा और आप दोनों...
56:28तो परमात्मा और आप दोनों हाथ में मिलकर के सबका कचर कुटी खा देना।
एक धोखा देना परमात्मा के हाथ में बस सकती है।
आ जाओ कौन आता है।
मैं बैठा हूँ इधर।
डर के मारे आगे चूहे भाग जाते हैं।
ये परमात्मा सो गया था ना इसलिए क्रोध मान माया लोग सब जागते हैं।
अब परमात्मा जाग गए।
उसके हाथ में सुदर्शन चक्र देखते हैं तो क्या होता है?
पौरवों को मालूम था।
कि आज तो कृष्ण भगवान ने सुदर्शन चक्र उठाया।
56:56जब कृष्ण भगवान ने सुदर्शन चक्र उठाया तो हमारी हार निश्चित थी। भले ही पांडव 5 हैं।
लेकिन उनको लड़ने का साहस क्यों किया उन्होंने मालूम?
कि मैं हथियार नहीं उठाऊंगा, मैं तो सिर साथ ही बांधूंगा।
अब कोई बात नहीं।
बाकी उनको मालूम था ताकत क्या है।
अकेला युद्ध ना भारी पड़ जाएगा।
एक चक्र चला देंगे तो खत्म हो जाएगा पूरा।
डर लगे कोई सामने नहीं आवे लेकिन उन्होंने...
57:24डर लगे कोई सामने नहीं आवे लेकिन उन्होंने promise दे दिया।
कि देखो भई आप हमारे साथ नए नए हो गर्धन के साथ हो तो एक काम करना।
शस्त्र नहीं उठाना कि promise चलो बे शर्त।
नच चलाऊंगा दूसरा कुछ नहीं।
आग भी नहीं लगाऊंगा किसी पे।
अब हम जीत जाएंगे।
क्योंकि आपकी पूरी सेना तो हमारे को दे दी है ये धस्ना उतर गए हैं।
क्या हुआ?
अक्षर ज्ञान निकल गया परमात्मा ही काफी है इन चक्रों की जरूरत ही नहीं।
ऐसे अद्भुत परमात्मा।
57:52ऐसे अद्भुत परमात्मा चेतन परमात्मा उसकी दृष्टि काफी है।
ये चूहों को हटाने की जरूरत नहीं चूहे सामने ही नहीं आएंगे सामने आए कि मर जाएंगे वो।
वो आएंगे नहीं सामने ही नहीं आएंगे परमात्मा को जगा लो इधर अंदर।
तो अरे परिणाम परिणाम गया और मैं यूं का यूं रह गया।
ऐसा मैं त्रिपाणी नित्य ध्रुव अद्भुत रत्न।
अब last time नहीं है सिर्फ बोलने का ये paragraph।
58:20नहीं है सिर्फ बोलने का ये paragraph।
गुरुदेव के चरणों में रथ मुक्ति की मंडली है।
जहां गुरुदेव हैं, गुरुदेव का बोध सुनते हैं तो वहां जो सुनने वाले योग्य जीव हैं, उनका मोक्ष निश्चित है।
तो मोक्ष की मंडली है।
उस मंडली में मेरे उत्तरकाल का स्थान।
अभी तो मैं अशोघानी जी हूं, बाद में क्या होऊंगा? सिद्ध भगवान बनूंगा।
मेरे उत्तरकाल...
58:48मेरे उत्तरकाल के स्थान का निश्चित बान है। क्या बान है? मैं क्या बनूँगा?
सिद्ध बनूँगा।
पर अरे, ये तो जड़ पद है और मेरा तो...
सिद्ध दशा कैसा पद है?
जड़।
सिद्ध दशा क्या पद है? जड़ पद है। क्योंकि उसको जड़ की अपेक्षा लग गई।
शरीर बिना का सिद्ध। शरीर के साथ वाला संसार।
इतनी अपेक्षा है तो कलंक है।
59:16इतनी अपेक्षा है तो कलंक है।
मैं तो अपेक्षा रहित परमात्मा हूँ।
अभी वर्तमान में सिद्ध हो लेओ ना।
शरीर है तो क्या शरीर खा जाएगा मेरे को?
चुप जाता है अंदर में चिपक गया।
सिद्ध दशा तो कलंक है।
लेकिन भगवान को कलंक नहीं है क्योंकि भगवान अभी इसी वक्त शरीर में रहते हुए भी निरपेक्ष परम परमात्मा है।
इसीलिए क्या कह दिया?
मुझे मालूम है कि गुरुदेव की शिष्य मंडली में मेरा क्या स्थान है।
59:44गुरुदेव की शिष्य मंडली में मेरा क्या स्थान भविष्य में?
मैं सिद्ध भगवान बनने वाला हूँ।
ये निश्चित है, 100% है।
कि मैं सिद्धालय में अवश्य पहुँचूँगा लेकिन वो पद कैसा है?
पर अरे ये तो जड़ पद है और मेरा तो...
मुझे तो वो दशा भी नहीं चाहिए।
कहने का मतलब क्या?
कि मुझे सिद्ध भगवान भी बनना नहीं है। क्यों नहीं बनना है?
कि मैं तो वर्तमान में ही सिद्ध भगवान हूँ।
चैतन्य पद में...
1:00:12चैतन्य तो मेरा है।
दुखी का क्यों हो इतना?
नहीं मुझे सिद्ध दशा के लिए प्रयत्न नहीं करना है।
नहीं तो बोलेंगे कि आपको संसार से भागना नहीं है, जन्म मरण का डर नहीं लगता है।
अरे जन्म मरण होंगे अवस्था में, मेरे में कहाँ?
मैं तो वर्तमान में ही परमात्मा हूँ।
मैं मोक्ष के पीछे नहीं भागता।
मैं तो मेरी चैतन्य की दृष्टि में रहता हूँ।
मोक्ष को मेरे पीछे पीछे आना है तो...
1:00:40ઇસકો મેરે પીછે પીછે આના હૈ તો આયે વે તો મેં દેખતા ભી નહીં ઉસકે સામને.
દેખો.
તો જડ પદ છે અને મેરા તો ચૈતન્ય પદ છે.
પછી કહેતે હૈ, એક આખરી મેં એક ટોન લગા દીએ.
કે આપ ભલે સોંગડ મેં રહેતે હો, શાસ્ત્રો કા અભ્યાસ કરતે હો, સ્તોત્ર કી વાણી સુનતે હો.
લેકિન નિજ કલ્પનાથી ગોટીય શાસ્ત્ર...
માત્ર મણિ.
માત્ર મણિનો...
ના મણિ.
ગુરુવર કહે છે જ્ઞાન...
1:01:08गुरु वर कहे छे ज्ञान देने सर्वभव्यो स्वामी।
विस्तार नहीं किया लेकिन इनके वचन रख दिया।
क्या खास जानते हो आप?
दया आती है कि गुरु के चरणों में रहते हुए ऐसे भीख मांगे?
कि मुझे जन्म मरण से मुक्त हो जाना है, मुझे पाप का उदय नहीं चाहिए, पुण्य का उदय चाहिए, मुझे निरंतर गुरु चरणों में रहना है, इतने भिखारी?
छी, शर्म आती है।
गुरु कहते हैं कि तुम चैतन्य परमात्मा हो, मुझे...
1:01:36कहते हैं कि तुम चैतन्य परमात्मा हो, मुझे तो पुण्य का उदय चाहिए, आपका साथ चाहिए, आपके चरणों का साथ चाहिए।
क्यों लगाया है?
शर्म आती है।
क्या कहूँ?
अनुभव लेखनी में व्यक्त नहीं हो सकता, इतना व्यक्त कर दिया।
और ending में क्या लिखते हैं?
मेरा तो मैं ही जानता हूँ, कितना व्यक्त करूँ, मेरे को ताक़त नहीं है, अंदर में चैतन्य का जो अनुभव है ना,
मैं लेखनी में व्यक्त नहीं कर सकता।
मतलब जब लेखन में इतना आया तो अनुभव में कितना होगा?
1:02:04मन में इतना आया तो अनुभव में कितना होगा?
कितनी महिमा होगी?
सिर्फ शब्दों में इतनी महिमा चैतन्य की आई तो अनुभव में क्या होगा?
हम believe नहीं कर सकते हैं वो तो अनुभव होगा।
सबों को धर्म स्नेह ज्ञान चंद्र।
ये अद्भुत पत्र।
ये चिंचली के ऐसे सुंदर वार्तालाप।
Last दो दिन में ये 5 स्वाध्याय हुए।
मैं समझता हूँ।
1:02:32मैं समझता हूँ कोई रोते-रोते यहाँ से नहीं जाएगा।
सबके चेहरे और अंतरात्मा खिल गई होगी।
इसपे विचार करना घर पहुँचने से पहले भी काम हो सकता है train में बैठे-बैठे।
ये वैसे मंत्र है।
कि यहाँ 8 दिन में अगर कार्य किसी का नहीं हुआ हो।
अपने चैतन्य की दृढ़ चीज train में भी हो सकती है लगा सकते हो।
और घर में पाँव रखने से पहले आत्मा का अनुभव हो सकता है ये मेरी challenge है।
1:03:00हो सकता है।
ये मेरी challenge है।
देखता हूँ कौन उठाता है।
भैया वाली line एक बार।
हाँ।
प्रदेशे प्रदेशे।
कोई ना।
last में भैया वाली line।
भैया वाली line।
परिणाम परिणाम।
हाँ हाँ।
ठीक।
अरे परिणाम परिणाम गया।
जैसी स्थिति बाहर की होने वाली थी ऐसी होने वाली हो गई।
क्या?
1:03:28हो गई।
क्या?
और मैं ज्यों का त्यों रह गया।
इसका मैं विस्तार नहीं कर पाया समय के अभाव के कारण।
बहुत विस्तार कर सकता था।
एक शब्द में बहुत अपना कल का lecture तो उस पे चले गया, परिणामों से परिणामों का।
Lecture पढ़ते पढ़ते कोई एक sentence ऐसा आ जाता है कि वा रुकना हो जाता है।
जैसे अब शुरू अब पूर्व अवसर में 7 number का देखो।
क्रोध प्रत्ययो वर्ते।
सब हो।
तो generally क्या...
1:03:56तो generally क्या होता है एक या डेढ़ lecture में एक पद पूरा हो जाता है। वो सात नंबर का चार lecture पूरे नहीं हुए। चार lecture में पूरा हुआ एक ही पद। चार line के चार प्रवचन।