Shri Dravya Drushti Prakash
Also on this day: Shri Dravya Drushti Prakash 2 · Apoorva Avasar
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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.
0:28Moa diin taimnin moos
0:56णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते ।
चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे
1:24मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥
1:52दिने संवत्।
दीप्तिं ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः
2:20श्री द्रव्य दृष्टि प्रकाश।
पूज्य न्यालचंद जी सोहाणी जी के आध्यात्मिक पत्र।
पत्र number है 17।
Seventeen।
आज से 48 साल पहले Kolkata से ये पत्र सोहणगढ़ के मुनि सोहणी जी...
2:48सौगानी जी बहुत निकट भविष्य में भूतकाल में हो गए ऐसे महाज्ञानी।
गुरुदेव जी कहते थे कि एक बहुत आ रही है।
मुनि नहीं बने थे लेकिन संसार में रहकर के भी मुनि तुल्य साधना कैसी होती है।
वो हमको इनके पत्रों से देखने में मिलती है।
उनके वचनों के ऐसे जादू है कि।
3:16में ऐसे जादू है उस वचन में आसना का कितना प्रेम है।
वो झलकता है।
और बहुत प्रेरणा मिलती है।
तुझे भी गुरुदेव ने।
उनके वचनामृत वाला तीसरा पाठ जो है वो मेरे को दिया था gift में।
और फिर Om लिख कर के दिया।
पत्र अपुन पढ़ेंगे पहले बांधनी में पढ़े थे अपुन।
और वापस।
3:44वापिस बहुत दिनों के बाद अभी वापस पढ़ रहे हैं।
25 July 1954।
कलकत्ता से लिखा है।
ओम श्री कान गुरु देवाय नमः जो उनके गुरु थे।
सोगाणी जी के और मेरे दोनों के एक ही गुरु हैं।
कान गुरु।
आत्मार्थी नाम लिखा है।
लियांचंद्र का धर्म...
4:12नियाल चंद्र का धर्म स्नेह।
आशा है पूज्य गुरुदेव सुख शांति में विराजते होंगे।
मुमुक्षु मंडल प्रतिक्षण आत्मा आश्रित सुख की वृद्धि में रत हो।
जिन्होंने गुरुदेव को सुनने वाले जितने भी मुमुक्षु वा संग में हैं वो सब।
कौन से सुख की वृद्धि करें?
आत्मा आश्रित।
4:40आत्मा आश्रित गुरुदेव आश्रित नहीं।
रास्ता रास्ता बताने वाले गांधी स्वामी हैं।
और उनके जो शिष्य मंडली है वापस सोनगढ़ में।
जो सुबह दोपहर शाम उनकी दिव्य वाणी सुनती है।
और अपनी आत्मभावना अपना आत्मपुरसाद अंतर्मुखी पुरुषार्थ बढ़ाती है।
5:08उन सभी के लिए मेरी ऐसी भावना है।
वे प्रत्येक क्षण, सुबह, दोपहर, शाम, ऐसा नहीं, ध्यान का समय कौन सा, अवलोकन का समय कौन सा, हर पल और अवलोकन क्षण।
हम लोग तो सुबह-शाम प्रतिगमन करते हैं।
दिन में पाप किया तो रात को कर लेना प्रतिगमन।
रात को जो पाप किया होगा वो दिन में सुबह उठकर के...
5:36क्या होगा और दिन में सुबह उठकर के एक पटी ग्रहण कर लेना।
और समझते हैं कि हमारे सारे पाप।
Only दो दाले लेकिन ऐसा नहीं है।
तो गुरुदेव के शरण में उनके दर्शन वाणी का लाभ लेने वाले मुमुक्षु मंडल।
मोक्ष की आशा रखने वाले जीव उसको बोलते हैं मुमुक्षु।
और एक से ज्यादा है तो क्या बोलते हैं मुमुक्षु।
6:04या तो क्या बोलते हैं मुमुक्षु मंडल।
क्या करें उनकी भावना कैसी है?
कि प्रत्येक क्षण मतलब हर पल।
कैसे सुख की वृद्धि में रत हो जाए?
आत्मा आश्रित सुख की वृद्धि में रत हो जाओ।
गुरुदेव को ही देखता रहे गुरुदेव को ही देखता रहे।
नहीं ये गलत।
गुरुदेव के पास गए तो फिर किसको देखना है?
गुरुदेव को।
6:32फिर किसको देखना? गुरुदेव को देखना कि अपने आत्मा को देखना?
लेकिन आत्मा की बात तो सद्गुरु ही बताते हैं। गुरु को ही देखो ना।
क्या करना?
वो बात आती है ना एक सोने का अंडा देने वाली मुर्गी।
कि क्या करना?
जो सोने का अंडा देवे।
और फिर उसको लोभ हो गया कि हम इसके...
7:00और फिर उसको लोभ हो गया कि अब इसके अच्छा तो मुर्गी को ले लो ना।
और वो लेके कौन धीरज रखे?
तो क्या हुआ?
कि जो एक मिलता था ना वो भी नहीं मिलता है।
ऐसे सद्गुरु के मुख से जो वाणी निकलती है।
वो वाणी में से जो आत्मा का तत्व निकलता है।
वो हमको ले लेना।
और सद्गुरु।
7:28और सद्गुरु पर से दृष्टि हटा देना है। और कहाँ लेके जाना है?
अपने आत्मा में ले जाना है।
तो रोज़ नए-नए, नए-नए अमृत अंदर से भंडार खुलते जाएंगे।
और सुख-शांति बढ़ती जाएगी। लेकिन हम क्या करते हैं?
हम हमारे आत्मबल को खोल दिए हैं। इसीलिए
गुरु की वाणी मिली, दर्शन मिला तो
उनके वाणी के पीछे जो मर्म है...
7:56उनके वाणी के पीछे जो मर्म है कि तुम अपने आत्मा से प्रेम करो, अपने आत्मा में लीन हो जाओ।
वो कठिन लगता है।
किसको पकड़ लिया हमने?
गुरु को पकड़ लिया।
कि अभी आप ही घर भर दो।
हम तो आपके चरणों में हैं।
गुरु के चरणों में रहने से एक फायदा है कि संसार के चक्कर से बच जाओ, बच जाओ।
8:24बच जाओ।
ज़्यादा विकल्प नहीं चलता है।
देखिए शुभ तो नहीं मिल रहा, शुभ काम मिलता है।
नहीं हमको तो बहुत अच्छा लगता है आपकी वाणी,
आपकी शांति,
वो अच्छा लगता है वो क्या चीज़ है?
पितृभाव है,
या धर्म भाव और पुण्य भाव है?
कौन सा है धर्म भाव है कि अधर्म भाव है?
गुरु की भक्ति अच्छी लगती है।
8:52गुरु की भक्ति अच्छी लगती है।
कौन सा भाव है? पुण्य भाव है? कि संवर भाव है?
कि मुक्ति कैसे मिलेगी?
पुण्य से तो स्वर्ग मिलता है।
और धर्म भाव से मुक्ति मिलती है। संवर निजरा मुक्ति का कारण है।
पाप और पुण्य बंध का कारण है।
पाप और पुण्य दोनों आश्रय।
तो सोगाणी जी ने क्या भावना पाई है मुमुक्षु मंडल के लिए?
9:20मुमुक्षु मंडल के लिए।
कि मुमुक्षु मंडल प्रतिक्षण।
गुरुदेव का प्रवचन 3 time ही होता है।
उसमें 2 प्रवचन और 1 चर्चा, चर्चा में तो बहनों को आना नहीं होता है रात के time।
2 ही time होता है, पुरुषों के लिए 3 time।
और इन्होंने क्या बताया है?
साधना का time क्या बताया है?
सुबह 8 से 9 प्रवचन में, दोपहर में 3 से 4 प्रवचन में, शाम में 7:30 से।
9:48છે 4 લોકો છે ને સામે 5:30 ને પોણા 8 ચર્ચા.
એ time બતાવ્યા ને સોગાણીજીને ક્યાં બતાવ્યા?
કે સાધના કરના આજ્ઞા કીધી તો પ્રતિક્ષણ કરના પ્રતિક્ષણ જાગૃતિ હોના છે.
ફિર આમ ખાના કૈસે ખાઈંગે TV કૈસે દેખી?
મોક્ષ જાના હૈ તો TV દેખતે દેખતે આત્મસાધના કરની ખાના ખાતે ખાતે આત્મસાધના કરની.
પ્રતિક્ષણ.
10:16उतारना पड़ेगा।
प्रत्येक क्षण करना।
अगर मोक्ष चाहिए मुक्ति चाहिए तो।
और कैसे सुख मिलेगा फिर?
आत्मा आश्रित गुरु आश्रित नहीं।
सुख जो मिलेगा वो आत्मा से निकला है आत्मा का आधार लेके निकला है।
ये सही है कि हमने आत्मा को जाना नहीं है गुरु की वाणी सुने बिना लेकिन अब गुरु की वाणी ने जो बता दिया ना।
तुम्हारा आत्मा कैसा है और कैसे प्रयोग करना।
अब गुरु को क्यों...
10:44अब गुरु को क्यों चिपक गए हो?
अब और सुनो और सुनूं काहे के वास्ते?
अब गुरु ने जो कहा है वो हमारा आत्मा बताया, तुम्हारा घर बताया, तुम्हारा address बताया, वहां पहुंचने का रास्ता तरीका बताया, अब तुम क्या कर?
कि गुरु ऊपर से दृष्टि हटा ले अपने आत्मा में लगा, यही गुरु की भक्ति है।
नहीं हम तो आपको देखेंगे।
ये भक्ति नहीं है।
गुरु की आज्ञा उठाना वो भक्ति है।
11:12गुरु की आज्ञा उठाने वाली भक्ति है। गुरु की आज्ञा ये है कि तुम अपने परमात्मा को अंदर में दर्शन करो, उनकी शरण में जाओ।
तो आत्मा आश्रित सुख की वृद्धि में रत हो जाओ। सारे मुमुक्षु गुरुदेव की वाणी सुनकर के,
फिर वाणी पर से भी लक्ष हटा करके,
वाणी में जो आज्ञा दी गई है, उस प्रकार से,
अपने अंतर में अपने भगवान आत्मा को देख करके,
आत्मिक सुख...
11:40आत्मिक सुख के आनंद की वृद्धि करे।
ऐसी भावना सुगाणी जी ने इस पत्र में भाई starting में।
आपका पत्र यथा समय मिला था।
मेरा अजमेर में तो लगभग 15-20 दिन रहना हुआ था क्योंकि परिवार वाले अभी भी बाहर थे।
अजमेर में।
Business के लिए उनको कलकत्ता जाना पड़ा।
8 साल बिना परिवार के उनको कलकत्ता...
12:088 साल बिना परिवार के उन्होंने Kolkata में रहे 58 तक।
Mostly सभी के starting में आज से 20 40 साल पहले के देखेंगे तो ऐसा ही था।
हमारा भी बचपन में ऐसा था तो हम गांव में रहते थे पिताजी वहां Kolkata में रहते थे business करने।
Business के लिए देश विदेश जाना पड़ता था और गांव में रहना होता था।
पढ़ाई वगैरह गांव में हो।
इनका भी यही हाल है।
कुटुंब परिवार सब Rajasthan में है husband।
और...
12:36और कमाई करने के लिए पारिवारिक बोझ उठाने के लिए उनको कहाँ जाना पड़ा? Kolkata।
और बिना परिवार के वहाँ धर्मशाला में रहते रहते उन्होंने 8 साल बिताए सोगाणी जी में।
वहाँ कमाई करना money order भेज देना परिवार वालों को।
साँझ में एक या दो बार फुर्सत मिले तब परिवार वालों को मिलकर के वापस चले जाना।
13:04कभी-कभी दो-दो तीन-तीन साल निकल जाते हैं पत्र व्यवहार से चलते हैं परिवार वालों के साथ रोज़ का मिलना-जुलना नहीं होता।
Husband-wife के बीच में पत्र व्यवहार चलता है।
रोज़ का देखना मिलना साथ में रहना ऐसा दिन नहीं होता।
हमारे घर में ऐसा हमारे पिताजी माताजी सब इस प्रकार से हैं।
धीरे-धीरे फिर परिस्थिति सुधरती है।
धीरे-धीरे फिर वो।
Mumbai जैसे।
13:32बम्बई से आते हैं बम्बई में तो जगह कितनी मिलती है।
दस बा दस की जगह मिले तो बहुत नसीबदार।
उसमें 25 जने रहते हैं।
क्या और यहाँ तो परेशानी है यार।
जा रहते हैं वहाँ तो अलग अलग bedroom अलग अलग सब कुछ चाहिए latrine bathroom सब वहाँ 40 system में।
पूरी building वाले 4 latrine में ही।
सिवा कर लेते हैं।
ऐसे दिन गुजार रहे हैं।
बम्बई में।
14:00Mumbai में CP tank base है ऐसे जगह में पढ़ाई वगैरह किए तो ऐसा।
बहुत याद आ गई है उसे।
मेरा अजमेर में तो लगभग 15-20 दिवस ही रहना हुआ था।
आपने लिखा।
कि विकल्प में काई कार्य आवे नहीं।
बार बार वो सोनगढ़ से लिखते थे कि आप क्यों नहीं आते हो।
गुरुदेव के प्रवचन बहुत जबरदस्त है।
सुनते हैं आप जैसे तो अंदर।
14:28सुनते हैं आप जैसे तो अंदर में उतर जाओगे बहुत फायदा होगा जल्दी से आ जाओ।
और बार-बार लिखते तो फिर।
हाँ आता हूँ आता हूँ लेकिन जाते नहीं तो फिर उन्होंने क्या लिखा था अनगढ़ से?
कि हम बेकार के विकल्प करते हैं आपके लिए फायदा नहीं हो रहा लिखने का।
कोई फल नहीं मिला हमको विकल्प लिख करके लिख तो दिया लेकिन कोई फल नहीं मिला।
आपने लिखा कि विकल्प नु काई कार्य हयु नहीं।
14:56खाया नहीं।
जवाब देते हैं हम उसका।
So हमारा तो सिद्धांत भी यही है।
क्या सिद्धांत है?
के विकल्प के अनुकूल कार्य होवे ही यह आवश्यक नहीं है।
क्या?
हम विकल्प करें करने-करने के।
चाहे करें लेकिन चाह पूरी हो नहीं हो, वो हमारे हाथ में थोड़ी है।
वो हमारे पूर्व में जैसे हमने कर्म किए थे वो हिसाब से।
15:24ये थे वो हिसाब से।
जो film पहले से बन गई है इस प्रकार से कार्य होता था।
हमारी जो आयुष्य है और आयुष्य दरमियान में जो भी कुछ करने वाले हैं।
उसकी पूरी film बन गई है वो।
अब हम विकल्प करें चाहे जितने।
उठा पुटक तो कितना भी कर ले वो।
वो Chinese थोड़ा होने वाली है एक film बन गई है वो Chinese थोड़ी होती है।
नहीं होती है।
तो हमारा तो।
15:52तो हमारा तो सिद्धांत भी यही है और बिल्कुल सही हुआ है जो हुआ है।
आपने बुलाया इतना लिखा और हम नहीं आए।
क्या जरूरी थोड़ा है कि आप बुलाए और हम आवे।
हमारा आने का जब लिखा होगा ना shooting हो गई होगी ना तो हम आप नहीं करोगे तो भी आ जाए।
क्या नहीं लिखो तो भी आ जाओ।
ये जो भी film बन चुकी है वो हिसाब से होगा।
तो विकल्प के अनुकूल कार्य होवे ही।
16:20विकल्प के अनुकूल कार्य हो गए ही ये आवश्यक नहीं है क्यों?
कि विकल्प विकल्प है और कार्य कार्य।
अगर इस सिद्धांत को हमको सिद्ध करना है तो अवलोकन करके देखो।
आधे घंटे में कितने विचार आते हैं ये करो वो करो ये नहीं करना है वहाँ जाना है इधर जाना है।
कितना कार्य करते हो?
जितने कार्य करने हैं और जितना नहीं करना है उसमें से कितना सफल होता है?
अब आधे घंटे में पता चल जाता है।
16:48वो आधे घंटे में पता चल जाता।
दिन भर में करोड़ों विचार आते हैं, ये करूँ ये नहीं करूँगा, काम कितना होता है?
24 घंटे से ज़्यादा तो नहीं है, उसमें 8 घंटे तो नींद में जाते हैं, बाकी रहे कितना?
16 घंटे में आप दिन भर के करोड़ों काम कैसे करोगे?
कभी-कभी तो सभी 8-10 काम एक ही time पे होते हैं।
कैसे करोगे अकेले?
फिर हमको choice करनी पड़ती है अपनी।
इतनी इच्छा बढ़ गई है, हमको रा...
17:16इतनी इच्छा बढ़ गई है हमको राग द्वेष करने पड़ते हैं कि नहीं अब ये काम pending रखो इसको कर लो।
जो कर लो जिसको प्रधानता दी है वो राग किया।
और जिसको neglect किया वो क्या किया?
बस हमारी गाड़ी ऐसे ही चलती है।
इच्छा मोह के खत।
और फिर इतनी सारी इच्छा कर लेते हैं ये भी ये भी ये भी ये भी कर तो नहीं सकते फिर क्या करें?
इतना करना है राग किया और इतना नहीं करना है नहीं।
17:44क्या किया और इतना नहीं करना है, नहीं कर सकते हैं।
तो क्या किया?
बाकी चक्की चलती है।
रोज ऐसा चक्की चलती है।
अभी एक second की, एक घड़ी की भी आराम नहीं है, मन को शांति नहीं है जरा।
कर्म बनता ही रहता है हर पल, हर second।
पाप पुण्य, पाप पुण्य, पाप पुण्य, पाप पुण्य क्या ratio नहीं है वो?
1:1 नहीं है।
ये 50% पाप के हैं, 50...
18:1250% पाप के हैं 50% पुण्य के हैं ऐसा थोड़ा है।
जरा जीवन को देखना अंदर में तपासना।
क्या position है?
कौन सी चीज ज्यादा है?
पुण्य ज्यादा है?
पाप ज्यादा है?
फिर पाप का ज्यादा है तो चार गति में कौन सी गति है?
स्वर्ग मिलता है?
मनुष्य गति मिलती है? क्या मिलता है?
सीरंद गति और नरक गति मिलती है।
ये अपने...
18:40ये अपने अवलोकन से पता चलता है कि हमको मोक्ष की तरफ जा रहे हैं कि नरक की पीर गति की तरफ जा रहे हैं वो पता चल जाता है।
बाहर से शांत रहते हैं लेकिन भावों से हम क्या करते हैं?
तो विकल्प विकल्प में है।
और कार्य कार्य में है जितना हम विकल्प करते हैं उतना कार्य थोड़ा कर सकते हैं।
नहीं कर सकते।
जरूरी नहीं कि जितने हमने विकल्प किए उतने...
19:08कि जितने हमने विकल्प किए दिन भर में उतने सब के सब हम कार्य कर सकें।
इसीलिए हमेशा मन की गति fast है।
पर काया की गति कितनी है?
बहुत slow है।
मन की गति तो बहुत fast है।
अभी 1 second में America भी जाके आ सकते हैं, Hyderabad घूम के आ जा सकते हैं।
जहां जाना है वहां 1 second में जा रहे हैं लेकिन।
कि practically जाना है तो Hyderabad पहुंचना है तो।
कि पहले यहां से bus करके वहां जाना।
19:36ये पहले यहाँ से bus करके वहाँ जाओ फिर VT तक पहुँचो फिर VT से।
Train की राह देखो अभी train जब आवे तब उसके बाद बैठने के बाद 18 घंटा।
इतना time लगता है जाना है वो तो 10 बार विचार करो 10 बार plan करो जितनी बार विचार किया ना उतनी बार plan करो।
जाना है जाना है जाना है।
अभी यहाँ उल्टा हो गया ना कोई Hyderabad जाने को तैयार नहीं है यहाँ से।
यहाँ से नहीं जाना है नहीं जाना है नहीं जाना है ticket cancel करा दो अभी तो 2 ही दिन बच गए।
20:04करा दो अभी तो दो ही दिन बच गए।
उल्टा हो गया।
phone में भी ऐसा हुआ।
आखरी दिन सबने बोला प टाए का puncture हो जाए।
train miss हो जाए, train cancel हो जाए।
आप थे phone में नहीं थे।
आप नहीं थे।
देखने जैसा था सब नजारा।
कैसा भी करो अभी cancel करा दो, फिर भी करो।
जाना तो नहीं।
ticket के ₹250 गए तो गए पानी में।
लेकिन घर...
20:32लेकिन घर वापस नहीं जाना है।
₹1500 का ₹1800 हो गया।
₹1500 का ₹1800 हो गया।
और क्या, ₹1500 तो खर्च करना ही है, ₹300 और पकड़ लेंगे और क्या।
जाना नहीं है एकदम।
अभी वो अभी से कल सुबह से वही बात चल रही है कि अभी नहीं जाना है, ticket cancel करा के आते हैं।
दूसरे ticket निकाल के आते हैं।
मैं एक दिन waste करने को तैयार हूँ।
ticket निकाल के आने के लिए मैं तैयार हूँ।
और सब ticket करने को तैयार है वो।
अगर आप permission दो तो मैं जाके...
21:00जाके ticket cancel करा के नई ticket लेके आता हूँ।
सबको दिल में वही है। अब जाना नहीं है जाना नहीं उल्टा है।
जाना है तो पाप है और नहीं जाना है नहीं जाना है तो पुण्य है।
लेकिन कहा है तो जो होने वाला है picture बन गया हमेशा होने वाला है।
अपने विकल्प से कुछ मतलब नहीं।
चाहे पाप के हो चाहे पुण्य के विकल्प तो धर्म के विकल्प तो success होंगे ना?
जरूरी नहीं है।
धर्मों के आत्मा...
21:28धर्म के आत्मा के लिए किए गए विकल्प भी होवे success को जल्दी नहीं होवे।
विकल्प विकल्प में और कार्य कारण में। विकल्प की मन की गति fast है और काया की गति slow है। तो ये दोनों का match नहीं है।
भावना जो है वो पूर्ण का पूर्ण है।
भावना है सो आत्मकल्याण की भावना है। उसको संयोग नहीं चाहिए ऐसी भावना।
कि मुझे कोई संयोग मिले।
इसीलिए वो भावना शुद्ध भावना।
21:56इसीलिए वो भावना शुद्ध भावना है।
आत्म भावना है।
आत्म भावना कोई आत्म दर्शन नहीं है इसलिए है तो पुण्य है लेकिन इसकी जाति अलग प्रकार की है।
संयोग वियोग से पार वो भावना भाई करे कि मुझे मेरा शांति चाहिए, मुझे आत्मा चाहिए।
तो ये pure भावना है।
और pure भावना सफल होती है।
ये 21 number में मेंसी के वचन ग्रंथ में आता है कि जिसकी शुद्ध भावना है आत्मा की।
वे शुद्ध है कि नहीं वो।
22:24फिर शुद्ध है कि नहीं वो अपने को शुद्ध लगती है लेकिन है कि नहीं वो तो फिर testing करेंगे तो मालूम पड़ेगा।
हमको तो ऐसा लगता है कि हमारी भावना शुद्ध है। हम इतने शास्त्र पढ़ते हैं, यात्रा में आते हैं, इतना दान देते हैं,
त्रिकरण पूजा भक्ति इतना सारा करते हैं, अन्नमूल नहीं खाते, रात्रि भोजन नहीं करते।
लेकिन हमारी भावना सच्ची है।
वो तो भैया सच्ची है आप कहते हो लेकिन अवलोकन करके मालूम पड़ेगा।
आत्मा के लिए जान देने...
22:52आत्मा के लिए जान देने को तैयार हो?
क्या?
जब परीक्षा आती है ना तो मालूम पड़ जाता है। तब लगता है कि नहीं हमको आत्मा से कोई प्रेम नहीं।
ये सब X-ray निकालना है तो अवलोकन करना पड़ेगा। हमारी भावना हमको लगती है अच्छी है, perfect है।
लेकिन सही में जैसी कृपा हुई उन्होंने भावना पाई थी कि आंधी आओ, तूफान आओ, सुख आए, दुख आए, उपसर्ग आए।
क्या? भले तो जीवन एक समय...
23:20क्या भले तो जीवन एक समय का हो फिर भी हमको आत्मकल्याण करना है। क्या इतनी तैयारी है क्या हमारे पास?
प्रभुपाद ने और भी एक भावना इसी इसी पत्र में आगे और लिखा है।
सन सन पलटी सभा घुटी नहीं चाहिए।
कि कुछ समय तक शून्य सिवाय निरंतरता सिवा कुछ नहीं चाहिए।
वो नहीं मिले तो हमको फिर third point में क्या?
संत सिवा कुछ नहीं चाहिए सद्गुरु।
23:48संत सिवा कुछ नहीं चाहिए, सद्गुरु चाहिए।
चलो सद्गुरु भी नहीं है तो फिर सत्संग के बिना कुछ नहीं चाहिए।
चलो सत्संग नहीं मिलता है तो फिर विरक्त प्रभु की भक्ति के बिना कुछ नहीं चाहिए।
वो भी नहीं है तो फिर...
तो ज्ञानी पुरुषों ने जो आचरण की रेखाएं बताई हैं, वो व्यवहार धर्म।
उस रेखा से बाहर नहीं जाना।
अब वो भी नहीं है तो...
अभी हमको...
24:16है तो अभी हमको कुछ नहीं चाहिए क्योंकि और अभी कुछ चाहेंगे तो क्या दुखना ही दुखना है और हमको गिरना है तो इससे कम तो कुछ नहीं चाहिए अब हमारी भावना को tally कर लो 23 साल की उम्र में परम कृपालु देव को ऐसी भावना हुई अनुभव के पहले ऐसी भावना होने के बाद 3 महीने में अवलोकन और भेद ज्ञान के माध्यम से उनको आत्म।
24:44वे ज्ञान के माध्यम से उनको आत्मज्ञान हुआ था।
Check करना ऐसी भावना है।
सबसे पहले किसको रखा?
क्षण क्षण पलटने वाली स्वभाव वृत्ति नहीं चाहिए मतलब परमात्म दशा ही चाहिए।
जो शाश्वत एकरूप रहती है पलटी नहीं है दशा।
हमको सिद्ध भगवान से कम कुछ नहीं चाहिए भई नहीं मिले तो?
तो निरविकल ध्यान चाहिए सम्यक दशा।
नहीं मिले तो?
तो...
25:12मिले तो शास्त्र नहीं चाहिए क्या चाहिए?
सद्गुरु चाहिए।
और हमको शास्त्र मिल गया तो बस।
पढ़ रहे हैं ना हम आत्मा का ही पढ़ रहे हैं ना।
नहीं चलता है।
सद्गुरु नहीं मिले तो फिर क्या चाहिए?
अगर नहीं मिले तो alternative में सत्संग।
वो नहीं होवे तो वितरागी पुरुषों की भक्ति।
वो नहीं होवे तो वितरागी पुरुषों ने जो boundary बनाई है शुद्ध व्यवहार की वो चाहिए।
25:40शुद्ध व्यवहार की वो चाहिए।
तो वो नहीं मिले तो कुछ नहीं चाहिए। ऐसी भावना के सामने हमारे अपने आप को रखो और तोल माफ़ करो तो हम कहाँ हैं?
लगता कैसा है?
हमारी भावना तो शुद्ध है।
लेकिन वो अवलोकन से मालूम पड़ेगा कि हमारे शुद्ध है कि अशुद्ध है।
हमको सही में अपने आत्मा से प्रेम है या नहीं, अब अवलोकन करोगे तो पता चलेगा।
फिर उन्होंने letter में वो भी लिखा।
26:08फिर उन्होंने letter में वो भी लिखा होगा सोनगढ़ से।
कि आपने मनुष्य भव से पहले,
जिस कुटुंब के लिए इतनी हजामत करते हो,
मारे मारे फिरते हो, कमाई करते हो और गुरुदेव से दूर रहते हो।
क्या?
ऐसे भूतकाल में आपने अनंत कुटुंब को छोड़ा है।
और आज गुरु मिलने के बाद भी आप वही गलती करते हो।
कि कानी स्वामी को मिलने भी नहीं आते हो, दर्शन करने भी नहीं आते हो।
26:36तुम्हें तो मिलने भी नहीं आते हो, दर्शन करने भी नहीं आते हो साल में एक बार।
और क्या करते हो?
बस अपने कुटुंब, कुटुंब परिवार के पीछे ही पड़े हो।
सुविधा जुटाने के लिए।
घरभस्ती में फंस गए हो।
आप सच्चे आत्मार्थी नहीं हो।
आपको ऐसा कौन सा सुख मिल रहा है?
जब गुरु के दर्शन करने के लिए भी नहीं आते हो।
ऐसे गुरु के जिनके पहले प्रवचन से ही आपको आत्मज्ञान हो गया है।
27:04पहला ही lecture सुना उन्होंने चौगाणी जी ने।
और सोनगढ़ की धरती पे 14 घंटे के अंदर निर्विकल्प समाधि दर्शन प्राप्त किया।
दर्शन करते ही line मिल गई पूरी।
अब आपको ज्ञान दशा के बाद भी गुरु के दर्शन की पड़ी नहीं है कुछ, गुरु की महिमा नहीं आती है, भक्ति नहीं आती है, गुनाह तो अभी साल में एक बार भी नहीं आते हो।
और दूसरे पाप के द्वारे तो करना है।
27:32आपके द्वारा तो करना है, कुटुंब परिवार उसको सबको पालना पोषना है।
तो सोनगढ़ वालों ने उनको जो उनको मित्र थे आत्माते मनुष्य थे उन्होंने लिख दिया।
आपको क्या सुख मिल रहा है इतना?
तो उसका जवाब मैं और आगे लिखते हैं सोनगढ़ में।
मोक्ष मार्गी को जिसको जल्दी से मोक्ष में जाना है, जन्म मरण से छूट जाना है, उस रास्ते पे चलने वाले को।
कुटुंबी जनों के मध्य सुख।
28:00कुटुंबी जनों के मध्य सुख मिलता होवे।
ये कल्पना ही गलत।
कि आपको लगता है कि मुझे आत्मज्ञान होने के बाद भी मुझे कुटुंबी जनों से प्रेम है और वहां मुझे सुख मिलता है।
तो आपकी ये कल्पना गलत।
सुख मिलता है इसलिए मैं कुटुंबी जनों के बीच में नहीं हूं।
कहने का मतलब क्या है आप?
कि आप जो मुझे tone मारते हो, उलाहना देते हो।
28:28टोन मारते हो उलाहना देते हो कि मुझे कौन सा सुख मिलता है।
कि सुख मिले तो ही मैं रहता हूँ ऐसा थोड़ा है।
मैं गुरु के पास नहीं आ जाता हूँ दर्शन करने के लिए।
इसका मतलब ये नहीं कि मुझे कलकत्ता में या अजमेर में मुझे सुख मिलता है।
कुटुम्बजनों के बीच।
और कुटुम्ब तो वैसे भी मेरा कहाँ है यहाँ है कलकत्ता में।
वो तो कहाँ है?
अजमेर में था वो।
और मेरा दिल तो मैं जानता हूँ।
28:56मेरा दिल तो मैं जानता हूँ।
कि मैं कैसे गुरु के दर्शन के बिना रहता हूँ।
गुरु के दर्शन के लिए मैं कैसे छटपटाता हूँ तो मेरा दिल जानता है।
तो उन्होंने इतना लिख दिया कि मोक्ष मार्गी को।
कुटुंबी जनों मध्ये सुख मिलता होवे ये कल्पना ही गलत है।
बनास दास जी के पद लिखा है।
जाल सो जग विलास।
भाल सो भुवनवास।
29:24बाल सो भुवनवास।
काल सो कुटुंबकार।
लोक लाज नारसि।
ज्ञानी पुरुष के दर्शन हम पढ़े थे ना इधर आ गए थे उत्तम पुरुषों के लक्षण।
किच को कनत जाके करके पद है।
उसमें बीच वाली line है।
कि ज्ञानी पुरुष को जगत के 5 इंद्रियों के जो विलास हैं वो कैसे लगते हैं?
जाल के समान मछली को पकड़ने की जाल होती है ना।
29:52को पकड़ने की जाल होती है।
ऐसे हमको नरक में लेके जाने के लिए यमराज ने कर्मराजा ने जाल फेंकी।
लेओ लेओ अच्छा अच्छा खाना खाओ अच्छा अच्छा पहनो अच्छा अच्छा देखो TV पीवी।
और हमको हम लुभा जाते हैं।
वो अच्छा लगता है।
सब अच्छा मजा मजा आती है और फिर होता क्या है?
जा हम फस गए फस गए कहाँ लेकिन ऐसा है अपने को नरक।
जा जूते खाओ।
30:20वो पहले तो अच्छा अच्छा लगता है।
ये जाल सो जग विलास।
बाल सो भुवन वास।
अच्छे घर में रहना, free bedroom, kitchen, hall, क्या, बड़ा बंगला, terrace, सब facility, car, park, सब।
ये भुवन में रहना।
ये भुवन में रहना उसको कैसा समझते हैं? बाल सो भुवन वास।
बाला नहीं मारते हैं।
30:48बाला नहीं मारते हैं।
पणी वाला होता है आगे त्रिशूल के जैसा रहता है।
बाला।
वो बाले की नोक पे रहते हैं।
ऐसा उनको ज्ञानी पुरुष को।
अपने बंगलों में रहने में इतना दुख तकलीफ होती है।
वो तो चाहते हैं कि कब निवृत्त होकर के ऐसे ही।
निर्वृत्त क्षेत्र में जाऊं अपने आत्मसाधना बढ़ाऊं घर में रहना पसंद नहीं करते हैं।
ज्ञानी पुरुष की आत्मा घर में नहीं।
एक।
31:16घर में नहीं एक तो already एक cab तो है ही है ये भी कोजा room लगता है।
फिर इसके अंदर 3 bedroom kitchen और AC room।
मर गया।
क्या?
एक cab में और एक cab।
क्योंकि हम दूसरे room में भी नहीं जा सकते दूसरे room तो गरम रहते हैं और AC room में ठंडा ठंडा रहता है।
एक तो एक cab है फिर अंदर AC room लगा है ना room के अंदर AC लगा है ना अभी।
अरे साहब।
अब दूसरे room में जाना है तो नहीं जा सकते AC room में।
31:44नाही तो नहीं मैं सीधा हूँ।
AC में रहो ठंडे ठंडे में रहो।
दूसरे room में जाना है तो भी नहीं अब कैद खाना मिला है एक के बाद एक कैद खाना कैसा मिलता है।
अरे भैया उसको घर में ही नहीं रहना है।
उसको तीर्थ स्थानों में इधर इधर मुमुक्षुओं के संग में उधर उधर निवृत्ती स्थान में रहना है।
लेकिन इसको तो और फसाओ और फसाओ कैसा लगता है।
बाल सो भुवनवास।
काल सो कुटुंबकाल।
32:12काल से कुटुंब काज।
कुटुंब के कार्य करना है तो उनको काल के बराबर लगता है कि मेरी मौत आई है अब।
क्या?
Exam के time में बच्चों को बोलो जरा साग भाजी देखियो और सब्जी नीचे से।
कैसा दम पछाड़ करते हैं।
तो मेरे को पढ़ने भी नहीं देते हैं साल में एक बार exam आती है।
हम एकदम पढ़ने में लग जाते हैं।
खाने पीने में time पे नहीं आते हैं उनको थोड़ा भी काम दो तो क्या।
32:40पे नहीं आते उनको थोड़ा भी काम दो तो क्या होगा?
tension में आ जाते हैं।
दम पछाड़ कर देते हैं।
और बोझ लगता है।
इनको कुटुंब के काम करना ज्ञानियों को कैसा लगता है?
यमराज के समान लगता है।
और लोगों को लाज लाज़ है जगत में मेरी इज्जत।
इज्जत बिजत की परवाह नहीं करते क्या नहीं।
वो मुक्की ला के समान हैं।
33:08लोक लाज लागसी बनारसीदास जी की ये जो पंक्तियां हैं।
वो मैंने रख दी यहां पर letter के ऊपर।
अब अपने खुद के विचार बताते हैं ज्ञानी को क्या चाहिए?
अरे उसे तो निरंतर आत्मरमणता चाहिए क्या चाहिए?
ज्ञानी।
33:36क्या चाहिए? ज्ञानी को तकलीफ किस बात की है?
कि वो चाहते हैं कि निरंतर मैं मेरे सुखधाम में जमे रहूं। मेरा उपयोग यहां ही रहे।
लेकिन,
वो अपनी अस्थिरता, अपनी कमजोरी जो भी समझो,
या भावना में कमी, या अपने आत्मा के प्रेम में कमी,
इसी कारण से उपयोग बाहर ज्यादा रहता है।
और दूसरे-दूसरे काम में फंस जाते हैं।
तो वो अच्छा नहीं।
34:04तो उनको अच्छा नहीं लगता है।
क्या?
उनको तो आत्मरमणता चाहिए। ज्ञानी को तो निरंतर, नहीं सुबह दोपहर शाम ऐसा नहीं, निरंतर क्या चाहिए?
आत्मा की स्थिरता चाहिए, अंदर में उपयोग हो।
कहते हैं कि अरे, जिसे धार्मिक जनों के संग भी नहीं रूजते।
क्या?
यहाँ आए तो आत्मा के बारे में lecture नहीं जानना है।
34:32Lecture नहीं जानना है।
आपस में मिलकर के गुरु की तारीफ करना और आत्मा की तारीफ करना।
तारीफ कितनी भी करो भैया, सुख कैसे मिलेगा? तारीफ करने से मिलेगा?
ये सर्व सिद्धि में स्वर्ग में देवता है, भगवान जी ने पीछे लिखा है।
सब एक भवतारी है।
ये उनका आदि भाव है।
वहां से निकल करके मनुष्य बन करके, मनुष्य बन करके, मोक्ष जाने वाले हैं।
35:00वो जीव सर्व सिद्धि के देव वैसे होते हैं।
सब अहम विंद्रण।
उनके नीचे भी कोई नहीं ऊपर भी कोई नहीं।
सब समान।
और कुछ चाहिए भी नहीं।
और भगवान की वाणी सुनने के भाव भी उनको नहीं आते हैं।
इतने वो कि करते क्या 33,00,000 उनका आयुष्य रहता है।
इतना time क्या करते हैं?
बहुत लंबा आयुष्य।
इससे ऊंचा आयुष्य किसी गति में नहीं होता।
उनो...
35:28उनो चर्चा करते आत्मा की गुणों की चर्चा।
आ आपस में मिलकर सभी आत्मज्ञानी एक भवतानी।
और आत्मा की चर्चा करते और करते रहते करते रहते करते रहते और कोई भी चर्चा दोबारा repeat नहीं होवे।
Next time.
हर वक्त नई बातें।
वो सर्वा सिद्धि का एक एक time पूरा हो गया वो आगे से पूरा हो जाता है फौरन दूसरा आ जाता है तो।
35:56हो जाता है फौरन दूसरा आ जाता है वो भी उसमें शामिल हो जाता है।
मतलब ये चर्चा कभी खत्म नहीं होती है आत्मा के महिमा की चर्चा।
फिर भी सोहरावन जी ने अफसोस व्यक्त किया है कि इतनी आत्मा की चर्चा करने से भी उनको चौथे में से पाँचवाँ गुणस्थान वहाँ नहीं आता है।
फायदा क्या?
इसीलिए ज्ञानी नहीं चाहते कि मुझे...
36:24कि मुझे आत्मा की महिमा की चर्चा शास्त्र में लिखा है इसका ये अर्थ है उसके बाद इबादत और उसके बाद detail में भाषण कहना सुनने के लिए मुझे संसारी जीव तो चाहिए नहीं वो तो आत्मा की बात सुनने को तैयार नहीं।
लेकिन मेरी बात आत्मा की बात सुनने के लिए मुझे कौन चाहिए?
मुमुक्षु लोग आजू-बाजू चाहिए धार्मिक जनों के संग चाहिए।
वो ज्ञानी पुरुष की ऐसी भावना नहीं होती।
36:52पुरुष की ऐसी भावना नहीं होती।
जिसे धार्मिक जनों के संग भी नहीं रुचते क्यों?
कि आत्मा की चर्चा करने से आगे नहीं बढ़ना होता है। आत्मा में लीनता होगी ना उपयोग यहाँ जाएगा ना लीन हो जाएगा ना तो आगे बढ़ना होगा।
चर्चा करते रहेंगे तो पुण्य होगा धर्म नहीं होगा।
और हमको मोक्ष में नहीं जाना है, स्वर्ग में नहीं जाना है।
हमको तो मोक्ष में जाना है।
मुक्ति चाहिए बंधन नहीं चाहिए।
37:20मुक्ति चाहिए बंधन नहीं चाहिए।
तो ऐसा कोई भी कार्य करना नहीं चाहते हैं भगवान की भक्ति।
साधर्म्यों में तत्व की चर्चा आदि।
कुछ भी नहीं करना चाहते।
ऐसे लोगों को संग भी नहीं चाहते मुनिराज तो संग छोड़ के चले गए।
जंगल में अकेले।
लेकिन ज्ञानी की ये भावना की बात करते हैं मुनिराज तो practical है आचरण में भी।
लेकिन यहाँ सोगणिय से ज्ञानी की भावना अंतर की क्या है वो बताते हैं।
37:48क्या है वो बताते हैं कि उनको तो धार्मिक जनों के संग भी नहीं रुचते तो ऐसी जो भावना है कि जिनको धार्मिक लोगों के संग भी नहीं चाहिए उसे कुटुंब का संग तो रुच ही कैसे सकता है तो बहुत तकलीफ देता है कुटुंबीय जनों का संग तो बहुत तकलीफ देता है क्यों कि जितने भी झगड़े पंचायत तकलीफें होती है ना तो अपने बाजू में पड़ोसी रहते हैं उससे।
38:16अपने बाजू में पड़ोसी रहते हैं उससे कुछ भी नहीं होगा कभी।
लेकिन घर में तो रोज़ की राह नहीं घर घर की।
रोज कुछ ना कुछ बनता है।
घर ही नहीं है अगर आप लोग नहीं है तो घर ही नहीं है समझ।
वापस मिलते हैं मिलते हैं उनके साथ।
और माथा भी एक दूसरे का वहीं फोड़ते हैं।
फिर एक दूसरे के बिना चलेगा भी नहीं खाने के time पर फिर वापस साथ में ही रहना।
और झगड़ा भी रोज़ करना।
38:44और झगड़ा भी रोज करना है।
क्यों ऐसा होता है?
एक घर बाजू में है, एक ही दीवार है, पड़ोसी के साथ कभी भी ऐसा नहीं होता है।
वो बीमार पड़े तो उनको कोई तकलीफ नहीं।
वो बहुत कमाई कर लेवे तो ही तकलीफ है।
खुशी नहीं होती।
किसी पड़ोसी के लड़के को fracture हो गया तो कोई तकलीफ नहीं।
घर में किसी को होवे तो क्या हो?
कोई बीमार पड़े तो क्या हो?
पड़ोसी में घर के अंदर नौकर चाकर काम पे बराबर नहीं आवे।
काम...
39:12बराबर ही आवे।
काम वाली नहीं आए।
अपने को क्या तकलीफ?
लेकिन अपने घर में नौकरानी नहीं आए तो क्या होता है?
Dance कर लेते हैं।
पूरा।
कितने राग द्वेष करते हैं हम देख।
घर वालों से कितनी अपेक्षा?
एक ही दीवाल में एक एक ही दीवाल है बीच में।
दो बाजू पड़ोस रहते हैं एक बाजू हम रहते हैं।
अब देखो तगड़ा दिन कैसा होता है।
अपेक्षाओं के अंबार हैं इतने लोगों से।
39:40अपेक्षाओं के अंबार हैं अपने लोगों से। अपने लोग हैं ना?
तो उसको बात नहीं करने से नहीं चलता है। पड़ोसी से भले रोज नहीं जाना तो कुछ बात नहीं। बात नहीं करो तो कोई कुछ नहीं।
वो भी हमारे से बात नहीं करता हमको तकलीफ नहीं होती है। नहीं करे तो नहीं करे उसके घर में।
लेकिन यहाँ परेशानी घरवाले मेरे घर में रह कर के बात नहीं करे तो परेशान।
क्या क्यों बात नहीं कर रहे?
मेरे से क्या गलती हुई भाई?
तुम्हारे कोई ego है तो मेरे को भी है।
40:08तुम्हारे को ego है तो मेरे को भी है फिर वो भी शुरू करता है।
आप दोनों ने लगाई पहले।
ऐसा करके वो fighting शुरू हो जाती है अंदर।
हर चीज़ के लिए problem है।
देखिए।
एक घर में अपेक्षाएं बहुत होती हैं और फिर झगड़ा, राग, द्वेष, तकरार।
फिर रहना वहीं है office।
घर छोड़ के जा नहीं सकते office रहना तो इधर ही रहना।
इच्छाएं टकराती।
उसकी...
40:36नाई टकराती।
उसकी ये हिस्सा है उसकी अब channel एक TV एक होता है।
अब तो ऐसा जमाना आ गया हर bedroom में हर घर में TV होना है।
घर में एक TV नहीं अब क्या होना हर bedroom में अलग-अलग TV।
तो अच्छा है अभी ऐसा हो गया मामला।
और कितनी channel मालूम है 200 channel।
पागल नहीं होए तो क्या होए।
Picture देखना पहले theater में महीने में एक बार कभी जाते हो।
Line में खड़े रहना मगजमारी करना अभी तो क्या है रोज का 3-3।
41:04बेइज्जती करना अभी तो क्या है रोज का तीन तीन चार चार जो चाहे picture देख लो पुराने picture के अलग channel लगते हैं उसके अलग उसके अलग अंग्रेजी picture जो पहले कभी जाते ही नहीं थे सुना ही नहीं था कौन सी picture है अभी तो लगा दो button धनाधन देखो 200 channel है time इधर pass चला जाता है रात को 12 कब बजते हैं कब दिन उगता है पता ही नहीं चलता है ऐसा हो जाता है।
41:32तो ऐसे ज्ञानी पुरुषों को तो कुटुंब का संग रुजता ही नहीं। जब धार्मिक संग नहीं रुजता है तो ये कहाँ से रुजता है?
उनको तो निरंतर आत्मब्रह्मणता चाहिए।
अरे, विकल्प आश्रित पदार्थ से भी लाभ नहीं। अगर विकल्प के अनुसार हमारा पदार्थ मिल भी जाए ना,
तो भी लाभ किससे है हमें? उससे थोड़ा होने वाला है।
चलो मान लो सामने वाले ने विकल्प किए कि भई आप आ जाओ home guard।
42:00विकल्प किए कि भई आप आ जाओ सोनगढ़ और ticket मिल गए और आ भी गए।
लेकिन फायदा किससे होगा गुरुदेव से होगा?
उनकी वाणी से होगा?
किससे होगा? सोनगढ़ में पाँव रखने से होता है?
लाभ किससे होगा?
खुद से ही होने वाला है।
जब खुद अंदर आत्मा में दर्शन करेगा तो ही होने वाला है।
ना गुरु से लाभ ना गुरु की वाणी से ना सोनगढ़ से।
वहाँ जाकर के भी उपयोग बार-बार रख के आ गए तारीफ करके।
42:28बार बार रख के आ गए तारीफ करके भक्ति करके आ गए क्या हुआ?
क्या फायदा?
दीन सेवा तो हुई नहीं आत्म शांति मिली नहीं ध्यान तो जमता नहीं है भैया ऐसे जगह पे ध्यान नहीं जमता है तो घर में क्या जमेगा काम?
निवृत्ति में ध्यान नहीं लगता है।
नहीं बहुत मेहनत करते हैं लेकिन परिणाम जमते नहीं फिर बाहर आ जाता है 1 second में अंदर से आता है।
ऐसे पाप के विचार नहीं आते हैं अच्छे अच्छे भक्ति।
42:56आते हैं अच्छे अच्छे भक्ति के उसके विचार आते हैं लेकिन आत्मा उनको अभी जमा नहीं आता।
फिर क्या ज्ञान नहीं मिलता तो घर पे जाकर मिलेगा क्या?
अभी आखिरी गीता तो दिन है अभी।
Last इसलिए मैं बोला अभी इसके थोड़े जूते खा लेने इनके।
अभी वो मुनिराज के बाद में वो वो तो हवा में उड़ जाते हैं ऊपर से जाता है।
मुनिराज के तकला।
43:24गुड़िया की तरफ लात मारी।
पर इनके जूते खावे ना तो पछाड़े।
सीधे हो जाए।
अरे विकल्प आश्रित पदार्थ से भी लाभ नहीं। मिल भी गया तो क्या हुआ? यात्रा यात्रा यात्रा हो गई ने 5 दिन।
फिर क्या ने वातावरण चाहिए लेकिन अंदर गए क्या?
ये क्या फायदा?
विकल्प आश्रित पदार्थ से भी लाभ नहीं। साथ ही विकल्प से भी लाभ।
43:52ना विकल्प पुण्य से लाभ है।
ना वैसे संबंध संयोग मिल जाए तो उससे लाभ है।
लाभ तो केवल।
Only द्रव्य दृष्टि से ही होता है।
आत्मा की दृष्टि करोगे कोई लाभ नहीं।
बाकी लाभ होता ही नहीं।
वो अंदर का दरवाजा खुले बिना कुछ भी कर लो।
शांति नहीं है।
अंदर का दरवाजा खुलना।
ज्ञानियों ने भी अपनी अंदर की बात कही।
44:20जो अपनी अंदर की बात कही सोगाणी को।
अब और आगे।
आपने लिखा है कि सोनगढ़ वाले ने बहुत कुछ लिखा है।
ये तीसरा point।
कि निमित्त नैमित्तिक संबंध ऐसा है।
कि तीव्र भावना होय ने।
तो पाप न उडे पलटी ने पुण्य न उडे थई जाए।
वो।
लिखने वाले ने ऐसा लिखा है कि आपका पाप का उडे बहुत।
इसीलिए आपको गुरु के सानिध्य।
44:48इसीलिए आपको गुरु के सानिध्य नहीं मिलता है और बार-बार सोनगढ़ आने का नहीं होता है।
बहुत पाप का उदय चल रहा है आपका।
लेकिन गुरुदेव ऐसा कहते हैं कि आप तीव्र भावना भावो कि मुझे उधमगढ़ जाना है, गुरु के दर्शन करना ही है, ऐसा भी करते हैं।
मुझे आत्मशांति चाहिए, चाहिए, चाहिए, ऐसे जोरदार भावना भावो।
तो आपकी भावना के कारण से क्या हो जाएगा?
तो पाप का उदय पलट करके काह का उदय हो जाएगा?
45:16करके काहे का उड़े हो जाएगा?
पुणे का उड़े हो जाएगा।
और जैसा पुणे का उड़े हो जाएगा,
आप सीधा कलकत्ता में नहीं रहोगे फिर किधर रह जाओगे?
तो आपको बहानाबाजी करने का भी मैं अवसर नहीं देना चाहता।
लिखने वाले ने ऐसा।
कि आप अगर बोलते हो कि मेरा बाप का उड़े है तो हम नहीं मारेंगे।
मैं उसकी दवा लिखता हूँ।
दवा लिखा उसको जो उसने क्या लिखा है?
आप बहुत जबरदस्त भावना हो।
45:44तो आपके पाप का उदय पलट करके पुण्य का उदय हो जाएगा।
और फिर कलकत्ता रह जाएगा और आनंद में आ जाओगे, गुरु के दर्शन होंगे, गुरु की वाणी सुनोगे और मजे में रहोगे।
जैसे कि सब कुछ मिल जाएगा।
फिर मोक्ष क्या मांगू मैं, मुझे मोक्ष जो मिल जाए।
गुरुवर तेरे चरणों की एक धूल जो मिल जाए, सब कुछ भी नहीं मिलेगा।
भक्ति से ऐसा कहा जाता है।
46:12एक भक्ति से ऐसा कहा जाता है व्यवहार की भाषा है।
क्या?
गुरु की थाली धोने से मोक्ष पुण्य मिलता है ना आत्मा मिलता है।
फड़ाकड़ी करते हैं मैं आज से थाली नहीं ले रहा हूँ।
क्या?
नहीं नहीं नहीं मैं धोऊंगा आज तो मेरे को chance है।
अच्छा बैठे हो तुम chance है तुम जल्दी जाना मोक्ष में।
क्या गुरु की थाली धोने से मोक्ष मिलता है?
मिलता है? नहीं मिलता है ऐसा ज्ञान मिल जाए होता क्या?
प्राप्त हो जाते हैं।
46:40पाप धुल जाते हैं।
पाप धुल जाते हैं।
पाप धुल जाते हैं।
इतना धुल जाते हैं।
इतने कच्चे नहीं होते हैं पाप गुरु की थाली धोने से धुल जाते हैं।
गुरु की थाली धोना होता है पुण्य का भाव है, भक्ति का भाव है।
क्या?
तो पाप भी भोगना पड़ेगा और ये भक्ति हुआ है, उसका जो पुण्य बांधा है ना वो भी भोगना पड़ेगा।
इतना मोक्ष धुल जाएगा।
खबरदार जो किसी ने हाथ लगाया थाली में।
बस।
क्या तो।
47:08या तो मरते हैं मेरे को मेरे को मेरे को।
क्या?
गुरु को लड्डू खिलाओ, पेड़े खिलाओ, क्या क्या खिलाओ। क्या मिलने वाला है भैया?
देखो अब यहाँ आपको लगता है भक्ति का निषेध।
भक्ति का निषेध है ये बात क्यों? अभी कोई मेरे को थाली लेगा नहीं, मेरे को धोना पड़ेगा।
परेशानी हो जाएगी किसी की।
कुछ बोले तो तकलीफ हो जाएगी, नहीं बोलने में ही मज़ा है।
47:36तो तकलीफ नहीं बोलने में ही मज़ा है।
नहीं नहीं कच्चा।
नहीं नहीं।
आज तो आज तो आज तो मेरी पराली भर धुलाई होने वाली है।
नहीं नहीं इतने कच्चे नहीं।
एक sample तो कराएं।
अब देखेंगे कितने सारे जोने आते हैं।
अब सबका चेहरा देखूंगा मैं अब तो मेरे को मालूम नहीं कौन लेके जाता था।
आज सबका ऊपर से देखना पड़ेगा फिर।
कौन लेके जाता है थालो।
परेशानी है।
क्या कहते हैं।
48:04क्या कहते हैं?
कि तीव्र बांधना होता है तो क्या होता है?
कि पाप का उदय पलट करके पुण्य का उदय हो जाता है।
ऐसा उसने शिखामण दिए किसको?
स्वच्छंद को।
और खुद को आत्मा को नहीं जानता और शिखामण किसको देता है?
स्वच्छंद को।
एक भवता इस ज्ञानी पुरुष को देता है शिखामण देखो।
क्या? देखना है कि ये स्वच्छंद नहीं तो क्या है?
ये स्वच्छंद है।
ये ज्ञानी पुरुष को सिखाता है।
48:32ज्ञानी पुरुष सिखाता है तो आपको क्या करना चाहिए?
सिद्धांत लिख करके भेजा है, सिद्धांत को तो ज्ञानी पुरुष भी माने करेंगे तो नहीं करेंगे?
मेरा मैं सिर्फ advice नहीं देता हूँ।
मैंने advice में क्या कर दिया है?
सिद्धांत रख दिए हैं कि तीव्र भावना हो तो पाप का उदय पलट करके भी पुण्य का उदय हो जाता है।
अब इसको ज्ञानी कैसे मना करे?
अब सोगाणी जी की कुछ नहीं चलेगी।
क्या?
49:00क्या? भक्तों उनको मानना ही पड़ेगा और उनको भावना करना ही पड़ेगा।
लेकिन सोहाणी जी कम नहीं थे।
उन्होंने उसका जवाब दिया है।
और जवाब बहुत जबरदस्त है।
Fantastic जवाब है।
क्या लिखते हैं देखो।
विकल्प करें और विकल्प के अनुसार पदार्थ की प्राप्ति हो जाए।
ये कोई पुण्य नहीं है, ये तो पुण्य का फल है।
भूतकाल में बांधे हुए पुण्य का, वो भी भूतकाल में बांधे हुए पुण्य का फल है।
49:28वर्तमान में पुण्य का फल फल है। वर्तमान में विकल्प का फल नहीं है।
इसका तो अभी मिलेगा।
अभी समझो आपने वर्तमान में कोई चीज की भावना की और वो कुछ पदार्थ मिल भी गया।
तो इच्छा की इसलिए नहीं मिला है।
हाँ।
भूतकाल में कोई अच्छा कार्य किया है पुण्य बांधा है उसका उदय भी उस time में है।
इसीलिए आपको ये इच्छा करते ही उसकी delivery आ गई।
हाँ।
तो ये पुण्य है कि पुण्य का फल है?
ये पुण्य...
49:56पुण्य का फल है।
ये पुण्य का फल है। अभी वर्तमान में जो भावना भाई है उसका फल तो कब मिलेगा?
भविष्य में मिलेगा।
पुण्य और पाप के जो हम भाव करते हैं उसका जो फल मिलता है वो immediate नहीं मिलता है।
इसका पहले कर्म बंधन होता है।
क्या?
और फिर अबाधा फल पूरा होने के बाद उसकी delivery आती है जब तक नहीं आती।
पुण्य और पाप करोगे तो उसकी सजा या फल जो भी मिलना है अनुकूलता प्रतिफल तो बाद में मिलती है।
50:24अनुकूलता प्रतिफलता वो बाद में मिलती है अभी नहीं मिलती।
Immediate नहीं है।
आप advance booking करा के बाद में मिलता है।
अभी कोई समझो मुझे स्वर्ग में जाना जा सकता हूँ।
स्वर्ग में और नरक में जितनी भी सीटें हैं totally full हैं।
आप कितना ही पाप करो आपको नरक में जाने को अभी नहीं मिलेगा क्यों seat book खाली नहीं है कोई ज्यादा।
क्या?
और extra वो खड़े वो खड़े खड़े नहीं रखते हैं वहाँ bus में खड़े खड़े नहीं ऐसा नहीं होता है वहाँ।
हाँ एक particular seat...
50:52वहाँ एक particular seat होती है, उसमें जाना पड़ता है।
अब जब तक वो जीव सजा भुगत कर बाहर नहीं निकलेगा, तब तक उसकी seat पर हम जा नहीं सकते।
ना स्वर्ग में, ना नरक।
वहाँ पूरी संख्या fix है।
कैसे जा कर बताइए आप?
तो पाप और पुण्य के जो भी भाव होते हैं, हम करते हैं दिन भर, उसकी सजा, उसका फल अभी का अभी नहीं मिलता है।
ये करुणा योग का विषय है।
लेकिन अगर हम आत्मदृष्टि करें...
51:20लेकिन अगर हम आत्मदृष्टि करें तो आत्मा का आनंद सम्यक निजरा के परिणाम अभी इसी वक्त मिलते हैं।
बोलो।
इसमें आपको कोई waiting नहीं है।
अगर हम आत्मा में लीन हो जाएं तो उसका जो सुख मिलता है वो अभी का अभी मिल जावे।
तो आपको ऐसा करें कि अभी आप एक काम करो आप पैसे दे दो खाना एक साल के बाद आना खाने के लिए।
₹15 थाली के जमा करो।
51:48जमा करो।
क्या होता है?
अभी भूख लगी है।
खाना अभी खाना है और आपको बोलते हैं लाओ कोई sir booking कराओ।
अगले साल ये time में आ जाना क्या करोगे?
मुझे तो अभी चाहिए भूख अभी लगी है।
तो इसकी booking आपको एक साल पहले करानी थी।
ऐसा कोई बोले तो?
तो मिलता था अभी खाना अभी आपके लिए नहीं है।
ये पुण्य आपका इस प्रकार का खेल है।
जबकि धर्मों का...
52:16जबकि धर्मों का ऐसा नहीं है।
इसलिए सोगण ने जवाब दिया है कि विकल्प अनुसार पदार्थ की प्राप्ति होना वो पुण्य नहीं है।
कि पुण्य किसका नाम है?
कि जब भी कोई प्रसंग आता है हमारे सामने।
तब हम तीव्र हर्ष में नहीं जाते हैं, तीव्र शोक में नहीं जाते हैं।
मंदता में रहते हैं।
कषायों को तीव्र नहीं करते हैं, कषाय मंद रहते हैं, तो पुण्य बंधता है।
पुण्य बंधने की ये रीति।
कि।
52:44के प्रतिकूल प्रसंग में तीव्र शोक नहीं करना।
अनुकूल प्रसंग में तीव्र हर्ष नहीं करना और समता भाव में रहना maximum।
जितना समता भाव जितनी degree में होता है ना उतनी degree में उसका पुण्य बनता है।
ये पुण्य बांधने की कला है।
देखो क्या कहते हैं।
विकल्प अनुसार पदार्थ की प्राप्ति होना वो पुण्य नहीं है।
वरन तीव्रता पलट कर मन...
53:12तीव्रता पलट कर मंदता होना वो पुण्य है।
अतः राग छूटने या कम होने में सुख है।
राग खत्म हो जाए या फिर उसकी degree कम हो जाए तब सुख मिलता है।
पदार्थ के मिलने से सुख नहीं मिलता है।
ये सिद्ध किया वो।
वो क्या कहते थे song number में जो मुझे लिखे हैं वो।
कि आप इधर आओ Kolkata छोड़कर के गुरु के दर्शन करो तो सुख मिलेगा।
53:40के दर्शन करो तो सुख मिलेगा।
और वो उसके लिए आपको पुण्य का उदय चाहिए और पुण्य का उदय के लिए क्या करना है? तीव्र भावना भावना है ताकि आपको पुण्य का उदय हो।
या पाप का उदय collect करके पुण्य का उदय हो। फिर आप इधर आओगे। आओगे तो क्या होगा? गुरु के दर्शन करके आपको आनंद मिलेगा।
सोगाणी जी का क्या कहना है?
नहीं।
अगर हमने अभी वर्तमान में ऐसी तीव्र भावना भाई पुण्य की भावना...
54:08भावना भाई पुण्य की भावना सफल होने में देर लगती है।
वहाँ पर वो भावना पे भी आरोप लगा रहे हैं।
हाँ।
स्वार्थी।
आपकी भावना ही नहीं है।
भावना नहीं है।
वो ऐसा indirectly कह दिया कि आपको तीखा भावना नहीं है अगर होती, तो आपका ये पाप का उदय पलट करके पुण्य का उदय होता और आप Kolkata में नहीं रहते और Sonbhadra में आते।
लेकिन भावना अभी कर रहे हैं तो उसका फल तो बाद में मिलेगा।
कि आप नहीं आ रहे इसलिए आपको भावना नहीं है ऐसी थोड़ी बात।
54:36इससे आपको भावना नहीं है थोड़ी बात।
भावना अभी आप अंदर में होगी भी।
और जो उदय चल रहा है वो भूतकाल के पाप का फल है।
ठीक, अब कैसे होगा मेल बताइए।
अभी तो जो delivery आती है वो अभी जो भावना करेंगे उसकी delivery 3 महीने के बाद के 6 महीने के बाद कब आएगी?
क्या?
लेकिन अभी अभी किसका उदय चल रहा है? भूतकाल में किए गए अंतराय कर्मों का उदय चल रहा है।
55:04गए अंतराय कर्मों का उदय चल रहा है। अब क्या करो?
किसी के अंतराय कर्मों के उदय चल रहे हैं और हम आपको उनको ऐसा कहें कि आपको भावना ही नहीं है।
तो ये क्या कर दिया है?
ये judgment सही नहीं दिया है।
Judgment सही है?
नहीं।
तो ज्ञानी के ऊपर आरोप भी लगाया है और ऊपर से शिखामण का ये दिया है।
कि आप ऐसा करो ये भी गलत किया है।
शिखामण जो दिया है ये भी गलत किया है।
मतलब सिडॉन को तोड़ मरोड़...
55:32मतलब सिद्धांत को तोड़ मरोड़ दिया है।
वितराग के जो सिद्धांत है, उसको गलत ढंग से बताया गया है।
तो उनको चौका नहीं पटने वाले थोड़े।
उन्होंने clear कर दिया है।
कि विकल्प अनुसार पदार्थ की प्राप्ति होना वो कोई पुण्य नहीं है।
वरन तीव्रता को उलट कर मंदता होना उसका नाम है।
कि जैसी भी स्थिति हो हम संभव।
हम भावना भाते हैं।
अगर हमको गुरु का दर्शन का योग है, इस प्रकार से हम...
56:00का योग है इस प्रकार से अवसर मिलते हैं तो ज्यादा खुशी नहीं।
नहीं मिलते हैं तो ज्यादा गम नहीं।
ना खुशी ना गम।
balance में रहते हैं।
तो ये balance में रहना उससे क्या होता है?
पुण्य का बंधन होता है।
अगर तीव्र शोक किया, तीव्र हर्ष हुआ, तो ये तीव्र कषाय के परिणाम, पाप के परिणाम।
ये पुण्य के परिणाम नहीं हैं।
तो क्या लिखा है कि सिद्धांत ऐसा है कि राग, द्वेष...
56:28ऐसा है कि राग होवे ही नहीं।
सोनगढ़ जाने का, गुरु की वाणी सुनने का, दर्शन करने का, राग ही नहीं होना।
राग होने का होना, कुछ करना।
वो होना ही नहीं चाहिए।
द्रव्य दृष्टि से ही जवाब देते हैं, उनकी style वही है।
कि अभी जो आपका जुड़ाव नहीं होना, समभाव में रहना।
द्रव्य दृष्टि के बल से ही, आत्मबल से ही बोलता हूँ।
वो तो जवाब पूरे आत्मबल से ही आते हैं।
56:56राग पूरे वातावरण से ही आते हैं।
तो राग छूटने अथवा कम होने में सुख है।
राग पहले तो होना ही नहीं चाहिए अंदर में ही रहना चाहिए।
तो राग यहाँ मिले।
फिर भी चलो हम अंदर में नहीं रह सकते हैं तो भावना होती है लेकिन ऐसा नहीं होना चाहिए कि इसके बिना चलेगा नहीं हमारा।
इतना dependence नहीं चाहिए तो राग आएगा लेकिन इतना जोर नहीं होना चाहिए।
तो सुख मिलता है।
पदार्थ मिले चाहे ना मिले।
हमारे सुख का...
57:24हमारे सुख का आधार पदार्थों के मिलने पर नहीं है।
पदार्थ नहीं मिले तो दुख नहीं है, पदार्थ मिले तो सुख नहीं है।
राग कम होवे तो सुख है, या नहीं होवे तो सुख है।
ये सिद्धांत होता है।
अतः आत्मा स्थित राग की मंता होवे यही भावना है। मुझे गुरुदेव के दर्शन की भावना नहीं है।
मुझे कौन सी भावना है?
आत्मा के लक्ष्य से।
आत्मा के लक्ष्य से समस्त प्रकार के...
57:52समस्त प्रकार के पाप और पुण्य के राग की ममता हो जाए।
ये मेरी भावना है।
देखो भावना कैसी भावना?
मुझे गुरु के चरण मिलते रहे मिलते रहे।
आप ऊपर बिराजो और मैं नीचे बिराजूं।
पूजा करते रहो।
अपना आता है ना?
पुजारी मान रहा था लेकिन मैं तो भगवान को...
वीर प्रभु के...
58:20वीर प्रभु के।
तू मान बैठा पुजारी हूँ बस में।
मानो धन्यवाद।
ऐसी तू मान्यता को।
हाँ भगवान बनने की ताकत है तुझ में।
तू मान बैठा पुजारी हूँ बस में।
ऐसी तू मान्यता को।
छोड़।
के तेरा प्रभु।
तुझमें ही।
एक बात।
सोगाणी जी एक बात कहते।
के मुझे लाभ मिलना है तो कैसे मिलेगा?
मुझे लाभ तो एक ही।
58:48मुझे लाभ तो एक ही पदार्थ से मिल सकता है।
मेरी आत्मा की दृष्टि होगी तो लाभ होगा।
मेरी आत्मा की दृष्टि नहीं होगी तो लाभ नहीं मिल सकता।
इसीलिए वहां आने की भावना मेरे को नहीं है, मेरी भावना एक ही है, कौन सी?
आत्मा के आश्रित, आत्मा का आधार लूं, द्रव्य दृष्टि करूं और उसके बल से समस्त प्रकार के राग टूट जाएं या कम हो जाएं at least अपने आप, automatic कम करूं नहीं, राग...
59:16Automatic कम करूँ नहीं। राग को कम करूँ ऐसा नहीं, हटाऊँ ऐसा नहीं। आत्मा का आधार दो। आत्मा को नज़र में रखो, धरती इधर की रखो। और इसके बल से जितने भी राग हैं, पाप के, पुण्य के, जो भी राग हैं, वो अपने आप खत्म हो जाए या कम हो जाए। मैं तो ऐसी भावना पाता हूँ। मैं कोई और दूसरी भावना पाता, ये भावना कैसे बाना चाहिए नमुक सुत की बात। अभी आगे तो बहुत है 17 number के अंदर। अभी यहाँ तक।
59:44अभी यहाँ तक रखेंगे।
फिर दूसरा कभी लेंगे।
फिर number 7।
अपने बांध लेंगे।
1:00:12बोलो परोपकारी श्री सद्गुरुवे जय।
मैं अब बिल्कुल अलग हो जाऊँ।