Shrimad Rajchandra Vachanamrut
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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Omkar bindu sainyuktam.
0:00Serial number 654, 654, શ્રીમદ રાજચંદ્ર પત્રાંક 495, તારીખ 10-11-2000, શ્રી દેવચંદભાઈ.
मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥
0:28सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥
ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः राजचन्द्र वचनामृत।
0:56વચનામૃત પત્ર number 495 four ninety five ત્રિભુવનભાઈ કો એ પત્ર લિખા હૈ Mumbai સે શ્રી ત્રિભુવન જે કારણ વિશે લખ્યું હતું તે કારણના વિચારમાં હજુ ચિત્ત છે અને તે વિચાર હજુ સુધી ચિત્ત સમાધાનરૂપ એટલે કે પૂરો થઈ શક્યો ન હોવાથી તમને પત્ર લખવાનો.
1:24તમને પત્ર લખવાનું થયું નથી.
કુછ બાત ચલ રહી હૈ ઉસકે બારે મેં ખુલસા માંગે હૈ લેકિન કભી કભી બોલે તો ભી તકલીફ હો જાતી હૈ.
તો કૈસે બોલના કૈસે જવાબ દેના ઓ?
સામને વાલા એસા ભી પકડ સકતા હૈ એસા ભી અસહ પકડ સકતા હૈ.
સહી પકડે તો કોઈ બાત નહીં લેકિન ઉલટા પકડે તો ઉસકા હિત હો જાયે.
કભી કભી મૌન દેના હોતા હૈ.
તો વિચાર હજુ સુધી...
1:52તો વિચાર હજુ સુધી ચિત્ત સમાધાન રૂપ એટલે પૂરો થઈ શક્યો ન હોવાથી તમને પત્ર લખવાનું થયું નથી.
વળી કોઈ પ્રમાદ દોષ જેવો કોઈ પ્રસંગ દોષ વર્તે છે.
કે જેને લીધે કંઈ પણ પરમાર્થ વાત લખવા સંબંધમાં ચિત્ત મુંઝાઈ જાય છે.
લખતા સાવ અટકું થાય છે.
પ્રમાદ દોષ પ્રસંગ બહાર મેં કુછ ભી કરના હૈ પ્રમાદ દો બાજુ સે લેના.
આત્મા મેં...
2:20आत्मा में लीनता है तो बाहर में प्रमाद है, बाहर में झुकाव है तो आत्मा में प्रमाद है।
इनका प्रमाद बहुत अच्छा है मोक्ष की साधना के लिए।
कि बाहर में प्रमाद, जो भी विचार आता है हाँ करेंगे, देखेंगे, देखेंगे, देखेंगे करके वो time निकल जाता है।
समय पे कोई काम पूरे नहीं होते हैं क्योंकि पूरा ध्यान जो है आत्मा की साधना में लगा हुआ है।
तो बड़ी कोई प्रमाद दोष जेवो कहीं प्रसंग दोष बरते से।
प्रसंग दोष माने...
2:48प्रसंग दोष माने के समय पे काम नहीं होना उसका नाम प्रसंग दोष।
In time वायदा किया हो या time पे करना चाहिए।
उस time पे नहीं होवे।
उसका नाम प्रसंग दोष।
के जेने लिधे कहीं पर परमार्थ बात लखवा संबंध मा चित मुंजाई जाछ।
प्रसंग नहीं मिलता है।
आत्मा की बात में लिखापढ़ी करना मुमुक्षुओं को जवाब देना letter-ओं का।
इसमें भी समय नहीं मिलता है।
तो और क्या।
3:16તો ઓર ક્યા જવાબ દેના ક્યા જવાબ દેના સચિત્ત ચિત્ત મેં ઉથલ પાથલ રહેતી હૈ ઓર લિખને કા હી છોડ દેતા હૈ લખતા સાવ અટકું થાય છે.
તેમજ જે કાર્ય પ્રવૃત્તિ છે તે કાર્ય પ્રવૃત્તિમાં અને અપરમાર્થ પ્રસંગમાં જે કાર્યની પ્રવૃત્તિ છે એમાં અને તે કાર્ય પ્રવૃત્તિમાં અને અપરમાર્થ પ્રસંગમાં ઉદાસીન બળ યથાયોગ્ય જાણે મારા.
3:44ઉદાસીન બળ યથાયોગ્ય જાણે મારાથી થતું નથી એમ લાગી આવે છે.
બહુત અચ્છી આપણી એમ કૃપાળુદેવની મહાનતા દેખો.
કે વો આપણે જો બોધ ઈચ્છતે હૈ જો મુમુક્ષુ જીવ હૈ.
ઉનકે સામે વો આપના પરિણામ ખુલ્લા કર દિયે હૈ.
મતલબ ક્યાંક આપણે ભી જો દોષ હૈ વો બતા દેતે હૈ હૈ નહીં તો generally ગુરુ બતાતે હૈ નહીં આપને દોષ.
મુમુક્ષુ આપને દોષ બતાવે લેકિન ગુરુ કભી નહીં બતાવે.
હોવે તો ભી નહીં બતાવે.
4:12गुरु कभी नहीं बतावे, होवे तो भी नहीं बतावे, लेकिन इनमें इतनी सरलता है कि अपने दोस्त बता देते हैं।
उनको ऐसा लगता है कि कार्य प्रवृत्ति जो उत्पाद प्रसंग है गृह दशा के अंदर, उसमें हम ज्यादा involve हो रहे हैं।
साधना जितनी चलनी चाहिए होती नहीं है।
तो अपरमार्थ प्रसंग में जितनी उदासीनता रहनी चाहिए, neutralize होना चाहिए।
राग द्वेष नहीं होना चाहिए, वो नहीं हो रहा है, कहीं न कहीं राग द्वेष हो करके जुड़...
4:40કઈ ને કઈ રાગ દ્વેષ ઓકરકે જોડના હો જાતા હૈ.
તો અપરમાર્થ પ્રસંગમાં ઉદાસીન બડ યથા યોગ્ય જાણે મારાથી થતું નથી.
મેં fight નહીં દે સકતા હું involve હો જાતા હું.
ઓર રાગ દ્વેષ હો જાતે હૈ.
ઇસકા અવલોકન ઉનકો ચાલુ હૈ જાગૃતિમાં.
ઔર ઉસકા દુઃખ હોતા હૈ ઉનકો એમ લાગી આવે છે.
એટલે ઉસકા દુઃખ લગતા હૈ.
અને પોતાના દોષ વિચારમાં પડી જાય પત્ર લખવું અટકી જાય છે.
કે મેરે મેં ઇતને દોષ પડે હૈ તો મેં ક્યાં દુરસરો કો સમજાઉં ક્યાં.
5:08દોષ પડે છે તો મેં ક્યાં દુરસરો કો સમજાઉં ક્યાં દુરસરો કો લખું.
એસા કરકે અપને દોષો કે ઉપર અવલોકન ચલતા હૈ ચિંતન ચલતા હૈ ઔર.
કિસકો આત્મકલ્યાણ કે સંબંધ મેં કુછ કહેના હો લિખના હો તો રૂક જાતા હૈ.
અને ઘણું કરી ઉપર જે વિચારનું સમાધાન થયું નથી.
એમ લખ્યું છે તે તે જ કારણ છે.
First 3 3 કારણ બતાયા હૈ એક તો અભી વિચાર પૂરા હુઆ નહીં હૈ જીસ સંબંધ મેં બાત કરના હૈ લિખના હૈ.
તો Mostly તો વો હૈ કે અભી પૂરા Thinking મેં હી હૈ અભી પૂરા Planning.
5:36पूरा thinking में ही है अभी पूरा planning नहीं बना है।
दूसरा प्रमाद दोष बरत रहा है।
और तीसरा स्वयं में इतने दोष हैं कि मैं किसी को क्या बताऊँ ऐसा करके रुक जाना होता है।
तीन दोष में प्रमुख दोष क्या है कि घणो करी ऊपर जे विचार नु समाधान थयु नथी एम लिख्युं छे ते तेज कारण छे।
तो वो तो matter अपने को नहीं मालूम कि कौन सी matter है जिसके बारे में चर्चा करते हैं तो यहाँ तो कोई ज्यादा हम खुलासा नहीं कर सकते हैं।
लेकिन इनकी जीत की...
6:04लेकिन इनकी जीत की स्थिति का ख्याल में आता है कि साधना करने वाले की जीत की स्थिति कैसे होती है।
कभी-कभी इस प्रकार से प्रसंग भी बनते हैं।
और अवस्था में ऐसा होता है कि उनको भी लगता है कि मेरे में भी बहुत दोष है तो बहुत उदासीनता आ जाती है।
उदासीनता इसलिए आती है कि उदास नहीं रह सकते हैं, प्रसंग में जुड़ जाते हैं, वो देख कर के वापस उदासीनता आ जाती है।
तो अवलोकन करने का फायदा क्या कि हम कहाँ खड़े हैं वो मालूम होगा।
परिणाम का...
6:32परिणाम का अवलोकन क्यों करना? द्रव्य को ही देखना, द्रव्य को देखने से शांति मिलती है तो वही करना, दूसरा क्यों करना? अनुभव करना है ना, अपने आत्मा को देखना है ना, उसकी आराधना करना है, तो अवस्था को क्यों देखना? अवस्था तो क्षणभंगुर है। तो नहीं एकांत में वो बात नहीं लेना। बिल्कुल अवस्था को देखोगे नहीं तो हम कहाँ खड़े हैं वो पता कैसे चलेगा? द्रव्य को देखना है तो निजरा करने के लिए, शांति के लिए, आगे बढ़ने के लिए। लेकिन आगे बढ़े हैं कि नहीं बढ़े हैं?
7:00लेकिन आगे बढ़े हैं कि नहीं बढ़े हैं?
कहीं ऐसा ना हो कि हम परिणाम को देखना तो भूल जावे, जैसा ही परिणाम होने दो मेरे को क्या करने का है?
मैं तो यही safe हूँ, मेरे स्वरूप में कोई फेरफार नहीं होता है।
जैसा का वैसा पूर्ण परमात्मा हूँ, ऐसा ले लेंगे।
तो द्रव्य पे दृष्टि जानी चाहिए, पर्याय पर से दृष्टि छूट कर के।
वो भी नहीं जाती है।
तो कहाँ चली जाती है दृष्टि, कहीं ना कहीं तो जाएगी ही जाएगी।
परिणाम पे नहीं है, परिणाम से उठ कर के द्रव्य पे नहीं आई है।
तो कहाँ जाएगी?
7:28नहीं आई है तो कहाँ जाएगी?
पर पदार्थ में देखने सुनने 5 इंद्रियों के विषय में दृष्टि लग जाएगी।
अब सही चल रहे हैं कि गलत चल रहे हैं कैसे पता चले?
परिणाम को देखने से ही पता चलेगा कि सही चल रहा है कि गलत चल रहा है।
इसीलिए अकेले द्रव्य को ही देखना और परिणाम को नहीं देखना ऐसा नहीं है।
दोनों का ज्ञान हमको होना चाहिए।
साधक दशा के अंदर अभी हम पूर्ण मंजिल पे पहुँचे नहीं हैं, परमात्मा नहीं बने हैं।
तो जितना जितना progress हुआ है...
7:56जितना जितना progress हुआ है वो भी देखना है, जितना अभी दोष बाकी है उसको भी देखना है।
ये दोनों का लेखा-जोखा जो है हमारे को परिणाम को देखने से होता है।
इसलिए कृपालु देव दोनों साधना करते थे।
द्रव्य की आराधना, आत्मा की आराधना भी करते थे, वहां भी दृष्टि जाती थी और वहां से छूटती थी तो परिणाम पे आ जाती थी।
और ऐसे परिणाम में परिणाम की बेफरिगी होती थी।
और द्रव्य पे दृष्टि नहीं आती थी तो बाद में कहीं involve होता था तो वो भी परिणाम से मालूम पड़ जाता था उनको।
8:24परिणाम से मालूम पड़ जाता था कि मेरे में अभी भी इतनी गलतियाँ हो रही हैं, अभी मैं इतना involve हो जाता हूँ। अभी मेरे में वो ताकत नहीं है कि हर प्रसंग के अंदर मैं involve ही ना होऊँ, क्योंकि साधना कर रहे हैं, गृहस्थ दशा है। तो जो-जो घटना घट रही है वो अपने मुमुक्षु को बिल्कुल खुला के देते हैं। अब आगे कहते हैं, क्योंकि ये जो गिरना हो रहा है, परिणाम का गिरना हो रहा है, उसमें निमित्त रूप जो है हमारा प्रवृत्ति है।
8:52हमारी प्रवृत्ति है।
मन वचन काया की जो प्रवृत्ति है।
जो हम जिम्मेदारी संभाल के बैठे हैं दुकान का, घर का, जो भी समाज का।
वो इसमें ज्यादा बाधा रोग।
अगर वहां से निवृत्ति मिले तो इतना।
जागृति बढ़ने का, समय मिलने का अवकाश मिले।
जो प्रमाद दोष फिर होता है ना वो नहीं होगा।
प्रमाद दोष मिट जाता है, जागृति के लिए समय मिलता है।
तो यहां कहते हैं जो कोई भी प्रकारे बने तो।
आ त्रास रूप संसार मा।
भत्तो।
9:20ત્રાસરૂપ સંસારમાં વત્તો વ્યવસાય ન કરવો.
અને સત્સંગ કરવો યોગ્ય છે.
દેખો ક્યા લિખા હૈ.
ક્યોકી ઇસમે હમ ફિર involve હુએ બિના નહીં રહેતે હૈ ઔર હમારી જાગૃતિ છૂટી જાય.
જેટલા વ્યવસાય બઢાતે હૈ.
જરૂરી હૈ ઉતના તો કરના હી હૈ.
કે માંગને કો નહીં જાના હૈ.
અભી હમ મુનિ નહીં બને હૈ કે હમ ઘર ઘર જા કરકે આહાર લેકે આવે ખા લેવે.
પર હમારે મેં ભી બહોત સારે રાગ દ્વેષ કે ભાવ પડે હૈ.
યે ખાના હૈ યે નહીં ખાના હૈ એસા હી પડે હૈ.
કભી વો રાગ પૂરા છૂટા નહીં હૈ તો ફિર અભી મુનિ...
9:48राख पूरा छूटा नहीं है तो फिर अभी मुनि जैसा नहीं ले सकते।
मुनि बनने के बाद को ऐसा बोलो कि आज तो मेरे को खट्टा मिला, आज तो मेरे को तीखा मिला, तबीयत खराब हो गई।
अब इस घर दोबारा नहीं जाना है क्योंकि ये लोग खट्टा बनाते हैं।
ऐसा होता है?
जो चाहा था वो तो नहीं दिया और जो नहीं था वो दिया मेरे को।
देखो।
एक तो मुनि बनने के बाद मांग नहीं सकते।
अब तो अभी आजकल के मुनि-आजन वो देखो तो बातचीत भी हुई हमारे उनके साथ।
वो बोला इतना यहाँ का हमको जमता नहीं है कभी खट्टा...
10:16यहाँ का हमको जमता नहीं है कभी खट्टा आता है इस घर में उस घर में तीखा आ जाता है।
हमको तो नहीं जमता है हम तो फिर सब भोला बोल देते हैं कि भैया बनाना है तो ऐसा बनाओ ये आगे से phone कर देते हैं।
Message भी आते हैं कि आज ये बनाया है तो हम आते हैं आपके पास नहीं तो नहीं आते फिर भी।
देखो।
सहन नहीं होता है परिणाम में विचार व्यक्त किया उन्होंने जब अवलोकन की बात बताई तो उन्होंने next day जो है अपने परिणाम को बताया।
कि शाम में कहाँ जाना है वो अभी से ही plan।
10:44कि शाम में कहाँ जाना है वो अभी से ही planning खाते ही planning शुरू होता है। शाम में कहाँ जाना आज तो सुबह तो जाके आया। शाम में कहाँ जाना ये सब दिमाग में आता है।
ऐसे ये कोई मुनिराज की भूमिका नहीं है मुनिराज की भूमिका तो बहुत सर्वश्रेष्ठ होती है।
तो उपयोग जो है खाने पीने में देखने करने में चले जाते हैं।
Involve हो जाते हैं गृह दशा के अंदर।
तो प्रवृत्ति के कारण सोचने का आत्महित के बारे में ज्यादा वक्त नहीं मिलता है।
तो इनका ये कहना...
11:12तो इनका ये कहना है कि मेरे को भी मेरी साधना में जो रुकावट आती है, उसमें ज्यादातर ये व्यवसाय है, उसकी बहुत बाजा रूप है।
दुकान में पूरा जिम्मेदारी उन पे डाल दिए थे पूरे।
सबसे ज्यादा अच्छा business नहीं करते थे, अच्छा business माने क्या ग्राहक इनके पास ही पड़ता था।
कभी-कभी 3-4 प्रार्थना होवे लेकिन ग्राहक एक के पास ही आवे।
दूसरे बैठे हों तो बात ही नहीं करते, नहीं है चले आता है।
बाद में आता हूँ करके, ऐसा बनता है।
इनकी जबान बहुत मीठी, समझाने का तरीका...
11:40जबान बहुत मीठी समझाने का तरीका धोखाबाजी नहीं बिल्कुल।
purely ईमानदारी से।
जो धंधा करते थे जिस प्रकार से इसमें धंधा बढ़ते चले गया।
जितनी ईमानदारी ज्यादा उतना धंधा बढ़ता है।
लोग नहीं आने वाले भी आते हैं reference देते हैं।
कि हम यहां से आए इतना फायदा हुआ आप भी वहां जाओ।
आपको फायदा... ऐसा करके 2 से 4, 4 से 16 ऐसा... फुर्सत नहीं मिलती है।
इनका ये कहना है कि जो कोई पनि प्रकारे बने तो आ त्रास रूप संसार मा वधतो व्यवसाय न करो।
12:08સંસારમાં વધતો વ્યવસાય ન કરવો.
તો ક્યાં કરના ફિર ખાલી બેઠે રહેના કે નઈ ખાલી નઈ બેઠના.
સત્સંગ કરવો યોગ્ય છે.
એ ત્રિભુવનભાઈ કોઈ બાત એનો લખી.
આગે કહેતે હૈ.
મને એમ લાગે છે કે જીવને મૂળપણે જોતા જો મુમુક્ષુતા આવી હોય તો.
નિત્ય પ્રત્યે તેનું સંસાર બળ ઘટ્યા કરે.
એ મૂળ વાત કહી.
વિતરાગ વાણી સુને કે બાદ.
12:36वितराग वाणी सुनने के बाद आत्मकल्याण करने की भावना जागृत हुई है।
तो बढ़ती नहीं है जहाँ की वहाँ है।
इसका मूल कारण क्या है?
कि वास्तव में जीव को संसार में भी कई रुचि है।
मुमुक्षुता अभी purely जो होनी चाहिए 100% की वो नहीं आई है।
तो इनको ऐसा लगता है कि मने एम लागे छे।
कि जीव ने मूढ़पणे जोता जो मुमुक्षुता आई होय तो।
अगर सच्ची आत्मकल्याण की भावना हो तो।
Day by day संसार के आकर्षण।
13:04संसार के आकर्षण में से वो छूट जाता है।
धीरे-धीरे खाने में से रस जाता है, देखने में रस जाता है, सुनने में रस जाता है।
कहीं बेकार का बिना वजह जाना-आना होता है, उसमें रस जाता है, paper पढ़ना छूट जाता है।
जिसमें हमारा कोई प्रयोजन नहीं, पढ़ के 1 second में भूल जाने वाले।
ये सब धीरे-धीरे धीरे-धीरे बिल्कुल zero हो जाता है।
जितना उपयोग फालतू का बाहर जाता है,
जिसमें आत्मा को बिल्कुल फायदा नहीं है, वो सारी activity रुक जाती है अपने आप।
13:32रुक जाती है अपने आप।
क्योंकि अवलोकन से पता चलता है कि मेरा समय कितना waste हो जा रहा है।
बिना प्रयोजन की बातों में।
वो सब cut होता है, भावना वाला जो है वो समय बचाता है।
क्योंकि कुछ कार्य तो हम गृहस्थ दशा में हैं तो करना ही पड़ता है, जैसे व्यापार धंधा।
बड़े ज्यादा नहीं बढ़ाऊँ लेकिन जितना है उतना तो करना पड़ता है।
शारीरिक जो नहाना धोने में उतना भी time जाता है।
थोड़ा कुटुंब परिवार में भी थोड़ा बहुत time जाता है।
जितना बचाना है उतना बचाना है, save करना है, क्योंकि हमको आत्म कल्याण करना है।
14:00Save करना है क्योंकि हमको आत्मकल्याण करना है।
लेकिन ये कौन करेगा?
जिसको सही में आत्मकल्याण करना है।
वो जीव तो day by day day by day अपनी आत्मकल्याण की प्रवृत्ति को बढ़ाएगा।
और संसार की प्रवृत्ति को कम करेगा।
10 बजे दुकान खोले तो उसके बदले 11 बजे खोलेंगे लेकिन सत्संग करके जाएंगे।
सत्संग को miss नहीं करना है।
जब जब भी मौका मिले तो।
इसके बीच में भी कभी निवृत्ति में कहीं 2 4 दिन 8 दिन जाने का हुआ।
तो मेरा व्यापार में भी कोई संभालने वाला नहीं है नुकसान हो जाएगा।
14:28Paper में फिर कोई संभालने वाला नहीं है नुकसान हो जाएगा ऐसा हो जाएगा।
कि नहीं choice।
Choice क्या है?
व्यापार धंधा वो पाप का कार्य है और नसीब में है उतना ही मिलता है।
आप दुकान खोल के बैठो तो ग्राहक आता है ऐसा कोई जरूरी नहीं है।
खोलना पड़ता है लेकिन ग्राहक आना नहीं आना।
अपने हाथ में नहीं है।
धंधा बढ़ना नहीं बढ़ना अपने हाथ में नहीं है।
तो क्या सोचते हैं?
Choice करते हैं तो आत्मकल्याण का ज्यादा फायदा होता है वहां चले जाते हैं।
यात्रा पे चले जाते हैं, निर्वाति में चले जाते हैं।
थोड़ा नुकसान होता है तो उठा लेते हैं।
14:56आते हैं। थोड़ा नुकसान होता है तो उठा लेते हैं। दुकान 8 दिन बंद रहेंगे तो बंद रहेंगे। क्या खटा-मोड़ा होने वाला है?
ऐसा करके avoid करते हैं। निवृत्ति में ज्यादा पसंद करते हैं। वो किसको कौन करेगा? जिसको आत्मकल्याण करने की सच्ची भावना है वो ऐसा करेगा।
संसार मा धन आदि संपत्ति घटे के नहीं ते अनियत छे।
हम समझो यात्रा पे चले गए 8 दिन दुकान बंद रही तो पैसा कम होना नहीं होना वो अपने हाथ में नहीं है।
अनियत माने क्या?
15:24अनियत माने क्या हो सकता है कम भी हो जाए income हो सकता है बढ़ भी जावे।
दोनों काम बन सकते हैं।
अभी हमारे भरूच में मुमुक्षु हैं पंकज भाई वो सत्संग का इतना रस लग गया कि वो 21 दिन तक factory पर नहीं गए।
सिर्फ 5-7 दिन के लिए आए थे सत्संग के लिए ज्यादा interest हो गया तो और रुक गए ज्यादा interest हो तो और रुक गए ऐसा करते करते 21 दिन।
जब वापस factory में कदम डाला तो 21 दिन।
बाकी एक दो बार message दे दिया था कि अभी आप संभाल लेना कल।
result...
15:52Result देखा तो बोले आज तक कभी भी इतना production नहीं हुआ, इतना production हुआ है।
मैं सामने खड़े रहता हूँ तो इतना काम नहीं होता है।
अभी आने के बाद अब तक की जितनी history है, उसमें सबसे ज़्यादा production हुआ है।
इन लोगों ने कमाल करके दिखाया है।
कम से कम 1.5% ज़्यादा हुआ है। जब ₹1,00,000 का होता है तो ₹1,50,000 का हुआ है।
इनका तो करोड़ों का धंधा है तो ज़्यादा हुआ है।
मेरी गैरहाजिरी में इतना अच्छा काम हुआ, आज सबको party दे रहा हूँ मैं।
करके बोले।
16:20दे रहा हूँ मैं।
और के बोले।
इतना अच्छा संभाला है उनका पूरा 1 number धंधा है totally।
ऐसा हुआ है इनका।
जरूरी नहीं है कि हम नहीं जावे तो धंधा कम हो जावे। ये हमारा मगज में है कि हमारा ध्यान हमारी हाजिरी होगी तो ज्यादा अच्छा होगा।
और नहीं होगी तो जैसा कि पूरा सब के कर्ता धर्ता हम ही हैं ना जैसा कि। लेकिन नहीं पूर्व पुण्य और पाप के ऊपर आधारित है।
Business बढ़ना नहीं बढ़ना वो।
गुरुदेव का Bangalore में जब प्रतिष्ठा थी जब।
गुरुदेव आने वाले थे।
16:48गुरुदेव आने वाले थे Bangalore मंदिर के opening होने वाले थे।
Bangalore में बबूत मत बंदारी ने ₹8,00,000 दे करके मंदिर बनवाया।
दूसरे एक मुमुक्षु ने ₹4,00,000 दिया।
और गाँव गाँव में पूरे में पत्रिका छापना वो करना सबको बुलाना करना आयोजन करना इतने लोगों का।
5000 आदमी आने वाले हैं बाहर गाँव से तो उनका रहने की व्यवस्था प्रसंग का पूरा गुरुदेव आने वाले थे उनके अलग ध्यान रखना।
कि मंदिर का अलग इतना बोझा उठा लिया लेकिन महीना भर तक गए नहीं।
17:16महीना भर तक गए नहीं, factory में नहीं, office में नहीं, किधर भी नहीं।
क्या हो रहा है पता नहीं था। पूरा इधर involve हो गए।
इसमें कोई खरीदी नहीं हुई, नहीं जो हुआ वो बेचो, बाकी नहीं है तो मना कर दो।
बहुत बड़ा लाखों करोड़ों का export import का कामकाज, steels का।
तो पूरा choke up हो गया business, जो stock था उतना बेचा।
Stock इतना जबरदस्त stock था कि वो बेचने में भी ध्यान नहीं रहा, order आया तो fail हो गए, stock वैसे ही पड़ा।
17:44Order आया तो fail हो गए, stock वैसे ही पड़े रहा, बेचा नहीं माल को।
खरीदी पहले ही हो गई थी तो गोदाम में माल पड़ा था पूरा।
सब प्रसंग हो गया, एक डेढ़ महीने के बाद जाके office में बैठे।
तो जो खरीदा था वो दाम था ₹5, तो जो बेचने का अभी जो market का भाव हुआ ₹8।
देखो आप।
बेचे तो ₹5 का माल सवा पाँच में बेचते थे।
क्या? rolling में।
क्योंकि ज्यादा margin नहीं मिलता है।
लेकिन पड़े रहा।
तो जितना बेच करके जितना profit कमाते उससे कई गुना ज्यादा profit...
18:12कितना profit कमाते उससे कई गुना ज्यादा profit इसमें आया है।
वो 8,00,000 नहीं 80,00,000 निकल गए।
वो 8,00,000 खर्च करे ना 80,00,000 निकल गए बोल रहे थे।
इतना फायदा हुआ है गुरुदेव के पगले पड़े ना तो ऐसा हुआ।
वो तो ऐसी मान्यता वाले हैं।
भगवत मल जी क्या है वो मूल दिगंबर नहीं है उनके सिद्धांतों का कोई अभी अभी तो अभ्यास है लेकिन पहले नहीं था।
तो बोले देखो गुरुदेव का चमत्कार हुआ है 8 से 80 हुआ।
अब काम पे नहीं गए बिल्कुल एक डेढ़ महीना तक तो भी ऐसा हुआ।
यहाँ ये कहते हैं यहाँ पर।
18:40यहाँ ये कहते हैं यहाँ पर।
कि संसार मा धन आदि संपत्ति घटे के न घटे ते अनियत है कभी कम हो जाए कभी नहीं होवे।
हमारा ध्यान की कोई जरूरत नहीं है वो अपने आप film बनी हुई है वैसा बनता है।
कम होता है ज्यादा होता है वो तो अपनी film के अनुसार बनता है।
पर संसार प्रति ते जीवनी जे जीवनी भावना ते मोड़ी पड़या करे।
जैसे समझ समझ आएगी अपना नुकसान फायदा का मालूम होगा।
जागृति बढ़ेगी।
तो संसार के प्रति।
19:08तो संसार के प्रति जो हमारा attraction है, जो हमारा बल आधार लिया हुआ है, ऐसा होवे तो अच्छा, ऐसा होवे तो अच्छा और ऐसा नहीं होता है कभी, होता है तो राजी होता है, नहीं होता है तो तकलीफ में आ जाता है।
तकलीफ में क्यों आया कि हमने पहले से ही ऐसी demand रखी थी, ऐसा नहीं हुआ तो तकलीफ में आ गए।
Demand ही नहीं रखे तो फिर जो होवे सो होवे, तकलीफ नहीं होवे, राजीपा नहीं होवे।
लेकिन demand हमारी रहती है, इच्छा होती है।
इच्छा के कारण ये problem आता है।
आत्मारथी जीव की सिर्फ आत्मकल्याण की इच्छा होती है।
19:36आत्मार्थी जीव की सिर्फ आत्मकल्याण की इच्छा होने से संसार की कोई इच्छा नहीं होती है।
इसलिए जैसे-जैसे वो साधना करते जाता है, जागृति में आता है, ऐसे-ऐसे उसकी demand कम होती जाती है।
ये होवे तो अच्छा, ये होवे नहीं, जैसा होवे चला लूंगा।
तो संसार की जो भावना होती है, बल होता है, वो कम होता है और आत्मबल बढ़ता है।
संसार प्रति जे जीवनी भावना ते मोड़ी पड़या करे, अने अनुक्रमे नाश पामायो देथा है।
धीरे-धीरे, धीरे-धीरे करके सारी संसार की इच्छाएं खत्म हो जाती हैं।
20:04के सारी संसार की इच्छाएं खत्म हो जाती हैं।
यह अवलोकन की मतलब जागृति का इतना कमाल है।
कि आप अपने परिणामों को देखते चले जाओ।
सही है कि गलत है आपको अपने आप मालूम पड़ जाएगा।
अगर आपको मौत में जाना है तो धीरे-धीरे सही गलत परिणाम निकल जाएंगे, अच्छे परिणाम बढ़ते जाएंगे।
ऐसा करते-करते संसार की पूरी भावना zero हो जाएगी।
जब zero हो जाएगी तब आप ध्यान में बैठें।
तो निरीकंपा अवस्था आती है।
थोड़ी देर के लिए भी।
तो समझना कि हम इस मुकाम तक पहुंचे हैं।
हमको...
20:32मुकाम तक पहुंचे हैं।
हमको सही मुमुक्षुता है तब मालूम पड़ता है, इसके पहले मुमुक्षुता है मालूम नहीं पड़ता है।
सही है कि नहीं है नहीं मालूम पड़ता है।
जागृति में रहते रहते रहते रहते बिल्कुल विचार शून्यता आवे तो समझना कि हमने संसार से नाता अब छोड़ा है।
और आत्मा से नाता जोड़ा है, हमको वास्तव में आत्मकल्याण करने की भावना है।
भावना में अब कोई खोट नहीं है ऐसा।
नहीं तो क्या है भावना मिश्र होती है, थोड़ी संसार की भावना थोड़ी आत्मा की भावना ऐसा होता है।
तो उसको बढ़ाना पड़ता है।
तो साधना करते करते जाग...
21:00तो साधना करते करते जागते में रहते रहते बड़ा है तो जब ध्यान में बैठे तो कोई विचार ही नहीं आवे।
शून्यता आवे।
अच्छे बुरे कोई नहीं।
पर 1 minute के लिए 2 minute के लिए भी सही लेकिन ऐसा होता है।
तो अनुक्रमे नाश पामा योग्यता है।
आ card में ये बात घणो करके जवा में आवत नथी लेकिन ये जो card है उसमे ऐसे जीव तो मिलना बहुत मुश्किल है।
कि जिनको संसार की कोई रुचि न हो।
आत्मकल्याण की 100% की भावना हो।
ज्ञानी तो नहीं मिले।
लेकिन pure मुमुक्षु जिसको बोले।
21:28मुमुक्षु जिसको बोले।
जिसको सिर्फ आत्मकल्याण ही करना है ऐसी भावना है, ऐसे मुमुक्षु भी pure मिलते नहीं हैं।
कोई ना कोई कहीं ना कहीं क्रियाकांड में उधर उधर आग्रह में फंसे हुए हैं।
आत्मकल्याण करना है तो उसके लिए क्या करना है उसने खुद ने किसी के सुन से सुनने के बाद या अपने आप decision ले लिया है।
रोज सुबह उठकर के ऐसा पूजा पाठ करूंगा तो मेरा आत्मकल्याण हो जाएगा।
इतने उपवास करूंगा तो हो जाएगा।
Decision खुद ने लिया है, कोई किसी ज्ञानी को पूछकर के नक्की नहीं किया है।
कि सही है कि गलत है।
21:56ये सही है कि गलत है। आँख बंद करके चले जाना है।
इसमें कोई दूसरी बात आती है तो पहले तो चौंकना होता है कि ये क्या है।
जब हम इतना करते हैं वो भी छूट जाएँगी।
लेकिन ये आग्रह है वो छुड़ा रहे हैं।
क्रिया होवे नहीं होवे मतलब नहीं, आग्रह जो है वो बाधारूप है।
आत्मकल्याण करने वाले जीव को किसी क्रियाकांड का, मंत्र तंत्र का आग्रह नहीं होता है।
आग्रह छूट जाता है।
क्रिया भले ही हो, आग्रह नहीं रहना चाहिए। आग्रह रहा तो आत्मकल्याण का निधान नहीं है अभी भी।
हम सरल नहीं हैं उसके लिए।
22:24હમ સરળ નહીં હૈ ઉસકે લિયે.
કાળકાળમાં એ વાત ઘણું કરીને જવામાં આવતી નથી.
કોઈ જુદા સ્વરૂપમાં મુમુક્ષુ અને કોઈ જુદા સ્વરૂપમાં મુનિ વગેરે જોઈને વિચાર થાય છે.
ઉસ સમય મેં ભી સાધના કરને વાલે તો બહોત થે.
ક્યુંકી સબકો સુખ ચાહીયે.
ઓર સંસાર મેં હરેક પ્રકાર કી ઈચ્છા હરેક કી પૂરી નહીં હોતી હૈ તો સોચના હોતા હૈ.
કે એસા ક્યું હો રહા હૈ સહી કદમ કિયા હૈ દુકાન ગયા ફિર loss ક્યું હુઆ?
નોકર કો તો પગાર ભી મિલા.
Sales tax વાળા કો sales tax મિલા income tax વાળા કો income tax મિલા.
22:52Income Tax मिला Income Tax वाले को Income Tax मिला। दुकानदार को किराया मिला जिसकी भी दुकान थी उसको।
क्या?
और ये इतना साल भर मेहनत करे हिसाब रखे उता पटक करे रात दिन करे हिसाब लगाया साल भर के बाद।
इतना घाटा।
देखो।
घाटा मतलब अपना जो था वो भी चला गया।
घर की रोटी खाई और ऊपर से और कर्जा बढ़ गया। ऐसा भी होता है कि नहीं होता? फिर ध्यान रखा था ना?
ऐसा तो नहीं हुआ है कि चार का माल पौने चार में बेचा है।
चार का माल...
23:20पौने चार में बेचा है।
तरका माल तो पाँच में ही बेचा है, सवा चार में बेचा है।
फिर ये क्यों, क्यों बेच नहीं रही?
कि पूरी साल भर की मेहनत बेकार चली गई।
जो खट्टा खोदा है वो दूसरे दूसरे साल में भी उसका adjustment करना पड़ेगा।
Competition में दाम ज्यादा ले सकते नहीं।
ज्यादा माल मंगाकर overstock नहीं कर सकते।
Time पे माल नहीं रहे, ग्राहक आए तो भी तकलीफ।
चारों ओर से तकलीफ है व्यापारियों को।
क्या करें? Taxes देखो तो बढ़ते जाते हैं।
फिर इतने tension में...
23:48इतना tension रहता है payment time पे नहीं आता है payment time पे जाता नहीं है माल time पे नहीं आता है।
ऐसा ऐसा problem होता है ये दिवाली के ऊपर जो बम्बई से जो माल मंगाने वाले हैं जो खाने पीने की मिठाई वगैरह।
धनतेरस के दिन पूरी गाड़ियां रुक गई थी वहां checkpoint के ऊपर।
अचानक shelters वालों ने क्या किया भगवान जाने।
धनतेरस को माल आना था सबको बांटना था order ले लिया था सबके आड़ा आड़ी और माल नहीं है आ गया है वहां से निकल गया।
Payment चुकाना पड़ेगा एक हफ्ता भर भी रह गया तो पूरे सड़ जाने वाले हैं।
24:16हफ्ता भर भी रह गया तो पूरे सड़ जाने वाले हैं और time पे काम नहीं आवे तो overstock हो जाएगा। देखो ये।
ऐसा होता है कि नहीं पूरे लोग रो रहे थे व्यापारी लोग कि क्या करें अब हम।
पूरा माल जाम कर दिया उधर road पे ही।
दिवाली का time है।
तो ये ये जो खाने पीने की चीजें हैं तो फटाफट order heavy stock में आया तो पूरा कमाने के लिए जो किया वो सब loss में चले गया।
साल भर का loss हो जाता है इसके अंदर कभी-कभी।
season जो overstock करके लिया है साल भर की खत्म हो जाती है कमाई।
24:44तो ये अपने हाथ में बात नहीं है लेकिन यहाँ पर देखे तो कोई जुदा स्वरूप मुमुक्षु।
मुमुक्षु देखो तो बस सुबह प्रतिक्रमण कर लिया शाम में प्रतिक्रमण कर लिया थोड़ी भक्ति कर ली थोड़ी उपासना जाके आए मंदिर तक।
हार त्यौहार में मिछा मिंदु कर्म कर लिए वो कर लिए।
मतलब ये ऐसे मुमुक्षु।
बाकी सारा दिन धंधा व्यापार उठा पटक राग द्वेष पल पल में करते हैं।
ऐसे मुमुक्षु और ऐसे ही चाहे मुनिराज हैं।
तो originality गई मुनिराज में भी कितने प्रकार के दोष।
25:12कितने प्रकार के दोष।
वो लकड़ी से लेकर के फिर वस्त्र वस्त्र लकड़ी से लेकर के चश्मा mobile phone सब आ गया है अब तो मुनिराजों के पास में।
हर चीज घर में नहीं होवे इतनी सुविधा उनको उपाश्रम में और वहां मिल जाती है।
लोगों का परिचय उसको छुट्टी नहीं है आचार्य को तो खलास।
side के जो शिष्य होते हैं वो तो ठीक है समझो कि उनको थोड़ा time मिलता होगा आचार्य को time नहीं मिलता है एक के बाद आते हैं सब मंगली सुनाओ तो मंगली सुनाने में ही जिंदगी पूरी हो जाती है उनकी।
एक के बाद...
25:40एक के बाद एक आते रहते हैं पैर पड़ते हैं मांगलिक सुनाओ।
दिन में 1000 बार तो मांगलिक सुनाते हैं।
उसमें ही जिंदगी पूरी हो जाती है आत्मचिंतन कब करेंगे?
समय नहीं मिलता है तो यही बोलते हैं यहाँ पर।
कोई जुदा स्वरूप में मुमुक्षु हैं जुदा स्वरूप में मुनि वगैरह जो इन्हें विचार थाए हैं।
क्या विचार होता है?
कि आवा संगे करी जीवनी ऊर्ध्व दशा कभि घटे नहीं।
इनका संग करेंगे तो जीव आगे तो नहीं बढ़ेगा।
ऊर्ध्व दशा माने क्या मोक्ष मार्ग में आगे बढ़े।
ये तो possible नहीं है।
26:08मैं आगे बढ़ूँ। ये तो possible नहीं है।
कोई बात नहीं आगे नहीं बढ़ेंगे।
लेकिन नीचे नहीं गिरे तो भी ठीक है लेकिन नहीं अधोदशा तो भी घटे।
आगे बढ़ने के बदले जीव नीचे गिरते।
उस काल में आज से कम से कम 100-150 साल पहले की बात है तब मुनिराज का ऐसा स्वरूप था।
मुमुक्षु का ऐसा स्वरूप था अभी आज देखे तो।
आज तो और विकृत हो गए हैं।
इनका संग करने से अधोदशा होगी उर्ध्वदशा तो होने का chance ही नहीं है।
लेकिन minus point में जा...
26:36Chances નહીં છે, લેકિન minus point મેં જાઓગે.
જો આત્મભાવના છે ને વો ભી ખતમ હો જાયેગી.
વળી સત્સંગનો કઈ પ્રસંગ થયો છે, જેવા જીવની વ્યવસ્થા પણ,
કારદોસ્તી પલટતા વાર નથી લાગતી.
થોડા બહુત સત્સંગ કિયા હોય, થોડી બહુત આત્મભાવના જાગી ગઈ,
લેકિન સંસાર કા એસા વિચિત્ર સ્વરૂપ હૈ કે કોઈ એસા પ્રસંગ આ ગયા,
તો સત્સંગ છૂટ જાતા હૈ, આત્મભાવના કમજોર હો જાતી હૈ.
ખતમ, વો જીવ પલટ જાતા હૈ 1 second કે અંદર.
આતે આતે રૂક જાતા હૈ, એસે ભી cases નહીં બને.
27:04आते आते रुक जाता है ऐसे भी cases नहीं बने अपने।
तारंगा में एक भाई आया बहुत उत्साह बताया तारंगा के बाद मुँह नहीं बताया।
Phone किया तो phone पे जवाब नहीं दे रहे।
क्या बात है कुछ problem वो भी नहीं बताते हैं।
आना ही बंद हो गया है बोलो।
Regular आने वाले जीव अचानक क्या पलटा आया क्या दिमाग में आया भगवान को मालूम पूरा खत्म।
एवा जीवनी व्यवस्था पण कार दोस्ती पलटता भार दोस्ती लागती मतलब क्या है अभी इसका।
कि सत्संग में आने के बाद आपको बहुत जल्दी।
27:32आने के बाद आपको बहुत जल्दी से एक काम पहले कर लेना है।
कौन सा? Saint person की आत्मभावना।
एक सबसे पहले कर लेना है। उसमें ज्यादा time नहीं गवाना है।
तो समझना कि आपको सत्संग जो मिला है,
वो पूर्व पुण्य के वजह से जो सत्संग थोड़ा बहुत भी मिला,
उसका आपने सही फायदा उठाया है।
कि आत्मभावना 100% की हो गई।
अब जो सत्संग छूट भी जाएगा तो भी आप intact रहेंगे। externally छूटता नहीं है लेकिन छूट भी जावे तो भी,
आपकी आत्मभावना में बदलाव नहीं आएगा।
28:00आपके आत्मभावना में बदलाव नहीं आएगा saint person हो जाने के बाद।
होता क्या है अधूरी भावना रहती है सत्संग होने के बाद।
और इसमें प्रमाद करते हैं हाँ धीरे-धीरे करेंगे धीरे-धीरे करेंगे ऐसा नहीं।
सबसे पहले 2-4 दिन में 8-10 दिन में ही फैसला कर लेना चाहिए कि मेरे को अभी ये करना है कि वो करना है।
Total क्रिया कैसी भी है क्रिया का बाद नहीं है भावना का बाद है।
सत्संग में आने के बाद भी जो भावना अभी भी संसार की अंश मात्रा भी रही तो उसको तो चोंपनी लगा देना।
नहीं तो क्या है कि ये सत्संग पूर्व के पुण्य के...
28:28नहीं तो क्या है कि ये सत्संग पूर्व के पुण्य के उदय से मिलता है और पाप के उदय से नहीं भी मिलता है।
Chances क्या है जब पूर्व का पुण्य का उदय होए सत्संग मिले तब आपको chances है आत्मभावना 100% करने का।
अकेले नहीं कर सकते हैं।
पाप का उदय है और सत्संग छूट जाएगा तो फिर आप टिकना मुश्किल है।
फिर आप घर बैठे तो आत्मभावना इतनी जबरदस्त नहीं होती है तो।
शुरुआत में ये काम कर लिए तो safe side हो जाती है।
और ऐसी भावना वाले को 100% की भावना वाले को सत्संग मिलता भी है।
नहीं मिलता।
28:56नहीं।
सत्संग में कई प्रसंग थे वैसे। किसी पूर्व के पुण्य के कारण या किसी के मित्रों के समझाने के कारण किसी जीव का सत्संग में आना हुआ है।
तो ऐसे जीव की व्यवस्था भी ऐसी जो planning होगा रोज आना हो रहा है लेकिन कभी वो gap पड़ जाएगा।
कभी ऐसा time खराब आता है तो सत्संग छूटता है तो उसकी आत्मभावना zero हो जाती है।
दो चार दिन में, महीने भर में सत्संग किया।
और जो आत्मभावना आई...
29:24वो जो आत्मभावना आई।
हो सकता है 4-5 दिन में ही खत्म हो जाए पूरा zero हो जाए।
ऐसा होता है।
एगो प्रगट जो इन्हें चित में खेद था ऐसे जीवों को देख कर के कृपालु देव को खेद होता है।
कि अरे ये जीव को इतना नसीब अच्छा है सत्संग में आया।
थोड़ा सुना नहीं सुना।
कुछ पल्ले नहीं पड़ा नहीं पड़ा और।
ऐसा उदय आया कि ऊपर छूट गया उसका साथ।
ऐसे जीवों को देख कर के उनको चित में खेद होता है।
और साथ में अब अपने चित की बात करते हैं।
29:52और साथ में अब अपने चित्त की बात करते हैं।
कि अपना क्या अंदर में क्या चल रहा है।
कि मारा चित्त की व्यवस्था जोता मने एम लागे छे के मने पण एम लागे छे के।
कोई पनि प्रकारे आ व्यवसाय घटतो नथी अवश्य घटतो नथी।
खुद को आत्मज्ञान दशा है।
कोई भी क्रिया मन वचन काया की हो रही है व्यापार धंधा आदि की तो उसमें interest बिल्कुल नहीं है।
पूर्व कर्म की सजा काटने योग्य।
ऐसा व्यवहार करते हैं।
लेकिन उतना भी उनके आत्म साधना में बाधा लगता है उनको।
30:20के आत्म साधना में बाधा लगता है उनको। प्रमाद लग रहा है उनको, दोष लग रहा है।
इच्छा से नहीं करते हैं। अभिप्राय का दोष नहीं है लेकिन आचरण का भी जो दोष है, वो भी उनको दिल को इतना खटकता है।
क्योंकि इससे मेरी रुकावट है, ऐसा लगता था उन्हें।
तो महाराज जितनी व्यवस्था जो था मने पण एम लागे से के,
दूसरों के दोष देखे मुनिराज के, मुमुक्षुओं के।
तो देखो, उन्होंने अपना भी दोष देखा।
अकेले उनका नहीं, अपना भी ऐसा दोष है।
30:48આપણા ભી એસા દોષ હૈ.
મારા ચિત્તની વ્યવસ્થા જોતા મને એમ લાગે છે કે મને કોઈ પણ પ્રકારે આ વ્યવસાય ઘટતો નથી, અવશ્ય ઘટતો નથી.
કિસી જીવ કો personal ધ્યાન દેના હૈ તો નહીં હો સકતા હૈ, કૈસે નહીં હો સકતા હૈ કે ખુદ વ્યવસાય મેં પડે હૈ.
તો કરુણા તો આઈ કે ઉસકો 2 શબ્દ બોલકે સમજાવે લેકિન ઉતના સમય નહીં મિલતા હૈ.
ખુદ બંધન મેં હૈ.
પર ખુદ કો ભી આત્મકલ્યાણ બઢાના હૈ, સાધના કરની હૈ તો કૈસે કરે વ્યવસાય મેં કરતે કરતે.
31:16जरूर अत्यंत जरूर आ जीवन में कोई प्रमाद छे।
ज्ञान दशा आने के बाद भी अभी भी निरर्थक प्रवृत्ति है, अभी उनको तो मालूम होगा ना कि व्यापार करने से कोई फायदा होने वाला नहीं है।
अज्ञान दशा में ऐसा लगता है कि दुकान नहीं जाऊं तो loss हो जाएगा, नहीं पैसा क्या मिलेगा, नहीं फिर मैं कैसे खाऊंगा, नहीं क्या पियूंगा।
ज्ञान दशा के बाद तो उनको वो problem नहीं रहता है क्योंकि mind बिल्कुल clear है।
कि जो भी कमाई आती है वो पाप पुण्य के वजह से आती है।
जाओ ना जाओ।
और कमाई जाती है, कम होती है।
31:44कमाई जाती है, कम होती है, नुकसान होता है, वो पाप के उड़े के कारण होता है, मेरा कुछ भी नहीं है।
जीव वहां बैठे-बैठे भी दुकान में पहुंच गया तो भी जीव रुपया भी नहीं गिनता है और माल भी नहीं देता है, touch भी नहीं करता है।
जीव तो सिर्फ जानना देखना करता है।
लेकिन अज्ञानता के कारण ऐसा लगता है कि मैंने पैसा लिया, गिना, मैंने हिसाब बराबर किया, मैंने उसको अच्छा माल दिया या नहीं दिया, ठग लिया, कुछ भी किया, उल्टा-सीधा किया।
उसको लगता है कि मेरी होशियारी से मैं पैसा कमाता हूं, असल में जीव को...
32:12और इससे मैं पैसा कमाता हूँ असल में जीव को touch भी नहीं करता है।
जो भी हो रहा है पूर्व के पाप पुण्य के अनुसार हो रहा है।
तो ज्ञान दशा के बाद तो स्थिति बिल्कुल समझ में आ गई फिर ये बेकार का जाना क्यों हो रहा है?
वो बेकार का जाना होता तो है होने में कारण क्या है पूर्व कर्म है।
लेकिन पूर्व कर्मों के सामने हम इतने कमजोर हो जाते हैं fight नहीं दे सकते हैं।
अंदर स्थिरता नहीं बढ़ाते हैं।
अगर लीनता होवे तो नहीं जावे अंदर लेकिन नहीं लीनता भी नहीं है अंदर की स्थिरता।
32:40स्थिरता भी नहीं है अंदर की स्थिरता।
और जाना हो जा रहा है पूर्व कर्म आवे ऐसा उसमें उदय में शामिल हो जाना होता है।
ये बहुत तकलीफ होती है जरूर अत्यंत जरूर।
आ जीवनो कोई प्रमाद छे मेरा बहुत प्रमाद है ऐसा।
नहीं तो प्रगट जाण्यु छे उ जे जेर।
ते पीवाने विषे जीवनी प्रवृत्ति केम होए।
ये तो बिल्कुल नुकसान का धंधा है।
आत्मा को तो बड़े रुपया करोड़ जमा हो गए आत्मा को तो ₹1 का फायदा नहीं है।
1% भी फायदा नहीं है नुकसान है।
क्योंकि करोड़...
33:08नुकसान है क्योंकि ₹1,00,00,000 कमाने के अंदर जितने भी भाव किए हैं आपके वो सब के सब भोगना पड़ेगा उसको।
एक तो वर्तमान में आत्मजागृति नहीं रही वो एक loss।
और फिर जो कर्म बांधे हैं वो भविष्य में भोगना पड़ेगा वो loss।
और समय waste गया वो एक loss।
पूरी साधना में रुकावट बहुत बड़ी है।
आरंभ परिग्रह की जो प्रवृत्ति है साधना में बहुत से बड़ी रुकावट।
जीव को आत्मकल्याण करना है लेकिन आत्म...
33:36જીવકો આત્મકલ્યાણ કરના લેકિન આત્મકલ્યાણ કરને કે લિયે જો thinking હોની જોઈએ planning હોના જોઈએ.
વો planning કબ કરેગા free હોગા તો કરેગા નુ.
free નહીં હૈ સુબે સે લેકર કે રાત ભર તક કુછ ના કુછ કરના ધરના રહેતા હૈ.
ઇતની heavy પ્રવૃત્તિ હૈ.
તો જરૂર આ જીવનો બહુ પ્રમાદ છે નહી તો પ્રગટ જાણ્યું છે એવું જે ઝેર.
કે પીવાને વિશે જીવની પ્રવૃત્તિ કેમ થાય.
કેમ હોય.
અથવા એમ નહીં તો ઉદાસીન પ્રવૃત્તિ હોય.
34:04એમ નહીં તો ઉદાસીન પ્રવૃત્તિ હોય.
ચલો ઠીક છે જાના પડતા હૈ.
કર્મુ રાજા લેકે જાતે હૈન દુકાન મેં.
આત્મા કી બિલકુલ ઈચ્છા નહીં હૈ.
તો ફિર વહા involve કૈસે હોતા હૈ?
બિલકુલ involve નહીં હોના બસ ચૂપચાપ લેકે ગયે ના બેઠ જાના વહા.
તો ઉદાસીન પ્રવૃત્તિ ભી નહીં હૈ.
તો પણ તે પ્રવૃત્તિ હૈ હવે તો કોઈ પ્રકારે પણ પરિસમાપ્ત પણ ભજે.
એમ થવા યોગ્ય છે.
એ પ્રવૃત્તિ અબ ખતમ હોવે તો અચ્છા.
34:32ये प्रवृत्ति अब खत्म होवे तो अच्छा, नहीं होवे तो समझना कि मेरा ही कोई interest है चालू रखने में।
मेरे को जितनी चाहिए उतनी उदासीनता नहीं है, मेरे को अभी आत्मकल्याण करने की सच्ची भावना नहीं है।
मोक्ष मार्ग में आगे बढ़ने की भावना में खोट है।
ऐसा ज्ञान दशा के बाद भी वो अपने आप को कोसते हैं इस प्रकार से।
अगर ये प्रवृत्ति खत्म नहीं होंगी जल्दी से, तो समझना कि जरूर जीव में कोई भी प्रकार दोष है।
कोई भी प्रकार का मतलब क्या हो गया?
ये जो कोई भी प्रकार...
35:00એ તો કોઈ પણ પ્રકારે.