Shrimad Rajchandra Vachanamrut
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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.
0:00Serial number 653, 653, શ્રીમદ્ રાજચંદ્ર પતરાંક 300, 528, ભાગ 2, તારીખ 9-11-2000, શ્રી દેવચંદભાઈ.
नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते ।
चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥
0:28सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥
ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः
श्लोक कर दो या बंद कर दो जी।
0:56કર દો અહિયાં બંધ કર દો શ્રીમદ રાજચંદ્ર વચનામૃત પ્રકરણ 528.
જે સ્વપ્ને જેને સંસાર સુખની ઈચ્છા રહી નથી.
અને સંપૂર્ણ નિસારભૂત જેને સંસારનું સ્વરૂપ ભાસ્યું છે.
એવા જ્ઞાની પુરુષ પણ.
વારંવાર આત્મા.
1:24વારંવાર આત્મા અવસ્થા સંભાળી સંભાળીને ઉદય હોય તે પ્રારબ્ધને વેદે છે પણ આત્મા અવસ્થાને વિશે પ્રમાદ થવા દેતા નથી. પ્રમાદના અવકાશ યોગે જ્ઞાનીને પણ અંશે વ્યામોહ થવાનો સંભવ જે સંસારથી કહ્યો છે તે સંસારમાં સાધારણ જીવે રહીને.
1:52સાધારણ જીવે રહીને એનો વ્યવસાય લૌકિક ભાવે કરીને આત્મહિત ઈચ્છું એ નહીં બનવા જેવું જ કાર્ય છે. દો ગાડી પે નહીં ચલ સકતે હૈ. કેમ કે લૌકિક ભાવ આડે આત્માને નિવૃત્તિ નથી આવતી. ત્યાં હિત વિચારણા બીજી રીતે થવી સંભવતી નથી. એકની નિવૃત્તિ તો બીજાનું પરિણામ થવું સંભવ છે. આત્મજ્ઞાન નહીં હો રહા હૈ તો ભી આમ સંપૂર્ણ રૂપ સે.
2:20तभी हम संपूर्ण रूप से भावों में संसार से निवृत्त नहीं हुए हैं।
भले ये कोने में बैठ जाए लेकिन निवृत्ति नहीं है हमारी।
क्योंकि वहां निवृत्ति हुई तो यहां परिणाम होंगे ही होंगे।
परिणाय पर से लक्ष्य गया तो तो ज्ञान तो होने वाला है।
कहां जाएगा उपयोग?
पर पदार्थ से पंचास से छूट गया रागादि भावों से छूट गया।
वहां के कोई विचार दुनियादारी के नहीं आ रहे हैं रागादि भावों का भी चिंता...
2:48तरीके नहीं आ रहे हैं। रागादि भावों को भी चिंता गई जो होना है हो।
मैं तो भगवान आत्मा जानने वाला हूँ।
दोनों से लक्ष्य गया और अभी भी दर्शन नहीं हो रहा है। इसका मतलब
अवस्था पे टिका हुआ है कहीं भी।
अवस्था में कोई change करना चाहता है जीव।
तो एक की प्रवृत्ति और दूसरे की निवृत्ति और एक की निवृत्ति और दूसरे की प्रवृत्ति।
ज्ञान निरंतर जानने का काम करता है।
क्योंकि आत्मा का स्वभाव है।
3:16ये आत्मा का स्वभाव है।
अगर ये ज्ञान में हमारा स्वरूप दर्शन नहीं होता है, तो जरूर हम दूसरे किसी को जानते हैं।
क्योंकि एक उपयोग दो side में नहीं जान सकता है, द्रव्य को भी जाने और अवस्था को भी जाने, ऐसा नहीं हो सकता।
अगर पर को देखना बंद हुआ है, रागादिभावा को देखना बंद हुआ है, और बार-बार अंतर का पुरुषार्थ है, फिर भी आत्मा नहीं दिख रहा है, तो जरूर हमारा उपयोग अवस्था...
3:44हमारा उपयोग अवस्था पे टिका हुआ है।
कि अवस्था भी बाहर है ना।
अपनी होने पर भी बाहर है।
अपनी अवस्था है तो भी वो अपनी नहीं है क्योंकि वो क्षणभंगुर है और मैं शाश्वत।
एक की निवृत्ति दूसरे की प्रवृत्ति है, एक की प्रवृत्ति दूसरों की निवृत्ति है, दोनों एक साथ में नहीं होते हैं।
उपयोग दो जगह नहीं रहता है।
ज्ञान दोनों का हो सकता है एक साथ।
जैसा कि हम पीठ को नहीं देखते हैं लेकिन पीठ का ज्ञान तो है।
4:12लेकिन पीठ का ज्ञान तो है।
ऐसे द्रव्य को देखते वक्त अवस्था है, इसका ज्ञान हो सकता है लेकिन उपयोग वहां नहीं हो सकता है।
उपयोग तो या तो द्रव्य पे रहेगा या फिर अवस्था पे रहेगा।
इसीलिए सुघानी जी ने वो पर्याय वाली चाल जो है, पूरा पार करते-करते जब किनारे पे आया तो कहां रुका?
आकाश से गिरा तो खजूर पे लटका।
ऐसा परपंचायत छोड़ी रागादि भाव...
4:40पर पंचायत छोड़ी रागादि भावों का अवलोकन पूरा हो गया निर्विकलता आई।
अब कोई रोकने वाला बाहर में नहीं रहा।
तो वह आकाश से गिरा।
लटका किधर?
खजूर के झाड़।
मतलब क्या होगा कि वह अपनी अवस्था में फंस गया।
अवस्था में भी नहीं फंसना है अगर अवस्था में फंसा तो भी problem।
तो मैं अपरिणामी शाश्वत ध्रुव पदार्थ हूं।
जानन ये जो...
5:08जानन ये जो अवस्था है।
वो मेरी नहीं है।
देखो अभी यहाँ।
दूसरों से भेद नहीं करना है।
अब अपनी ही अवस्था से मैं अलग जुदा हूँ।
ऐसा भेद करना है।
ये पलटने वाली अवस्था है जानना एक को जानना फिर दूसरों को जानना फिर हर वक्त पलटता है अगर एक को भी देखे तो भी पलटना होता है।
Timing के अनुसार परिणामन होता है।
जिस second ये tape record देखा दूसरी second में।
5:36इस second ये tablet को देखा, दूसरी second में भी वही tablet को देखा, लेकिन अवस्था अंतर हो गया।
विषय भले वही का हो, लेकिन अवस्था तो बदलती है।
हर समय में नई-नई किरण निकलती है ज्ञान की।
तो वो आई चले गई, आई चले गई।
वो ज्ञान की किरण, वो सूर्य नहीं है।
वो ज्ञान सूर्य नहीं है।
तो वहां लटका, इधर अवस्था में फंस गया, तो भी द्रव्य पे नजर नहीं जाती है।
यहां से वापस जाता है जीव।
6:04मैं शाश्वत अपरिणामी ध्रुव गायक भगवान हूँ।
उसको ढूँढना है, उसका दर्शन करना है, उसका ध्यान रखना है, वो गलत है।
गलत इसलिए है कि फिर उसमें अवस्था पे ध्यान गया है।
हमको ऐसी अवस्था चाहिए जो हमारे भगवान का दर्शन करे, गलत हो जाएगा।
ये भी गलत।
क्योंकि वहाँ ध्यान द्रव्य पे नहीं है, ध्यान अवस्था के ऊपर है।
6:32ध्यान अवस्था के ऊपर है।
ऐसी अवस्था चाहिए जो आत्मा का अनुभव करे।
अब अनुभव नहीं हो गया।
ये बात लिया।
एक की निवृत्ति तो बीजानु परिणाम तौ समवेष।
पर्याय मात्र से भिन्न हुआ कि फिर उपयोग जाएगा कहाँ?
पर में तो रुका नहीं।
राग आदि भाव में तो रुका नहीं।
और अवस्था से भी दृष्टि हटा ली।
तो जाएगा कहाँ? उपयोग तो होने ही वाला है।
वो उपयोग total अंतर्मुख हो करके अपने भगवान को देखता है।
इसके पहले नहीं देखता है।
7:00है।
इसके पहले नहीं देखता है।
इसके पहले बाहर में नहीं फंसा है।
राग आदि भावों में नहीं फंसा है लेकिन अपनी अवस्था में फंसा है।
ये बात है।
वहां से भी निवृत्ति होगी तो ध्रुव पे दृष्टि जाएगी जाएगी जाएगी।
अहित हेतु एवं संसार संबंधी प्रसंग।
संसार के बाकी के जितने भी लफड़े हैं।
वो जीव का कल्याण है उसके अंदर।
लौकिक भाव लोक चेष्टा।
ये सौनी संभार जेम बने तेम जति करीने।
7:28એમ બને તેમ જતી કરીને તેને સંક્ષેપીને આત્મહિતને અવકાશ આપો ઘટે છે.
એ કૃપાવાળાની આજ્ઞા છે મુમુક્ષુ.
આત્મહિત કે લિયે સત્સંગ જેસા બળવાન દૂસરા કોઈ નિમિત્ત દિખને મેં નહીં આરા હૈ.
વો બાત 609 મેં ભી ઉનહોને કહી હૈ.
અસલ મેં હમારા target હૈ.
વો તો ભગવાન આત્મા કા દર્શન કરના હૈ.
લેકિન ઉસકે લિયે ક્યાં ચાહીએ total નિવૃત્તિ ચાહીએ.
7:56Total નિવૃત્તિ ચાહીએ.
સંઘના યોગે આ જીવ સહજ સ્થિતિને ભૂલ્યો છે.
સંઘની નિવૃત્તિથી સહજ સ્વરૂપનું અપરોક્ષ ભાન પ્રગટે છે.
યા પર પદાર્થ કા સંઘ કિયા યા અપને રાગાધિભાવો કા સંઘ કિયા મતલબ જ્ઞાન કિયા રુકા વાં જ્ઞાન.
યા ફિર અપની અવસ્થા કા જ્ઞાન કિયા વાં પર ભી રૂક ગયા વો.
ઇસીલીયે હમારા આત્મ સ્વભાવ કા દર્શન નહીં હોતા હૈ.
સંઘ કી નિવૃત્તિ હોગી મતલબ વાં દેખના બંધ કરેગા તો સહજ સ્વરૂપ કા ભગવાન આત્મા.
8:24સ્વરૂપ કા ભગવાન આત્મા કા અપરોક્ષ ભાન પ્રગટ હોતા હૈ.
ઇસકે લિયે સર્વ તીર્થંકર આદિ જ્ઞાનીઓએ અસંગપણું સર્વોત્કૃષ્ટ કહ્યું છે.
કે જેના અંગે સર્વ આત્મસાધન રહ્યા છે.
સર્વ જીનાગમમાં કહેલા વચનો એકમાત્ર અસંગપણામાં જ સમાય છે.
અસંગ હોના હૈ, કિસી કા ભી સંગ નહીં.
પરમાત્મા અપના બિરાજમાન અંદર મેં હૈ, ઉસકા હી સંગ બાકી કિસી કા ભી સંગ, ઉસકે...
8:52બાકી કિસી કા ભી સંગ ઉસકી અવસ્થા કા ભી સંગ નહીં.
લેકિન યહ કહેતે હૈ કે સર્વભાવથી અસંગપણું થવું તે સર્વથી દુષ્કર્મ દુષ્કર સાધન છે.
અને તે નિરાશ્રયપણે સિદ્ધ થવું અત્યંત દુષ્કર છે, અપને આપ તો એ હોને વાલા હી નહીં.
એમ વિચારી શ્રી તીર્થંકરે સત્સંગને તેનો આધાર કહ્યો છે.
લખો.
હમ દ્રવ્ય પે દ્રષ્ટિ લગાને મેં અસમર્થ હૈ, ઇસીલીયે હમકો આત્મજ્ઞાન નહીં હોતા હૈ.
પણ કુછ ના કુછ ગલતી...
9:20और कुछ ना कुछ गलती कर बैठते हैं। वो गलती सुधरने का chances कहाँ है?
कौन हमको बताएगा? सत्संग। इसीलिए यहाँ कहते हैं।
कीर्तंकर भगवान ने भी सत्संग को प्रमुखता दी है।
और यहाँ पर भी ये बात है कि आत्महित माटे सत्संग जेउं बरवान बीजू निमित्त कोई जनातुं नथे।
ऐसा सत्संग में आ गए तो हम safe हो गए ऐसा नहीं समझना।
इसके साथ में और भी बात जुड़ी हुई है वो बताना चाहते हैं।
कि सत्संग में आ गए तो अभी हमारा...
9:48कि सत्संग में आ गए तब भी हमारा कल्याण हो जाएगा।
ज़रूर होगा सत्संग से तो ज़रूर होगा।
लेकिन अगवा करके भी गलती करा तो नहीं होगा।
कौन सी बात?
हाँ वो तो बात है ही।
वो तो वो तो उपकार रहे उनका।
बारहवें गुणस्थान के अंत समय तक सद्गुरु का शरण है।
कोई किसी भी समय में नीचे की भूमिका में अगर...
10:16ભૂમિકા મેં અગર સદગુરુ કા સાથ છોડા યા એસા પ્રમાદ કિયા તો ગયા કામ સે.
તો આગે નહીં બઢ પાતા.
આત્મહિત માટે સત્સંગ જેવું બઢવાન બીજું નિમિત્ત કોઈ જણાતું નથી છતાં તે સત્સંગ પણ જે જીવ લૌકિક ભાવથી અવકાશ લેતો નથી એને પ્રાય નિષ્ફળ જાય છે.
સત્સંગ ભી fail હોતા હૈ અગર સ્વયં કઈ ગલતી કરે તો.
લૌકિક ભાવમાં રહે તો લોગો કો અચ્છા લગે એસા કામ.
10:44गाँव में रहे तो लोगों को अच्छा लगे ऐसा काम करना है।
लोगों के थाट-माट, लोग क्या कहेंगे, लोगों को नज़र में रखते हुए अपने को action reaction सब करना है।
उसका कल्याण नहीं होने वाला है।
सत्संग में जाना है लेकिन वो रोकता है इसलिए नहीं जाना है।
बस नहीं होगा कल्याण, वो लौकिक भाव है, अगर आएगा तो भी कल्याण नहीं होगा।
फिर दूसरी-दूसरी बातें होती हैं, कोई जानने के इरादे से आवे कि जानूँ तो सही क्या है।
तो जानकारी वाला लोभ नहीं चाहिए।
11:12जानकारी वाला लोभ नहीं चाहिए।
Time pass वाला लोभ नहीं चाहिए। सुबह तो free रहते हैं, दुकान तो 11 बजे जाने का है।
बीच में time मिलता है तो उधर-उधर गप्पे मारने के बदले क्या करें थोड़ा ये सुन लें।
तो time अच्छा pass हो जाएगा और पाप तो वहां है नहीं, पुण्य ही है।
तो क्या फर्क पड़ता है, वो भी सब गलत है, ये सब लौकिक भाव में जाता है।
कुछ अच्छा करेंगे तो अच्छा प्राप्ति होगी, अच्छे अनुकूल संयोग मिलेंगे। हमने पाप किया इसलिए दुखी होते हैं।
अब सत्संग जैसा सुनने का...
11:40अब सत्संग जैसा सुनने का पुण्य करेंगे तो सुखी हो जाएंगे।
अनुकूलता मिलेगी।
वो भी लौकिक भाव है।
सिर्फ आत्म शांति चाहिए, सिर्फ मुझे मेरा आत्मा का दर्शन करना है।
मुझे संपूर्ण मुक्ति चाहिए।
ऐसा सुख चाहिए कि जिसके पीछे अंश मात्र कभी भी दुख ना आवे।
मेरा ये स्वार्थ है इसीलिए मैं सत्संग में जाता हूँ।
तो समझो कोई लौकिक भाव नहीं है नहीं तो लौकिक भाव आ गया।
जे जीव लौकिक भाव...
12:08जे जीव लौकिक भाव से अवकाश लेतो नहीं, एने प्राय सत्संग निष्फळ जाय छे।
किसी प्रकार का आत्मशांति के अलावा दूसरा कोई हेतु नहीं।
किसी बात का कोई हेतु नहीं।
तो ही फलवान होता है, नहीं तो नहीं होता।
जानकारी नहीं, time pass नहीं।
बहुत गुस्सा आता है इसलिए अभी सत्संग में जाएंगे तो थोड़ा कम हो जाएगा, गुस्सा कम करने के लिए सत्संग में नहीं आना।
हमारे दुर्गुण सब बहुत हैं, हम बहुत पापी हैं, दूसरों पर बहुत तकलीफ होती है हमारे।
12:36पापी हैं दूसरों को बहुत तकलीफ होती है हमारे सत्संग में जाएंगे तो हमारे परिणाम सुधर जाएंगे।
परिणाम सुधारने के लिए नहीं आना क्योंकि वो परिणाम आज सुधरेंगे कल वापस बिगड़ जाएंगे।
शाश्वत शांति के लिए आना।
Permanent शांति मिले ऐसा आना।
जन्म मरण के चक्कर ही खत्म हो जाए हमेशा के लिए इसके लिए आना है।
अगर दूसरा कोई भाव रहेगा सत्संग फलवान नहीं होता है।
अब आगे कहते हैं।
अने सहज सत्संग फलवान थयो होय तो पण।
13:04સત્સંગ ફળવાન થયો હોય તો પણ.
થોડી આત્મજાગૃતિ કર્યા સહી ભાવના સે આયા થોડાક પલ્લે પડા.
થોડી practice ચાલી.
તો result આને લગા.
practice મેં result આને લગા.
સહેજ સત્સંગ ફળવાન થયો હોય તો પણ.
વિશેષ વિશેષ લોકાવેશ રહેતો હોય તો તે ફળ નિર્મૂળ થઈ જતા વાર લાગતી નથી.
અબ compare કરતે હું.
first મેં ક્યા ક્યા કે એક બિલકુલ અંશ માત્ર ભી લૌકિક ભાવ નહીં હોના.
13:32लौकिक भाव नहीं होना।
Total आत्म भाव से सत्संग करना।
नहीं तो सत्संग fail हो जाएगा, करोगे तो भी fail हो जाएगा।
अब दूसरी बात करते हैं।
कि सत्संग में भी पूरा ध्यान है, आत्म कल्याण की भावना से ही आते हैं।
और सत्संग सुनते हैं, सत्संग में बैठते हैं, विचार का आदान-प्रदान होता है।
जो बात हमारे काम की लगी उसका हम अमलीकरण करते हैं, उसका फायदा भी आत्मा को होता है।
कई प्रकार के गुण प्रकट हो जाते हैं अपने आप, कई प्रकार के दोष अपने आप कम हो जाते हैं।
14:00करके दोष अपने आप कम हो जाते हैं।
ये हो रहा है यहाँ पर।
लेकिन इससे ज़्यादा ये 40% में हो रहा है और संसार का 60% में हो रहा है।
Balance out है।
इससे भी ज़्यादा पड़पंचायती में, कुटुंब परिवार में, समाज में उधर-उधर दिल फंसा हुआ है अभी भी।
Total इधर नहीं है, 100% इधर नहीं है।
यही बात कहते हैं कि सहस सत्संग फलवान थयो होय तो पण।
14:28होए तो पण सत्संग 49% और वो 51% तो पण विशेष विशेष लोकावेश रहता होए तो तो ते फल निर्मूल थी जाता वार लागती ना थे खिंचाव कहाँ है जो बलवान होगा वो खींच लेगा अपने को सत्संग में जितनी रुचि है उससे 1% भी ज्यादा रुचि संसार की रही है अभी तो आप ऐसा नहीं समझना के मैं पहले 100% संसार के रंग में रंगा हुआ था इतना तो।
14:56इतना तो फायदा हुआ ना 49% तो।
49% रुचि संसार की कम हो गई।
इतना तो फायदा हुआ ना।
मुझे खुद को अनुभव हो रहा है कि मेरे को फायदा हो रहा है।
तब क्या हो गया 49 और 51 की हिसाब किताब है।
अब कौन खींच लेगा?
ये जो फल मिला है शांति मिली है थोड़े गुण प्रकट हुए हैं लेकिन अभी भी सत्संग से ज्यादा पल्ला किसका भारी है?
संसार के पांच इंद्रियों के विषयों में।
15:24संसार के 5 इंद्रियों के विषयों का भोग विलास का देखना सुनना चखना व्यापार धंधा इसमें।
समाज का ध्यान कुटुंब का ध्यान शरीर का ध्यान कई प्रकार के अंदर में अभी भी भूसे भरे पड़े हैं।
ये balance में कौन जीत रहा है?
संसार का प्रसंग जीत रहे हैं।
क्या होता है अब?
उतना भी नहीं चलेगा।
क्योंकि तोते फल सत्संग से मिला हुआ फल फायदा।
निर्मूल हो जाता है वार लागते ना ते।
15:52નિર્મૂળ થઈ જતા વાર લાગતી નથી.
ફાયદા હુઆ હૈ વો સબ ખતમ હો જાયેગા.
દેર નહીં લગેગી.
ક્યુંકી બલ ઉસકા જ્યાદા હૈ.
અને અબ આગે કહેતે હૈ.
સ્ત્રી પુત્ર આરંભ પરિગ્રહના પ્રસંગમાંથી.
જો નિજ બુદ્ધિ છોડવાનો પ્રયાસ કરવામાં ન આવે તો.
સત્સંગ ફળવાન થવાનો સંભવ સી રીતે બને?
એ બાતલી આવે.
સંસાર કે સબસે જ્યાદા મોહિત.
16:20सबसे ज़्यादा मोहित स्त्री पुत्र आरंभ परिग्रह ये मोह हमारे को खींचने वाले हैं, हमारे उपयोग को खींच के लेके जाते हैं। हमारा उपयोग हमको आत्मा में रखना है, लेकिन रख नहीं सकते क्यों? स्त्री पुत्र आरंभ परिग्रह की संभाल में, उसकी रक्षा में, उसको अच्छा लगे इस प्रकार से करना है, इस प्रकार से प्रवृत्ति में फँसे हुए हैं। तो वहाँ तो ध्यान नहीं रखूँगा तो बिगड़ जाएगा सब।
16:48ध्यान नहीं रखूँगा तो बिगड़ जाएगा सब।
स्त्री का ध्यान नहीं रखूँगा तो स्त्री नाराज़ हो जाएगी, पुत्र का ध्यान नहीं रखूँगा तो पुत्र नाराज़ हो जाएगा।
व्यापार धंधा नहीं करूँगा तो खाएँगे क्या, पिएँगे क्या?
संसारी प्राणी है तो ये तो करना ही पड़ेगा ना।
ये तो हमारी duty है।
हाँ, आत्मकल्याण भी करना है लेकिन ये भी तो करना है ना, ज़रूरी तो है ना।
चलो ज़रूरी नहीं सही लेकिन पूर्व कर्मा का उदय हमको ऐसा है तो हम, हम अब इसमें क्या कर सकते हैं?
भूतकाल में बांध लिए तो भोगना तो पड़ेगा ना।
17:16भूतकाल में बांध लिए तो भोगना तो पड़ेगा ना।
अब रोए चाहे हंसे भोगना तो पड़ेगा ही पड़ेगा।
क्योंकि भूतकाल में कर्म ऐसे बांधे हैं।
अभी हमको आत्म कल्याण करने के लिए निवृत्ति चाहिए लेकिन नहीं मिलती है।
तो क्या करें अब?
इसीलिए हम adjust कर लेते हैं।
जितना हो सके उतना सत्संग आदि करते हैं आत्मा में ध्यान रखते हैं।
बाकी का फंस तो गए हैं तो वो भी कार्य करना तो पड़ेगा ही तो करते हैं।
उसको भी हम कैसे छोड़ सकते हैं?
17:44सकते हैं।
ये क्या होता है?
छोड़ने को कोई नहीं बोलता है।
Practically.
लेकिन भावों में छोड़ना पड़ेगा।
ये समझना है।
नहीं तो सत्संग फलवान नहीं होगा।
सत्संग तो ही फलवान होगा कि अंश मात्र भी मुझे ये duty है, मेरी ये फर्ज है स्त्री के प्रति, कुटुंब के प्रति, आरंभ परिक के प्रति।
अंश मात्र भी वहां रुचि रही।
तो तो आत्मकल्याण होने वाला नहीं है।
18:12क्या अब क्या करना?
Practically छोड़ नहीं सकते पूर्व कर्मों के उदय के कारण।
और नहीं छोड़ेंगे तब तक आत्म कल्याण नहीं होता है तो इसमें समझना है कि क्या है।
कि practically आप संसार में छोड़ कर के नग्न दिगंबर हो जाओ ऐसा कोई नहीं कहता है।
बात इतनी है कि आपको भावों में तो 60% छोड़ना है।
छोड़ना अभिप्राय में छोड़ना है।
अगर अभिप्राय में 1% भी गलती रही तो आत्म ज्ञान...
18:40person भी गलती रही तो आत्मज्ञान नहीं होने वाला है।
कैसे?
कि देखो बिल्ली है।
वो अपने बच्चों को साथ घर घुमाती है ना।
जब बच्चे चलने नहीं सीखते हैं तो क्या वो उधर से उधर साथ घर घुमाती है।
तो उसके पास तो कैसे वो दूसरी जगह लेके जाएगी बच्चों को? बच्चों को तो चलना नहीं आता है।
तो वो मुँह में पकड़ती है।
तो मुँह में पकड़ के एक के बाद एक सब बच्चों को रख के आती है वहाँ।
तो बच्चों को मुँह में पकड़ती है तो कैसे पकड़ती है?
19:08तो बच्चों को मुँह में पकड़ती हो कैसे पकड़ती हो?
और चूहों को पकड़ती हो तो कैसे पकड़ती हो?
फर्क है कि नहीं है कुछ?
पकड़ना तो हो रहा है क्रिया तो वही है।
चूहों को भी मुँह से ही पकड़ती है।
अपने बच्चों को भी मुँह से ही पकड़ती है।
लेकिन पकड़ पकड़ में फर्क है कि नहीं है?
बहुत फर्क है।
इसी प्रकार से हम business करते हैं, स्त्री की संभाल रखते हैं, कुटुंब परिवार की संभाल रखते हैं, बूढ़े माँ बाप की संभाल रखते हैं।
19:36होते हैं।
समाज में भी कहीं party के प्रसंग हो, कहीं लग्न हो, कहीं प्रार्थना हो, श्रद्धा सभा हो, कुछ शोक मिलन हो, वहां भी जाते हैं।
कैसे जाते हैं?
जानना ही पड़ेगा, ऐसा करके जाते हैं।
कि अंदर में जाते हैं फिर भी हमको खटकता है कि हमारा समय waste हो रहा है, हमारा नुकसान हो रहा है।
हमारे आत्मा को कोई फायदा नहीं हो रहा है।
ऐसी भावना भी साथ में रहती है।
क्या हो रहा है अंदर में?
अंदर के भावों की बहुत कीमत...
20:04अंदर के भावों की बहुत कीमत है।
यहाँ ये कहते हैं कि आपको सत्संग फलवान हो सकता है।
लेकिन जब तक स्त्री पुत्र आरंभ परिग्रह के प्रसंग में अपनापन नहीं छोड़ा निज बुद्धि नहीं छोड़ी अपनापन माने क्या?
ये तो compulsory करना ही पड़ता है।
अगर ध्यान नहीं देंगे तो सब उल्टा पुल्टा हो जाएगा।
ये compulsory है।
ये भी कर रहे हैं वो भी कर रहे हैं।
वो होता है अब।
20:32वो होता है अब संसार के सब प्रसंग होते हैं करते नहीं हैं।
होते हैं वो भी खटकते हैं।
क्या होते हैं पूर्व कर्मों के उदय से वो भी आत्मारथी को बहुत तकलीफ होती है कि मेरा समय waste हो रहा है।
मेरा जो काम करना है सद्गुरु की आज्ञा उठाना है।
अपने आत्मा का कल्याण करना है उसमें मैं अग्रसर नहीं हूँ।
उसमें 100% मेरा ध्यान नहीं है।
तो ये संसार के प्रसंग में फँसना होता है तो मैं रुक रहा हूँ इतनी मेरी साधना।
21:00होता है तो मैं रुक रहा हूँ इतनी मेरी साधना में भंग पड़ रहा है।
ये मुझे ही भुगतना है।
मैं अभी संपूर्ण रूप से तैयार नहीं हूँ।
तो होता है तो भी खटकता है।
तो करने की तो बात ही कहाँ रही?
करना पड़ता है करना ही पड़ेगा।
नहीं करेगा तो कौन करेगा वो बात तो कहाँ रही?
आग्रह छोड़ देना है।
आग्रह छोड़ेंगे ध्यान रखना है ऐसा आग्रह छोड़ेंगे।
और पूरा ध्यान कहाँ लगाना है saint person?
आत्मकल्याण कैसे हो उसमें?
21:28आत्मकल्याण कैसे हो उसमें?
भले सत्संग 1 घंटे का मिलता हो, लेकिन 24 कलाक हमारे mind में वो घूमना चाहिए।
मुझे तो आत्मा का करना है, फसना नहीं है, कई बार फंसा हूँ।
संसार के लफड़े में मैं अनंत बार फंसा हूँ।
इसके पहले मैंने अनंत माँ-बाप को छोड़ा, अनंत शरीरों को छोड़ा।
जहाँ-जहाँ भी गया मैंने सबकी संभाल रखी।
लेकिन आज मेरे को ये दिन देखने पड़ रहे हैं।
अभी मेरी भटकना बंद नहीं हुआ है।
इतनी जिम्मेदारी संभाला, हर भाव में मैंने जिम्मेदारी संभाली।
21:56हर भव में मैंने जिम्मेदारी संभाली।
हर भव में दुकान लगाई, बहुत मेहनत की, आगे बढ़ा।
फिर मेरा end हुआ वहां पर।
सब वहां का वहां छोड़कर के दूसरे भव में, फिर वहां भी सब पंचायत सब की।
बहुत मेहनत की दूसरों के लिए, परिवार के लिए, समाज के लिए, मेहनत करते-करते वापस दो end हो गया, वापस पाप का पोटला बांध करके तीसरी गति में।
ऐसा चक्कर-चक्कर करके आज तक मेरा कल्याण नहीं हुआ।
एक अंश मात्र भी परिग्रह का रजकण भी मेरा नहीं हुआ।
22:24परिग्रह का रजकण भी मेरा नहीं हुआ आज तक।
सबको छोड़ के भागना पड़ रहा है, सबको छोड़ के बार-बार ऐसी गलती किया है मैंने।
अनंत भाव दूसरों के लिए ही बिताए।
जगत को अच्छा दिखाने के लिए कार्य किया।
अब मुझे ऐसा कार्य नहीं करना है।
तो आग्रह नहीं रखना है।
फिर आग्रह छूट जाने के बाद भी कार्य होगा।
कि अंदर में भाव नहीं है दुकान जाने का, सिर्फ आत्मकल्याण करने का ही भाव है।
तो क्या वो दुकान जाना बंद कर देगा?
22:52तो क्या वो दुकान जाना बंद कर देगा? बंद करने वाले आप कौन? चालू करने वाले आप कौन? वो आपके हाथ में नहीं है। भावों से रहित हो गए, बिल्कुल भाव नहीं है दुकान जाने का। फिर भी आपको दुकान तो जाना पड़ेगा। कौन ले जाएगा आप? पूर्व कर्मों का उदय ले जाता है। वहाँ व्यापार धंधा भी करोगे, ग्राहक पैसा नहीं देगा तो बोची भी पकड़ लोगे। देखो अभी तो आपको तो आत्मकल्याण करना है ना, फिर बोची क्यों पकड़ी?
23:20तो बोची पकड़ता है तब भी आत्मार्थी का भाव क्या है? बाहर में तो उल्टा लगता है कि आत्मार्थी होकर के ऐसा करता है। रोज सत्संग में जाता है फिर ऐसा करता है। अरे भैया बाहर से तुझे ऐसा दिखता है, पकड़ पकड़ में फर्क है। क्या है? चूहे को पकड़ना और बिल्ली को बच्चे को पकड़ना फर्क है। तुझे जो बाहर से दिखता है वो सही नहीं है, अंदर के भावों में क्या चल रहा है?
23:48भाव में क्या चल रहा है? फिर ये कौन करता है? बिना भाव के करता है? बिना भाव के कार्य होता है? खाने का, पीने का, देखने का, सुनने का, सब TV देखने का, बगीचे में घूमने का, अच्छे गीत सुनने का बिना भाव के होता है? हाँ, आत्मकल्याण का ही अभिप्राय होने के बावजूद भी पूर्व कर्म का उड़े अनुसार इसकी सारी गतिविधि होती है। हर एक जीव की, चाहे ज्ञानी हो चाहे अज्ञानी हो।
24:16चाहे ज्ञानी हो चाहे अज्ञानी हो।
उसकी बाह्य प्रवृत्ति किसके अनुसार होती है?
पूर्व कर्मों के उदय अनुसार।
अब हमको प्रयास क्या करना है? फिर साधना क्या करना है? हम इतने लाचार हैं कि हम कुछ गीत नहीं सुनने का भाव नहीं है, आत्मकल्याण करने का भाव है तो भी गीत सुनना पड़ता है।
आत्मकल्याण करने का ही अभिप्राय है तो भी TV देखना पड़ता है।
इतने हम लाचार।
इतने हमारे पूर्व कर्म हमारे ऊपर हावी हैं, तो पूर्व कर्म हावी हैं किसके ऊपर?
24:44पूर्व कर्म हावी है किसके ऊपर?
आपकी साधना के ऊपर नहीं।
ये बहुत खुशी की बात है।
चाहे जितने पूर्व कर्मों का उड़े हो, भयंकर प्रतिकूल परिस्थिति हो, आप साधना कर सकते हो।
साधना में कोई बाधा नहीं है। ये तो भूतकाल की सजा काटना है, इतना ही है।
तो यहाँ ये बात किया है कि सत्संग फलवान हो सकता है।
सत्संग करने से आत्मकल्याण हो सकता है।
25:12कल्याण हो सकता है।
जन्म मरण का अंत हो सकता है अगर समझ में आ गई बात तो।
लेकिन एक शर्त बहुत है।
क्या शर्त है?
कि स्त्री पुत्र आरंभ परिग्रह के प्रसंग में से अपनापन छोड़ना पड़ेगा।
अपनापन छोड़ना माने क्या?
मेरी इच्छा के अनुसार ही चलना।
और सबका ठेका मैंने लिया है सबको सुखी करने का, सबका संभाल लेने का, वो ठेका अपना निकाल लेना है।
फिर कैसे रहना घर के अंदर?
25:40अब वो पूछे ऐसा करना है तो हाँ करो, ऐसा करना है तो हाँ करो।
इसमें मज़ा क्या आएगी?
अपनापन छोड़ दिया, अपनापन छोड़ा माने क्या? हमारा अधिकार छोड़ दिया।
बोला वो लाके दो, अच्छा भई लाके देता हूँ।
ये ठीक नहीं है, दोबारा लाओ, ठीक है भई दोबारा।
ये क्या हो गया?
कहीं भी विरोध नहीं।
जैसे नौकर से... सेठ की गलती हो तो भी नौकर को बोलने का अधिकार है क्या?
क्यों?
26:08क्यों?
कि दुकान किसकी है?
सेठ की।
सेठ गलती करेगा तो नुकसान होगा तो कौन भोगेगा? नौकर भोगेगा कि सेठ भोगेगा?
गलती हुई तो भी सेठ को भोगना है। गलती नहीं हुई तो भी फायदा सेठ को होने वाला है। मुझे क्या?
तो नौकर सब अपने आँखों के सामने देखता है।
लेकिन कुछ बोलता नहीं है।
सेठ को जो मर्जी मैं वैसे सो करूँ।
सेठ बोले उतना काम कर देना। ऐसा ही घर परिवार में अपने को कैसे रहना है?
26:36में अपने को कैसे रहना है?
आरंभ परिग्रह में भी हमको कैसे रहना है?
दुकान मेरी है, मैं संभालना है, मेरे को जाना पड़ेगा, इतना कमाई करना है, ये मेरा target है।
नहीं, ऐसा नहीं।
ऐसा नहीं।
हम यहाँ अपने ही दुकान में नौकरी कर रहे हैं, जैसे दूसरे नौकर नौकरी कर रहे हैं।
ऐसे हम मालिक नहीं हैं।
हम नौकरी कर रहे हैं, तो जाना पड़ता है, जाना नहीं है।
सेठ से पहले नौकर आ जाता है, दुकान साफ करता है।
27:04सेठ से पहले नौकर आ जाता है दुकान साफ करता है ताले खोलता है सब कितनी संभाल सेठ से ज्यादा काम करता है नौकर।
अपनापन है क्या? ये मेरी दुकान है ऐसा है क्या?
ऐसा नहीं है।
अपनापन आ ही नहीं सकता कितना भी हो अच्छा कई सालों से नौकरी करता हो 20 साल से 25 साल से।
लेकिन नौकर वो नौकर है।
25 साल से उस दुकान में आ रहा है लगाव हो गया है।
सेठ के सुख में दुख में हर एक में।
वो भी सेठ भी अच्छा है नौकर के दुख में सुख में।
27:32सेठ भी अच्छा है नौकर के दुख में सुख में हर प्रसंग में भाग लेता है।
लेकिन नौकर वो नौकर और सेठ वो।
कितना भिन्नत्व है।
बहुत भिन्नत्व है।
वो नौकर जो होता है सेठ का कहीं पैसा दुखता है कोई बराबर नहीं देता है तो सामने वाला का गला ही पकड़ लेता है।
गुस्सा करता है।
पैसा निकालने की कोशिश करता है।
लेकिन ये सब किसमें करता है?
सेठ बनने के भाव से कि नौकर के भाव से करता है?
अंदर में अपना जो position है उसका उसको बराबर।
28:00अपना जो position है उसका उसको बराबर ख्याल है जैसे नौकर दुकान में काम करता है ऐसे अपनी दुकान में अपने को कैसा काम करना है राजी खुशी से नहीं करना पड़ता है करना नहीं है संदर्भ में वो भाव कि क्या करना है सिर्फ आत्मकल्याण करना है और ये जो क्रिया है मेरे आत्मकल्याण में बाधा रूप है इसीलिए मुझे करना नहीं है फिर भी करना पड़ता है।
28:28नहीं फिर भी करना पड़ता है ऐसे घर परिवार में कुटुंब परिवार में संबंध आपस के संबंध जो होते हैं उसमें भी अपने को कहीं भी अधिकार नहीं चलाना है। स्त्री है तो मुझे उसकी संभाल रखना है मेरी मन की मर्जी से उसको रखूँगा उसके ऊपर मेरा अधिकार है। वो अगर अधिक मेरे माने तो ठीक है नहीं तो मैं गालियां भी दे सकता हूँ सब कर सकता हूँ। नहीं वो भी स्वतंत्र जीव है उसको भी अपनी इच्छा से जैसा रहना है रहना है उसकी संभाल लेने।
28:56रहना है उसकी संभाल लेने का ठेका मेरा नहीं है। फिर संबंध कैसे रहेंगे हमारे दोनों? फिर प्रेम का संबंध ही नहीं रहेगा। क्या अधिकारीपन गया तो फिर प्रेम भी गया और द्वेष भी गया। जब तक अधिकारीपना है तब तक राग भी है द्वेष भी है। हर एक में adjustment करता है मतलब क्या गलत में भी yes सही में भी yes इसका मतलब क्या होगा?
29:24इसका मतलब क्या हो गया?
अधिकारी बना गया, अपनापन गया।
अपनापन गया तो राग भी गया।
और राग नहीं है तो द्वेष भी गया।
ये कौन कर सकता है?
साथ में रहते हुए भी इतना जुदाई कैसे कौन रख सकता है?
जिसको सिर्फ आत्मकल्याण करना है वो।
वो आत्मकल्याण करने वाले की भूमिका कैसी होती है?
ऐसे भी एक दिन तो सारे संबंध छूटने वाले हैं।
जब यमराज आएगा ना,
तो घर, परिवार, दुकान...
29:52तो घर परिवार दुकान मित्र वर्ग साधन सम्पति जिसके लिए बहुत पाप करके पैसा कमाया है मकान अच्छा बनाया है furniture बसाया है क्या ये सब जो भी झमेला किया है पाप के पोटले बांधे हैं कई सालों तक संसार में आरंभ परिग्रह करते करते पहचान बढ़ाई है रिश्तेदारी बढ़ाई है सबसे अच्छा व्यवहार रखा है समाज में नाम कमाया है दानेश्वरी कहलाया है हर जगह मान मिलते हैं कहीं।
30:20हर जगह मान मिलते हैं कहीं जाता है तो सब हट जाते हैं उसको आगे स्थान बिठाते हैं।
सत्ता भी मिली है।
ये सारा जो program किया है, इतनी मेहनत किया है, इतने संकल्प विकल्प किए हैं, इतने राजस किए हैं।
आखिर क्या होगा?
जब यमराज आएगा तो क्या होगा?
सब एक second के अंदर सब साथ में छूटता है।
आत्मार्थी जीव क्या करता है?
30:48मर्त्य जीव क्या करता है? खुद भले ही जिंदा है अभी सांस है अभी आयु से पूरा खत्म नहीं हुआ है।
अध बीच में ही मृत्यु आने से पहले ही आत्मकल्याण करने के लिए जिंदा मर जाता है।
क्या करता है?
जिंदा मरता है माने क्या?
अब उसको सिर्फ आत्मा का ही ध्यान है संयोगों का घर परिवार का दुकानदार का किसी का भी ध्यान।
चाहे नुकसान हो चाहे profit हो सब मेरे को मंजूर है।
ऐसा भी छूटना ही है।
31:16ऐसे भी छूटना ही है, ऐसे भी छूटना है।
क्यों ना मैं पहले से छोड़कर के मेरे आत्मकल्याण करूँ?
वो जिंदा मरता है, अगर जिंदा नहीं मरता है, सत्संग सफल नहीं होता है।
ये बात कहना चाहता हूँ।
उतनी मरने की तैयारी नहीं है तो जीवता मराय,
तो फरी न मरु पड़े एवु मरण इछवा योग्य छे। आपने पढ़ा है कि नहीं पढ़ा है?
कृपा करके आगे क्या इसमें आता है?
आत्मारथी जीव तो ऐसा होता है।
बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है, परम...
31:44बहुत बड़ी कीमत चुकानी पड़ती है परमात्मा के दर्शन तो ज़रूर होते हैं guarantee के साथ होते हैं लेकिन कीमत बहुत चुकाना पड़ता है।
स्वर्ग में कौन जाएगा? दूसरे को भेजेंगे तो अपने अपने बदले में ऐसा होता है क्या?
कि मेरे को स्वर्ग के सुख चाहिए।
लेकिन एक काम कर मेरे को यहाँ पर भी संभालना है।
तू मर के जा स्वर्ग में मेरे को सुख दे ऐसा होता है?
स्वर्ग का सुख भोगना है तो यहाँ का सुख छोड़ना पड़ता है कितना भी अच्छा हो खुद को मरना पड़ता है।
32:12खुद को मरना पड़ता है।
ऐसे ही मुक्ति में जाना है तो संसार का अंश भी हमारे दिल में नहीं होना चाहिए।
पूरा का पूरा छोड़ना है।
Action में भले ही रहे खाना पीना के व्यापार धंधे की सारी प्रवृत्ति भले ही होती हो मन वचन काया की।
मन वचन काया की प्रवृत्ति और एक आत्मा की प्रवृत्ति दोनों अलग-अलग है।
हमने क्या कर दिया है?
कि आत्मा की जो प्रवृत्ति है उसको तो पहचान ही नहीं है।
और मन वचन काया की जो प्रवृत्ति है खाने पीने की सोचने की।
32:40जो प्रवृत्ति है खाने पीने की सोचने की बोलने की वो जैसा कि आत्मा की ही है असल में आत्मा की है ही नहीं।
इसलिए मन वचन काया की जो प्रवृत्ति है उसकी कोई भी effect आत्मा के ऊपर नहीं आती है।
समझो काया से वो चाहे जितना उपवास कर लेवे आत्मा को क्या फायदा कुछ भी फायदा नहीं क्यों?
कि काया और आत्मा बिल्कुल अलग है।
ऐसे वचन से सारा दिन 24 घंटा भगवान आत्मा का नाम लेवे।
या हरिंद्र भगवान का नाम लेवे जाप जपे 24 घंटा।
33:08तपे 24 घंटा।
भगवान आत्मा को कोई भी फायदा नहीं क्यों? तो वचन और आत्मा अलग-अलग है।
मन में भी शुभ भावना रखे मेरे को मुक्ति चाहिए, जन्म मरण से मुक्त हो जाना है।
एक भी गलती नहीं करनी, मन में बहुत planning कर लेवे।
या?
पूरे शास्त्र कंठ, गुरु की सब बात ध्यान में है, बुद्धि में बैठ गई है, मन में बहुत विचार करे बहुत।
ये भी विचार करे कि मैं तो आत्मा हूँ, जानने देखने वाला हूँ, मैं शाश्वत हूँ, फलां...
33:36जानने देखने वाला हूँ मैं शाश्वत हूँ फलाना हूँ ढिकड़ा हूँ।
किसमें करे वो?
मन के माध्यम से। क्या फायदा? zero फायदा कुछ भी फायदा नहीं है।
क्योंकि मन अलग है आत्मा अलग है। मन वचन काया की प्रवृत्ति चाहे अच्छी हो चाहे बुरी हो आत्मा को कोई फर्क नहीं पड़ता है।
एक आत्मा की क्रिया है जानने देखने वाले। उसमें क्या हो रहा है?
उसका फल लगता है।
रुचि पूर्वक दूसरों को जाने और अपने को ना जाने उसका फल...
34:04और अपने को ना जाने उसका फल लगता है। वो सबसे बड़ी गलती है।
सारी दुनिया को जाने लेकिन अपने को ही भूल जावे।
ये सबसे बड़ी गलती है।
इसका फल लगता है।
किसको जानता है किसको नहीं जानता है जानने वाली प्रवृत्ति तो हो रही है।
उसको छोड़ कर के उसका लक्ष्य छोड़ कर के उठा पटक में लग जाए हेरा फेरी में लग जाए।
मन वचन काया की प्रवृत्ति को ठीक ठाक करे।
किराए का मकान किराए का मकान है कितना भी सफाई करो वो करो।
34:32कितना भी सफाई करो वो करो।
कितना भी संभाल रखो आखिर क्या है?
अपनापन तो नहीं है।
छोड़ना तो पड़ेगा order आएगा तो।
भई खाली करो हमारे को आना है क्या करोगे अब?
हमने इतना खर्चा किया है वो किया है भैया तुमने किया है तुम्हारे राग पे हमने कहाँ बोला था?
तुम अभी छोड़ के जाओ।
मालिक थोड़े हो?
तुम्हारे को सुविधा थी बोल के करें।
ऐसे ही मन वचन काया को कितना भी संभालो और आत्मा को भूल जाओ।
35:00भूल जाओ।
फायदा होने वाला नहीं है।
Better ये है कि ये जिंदगी के अंदर बचे कुचे समय के अंदर,
सारी दुनिया को भूल जाना है।
ऐसे ही मरण के समय में तो हम भूलने वाले हैं, छूटने वाले हैं।
वो दिन आवे इसके पहले हमको,
सामने से चल करके,
भाई हमको कुछ नहीं चाहिए अब।
हमको सिर्फ आत्मकल्याण ही करना है। जिंदा मरना पड़ता है,
तो परमात्मा के दर्शन होते हैं।
थोड़ा भी बहुत कुछ...
35:28थोड़ा भी बहुत कुछ छोड़ा 99 छोड़ा है 99 person एक person रखा है।
यहाँ परमात्मा के दर्शन नहीं होंगे।
ये शर्त बहुत hard है।
ये बात कहते हैं।
सहज सत्संग फलवान थयो होय।
सत्संग से थोड़ा ही फायदा हुआ हो।
तो भी comparison में विशेष विशेष लोकावेश रहता हो।
तो जो फायदा हुआ है वो कब छूट जाएगा पता नहीं चलेगा।
ते फल निर्मूल तई जाता वार लागति मत।
अने स्त्री।
35:56અને સ્ત્રી પુત્ર આરામ પરિગ્રહના પ્રસંગમાંથી જો નીચ બુદ્ધિ અપનાપણ અધિકાર એ છોડને કા પ્રયાસ કરને મેં નહીં આયેગા તો સત્સંગ ફલવાન કૈસે હોગા?
હોને વાલા નહીં હૈ ક્યોકી ઉધર ભી લટકા હૈ ઇધર ભી દોનો બાજુ પકડ હૈ.
વો પકડ મજબૂત હૈ સંસાર કી.
યા કા તો અભી આત્મા દેખા નહીં હૈ તો કહાં સે મજબૂત હોગી?
જે પ્રસંગમાં મહાજ્ઞાની પુરુષો સંભાળીને ચાલે છે એ સંસાર ઇતના...
36:24चाले छे।
ये संसार इतना विचित्र है।
कि आत्मा का भान हो गया है तो भी।
और साधना बहुत top चलती है तो भी।
क्या होता है?
महाज्ञानी ज्ञानी पुरुष नहीं महाज्ञानी पुरुष भी।
मुनिराज भी आचार्य देव भी।
कह चलते हैं इस संसार में।
बहुत संभाली संभाली ने चाले छे एक एक कदम रखना है तो ध्यान के।
कहीं मेरा आत्मा का अहित ना हो जाए।
इतना ध्यान रखते हैं ज्ञानी पुरुष भी।
36:52पुरुष भी।
ऐसे इस संसार में।
जीव को।
अत्यंत अत्यंत संभारे थे संशय पीने चालू।
कैसा चलना कैसा रहना।
कैसा हमारी activity होना।
कि बहुत कदम कदम पे बहुत बहुत ध्यान।
हम थोड़ा बहुत तो ध्यान रखते हैं।
पहले जितना फसते हैं इतना फसते नहीं लेकिन अभी भी थोड़ा।
नहीं वो नहीं चलेगा।
नहीं 99 गलती नहीं करते हैं कभी एकाध गलती।
37:20ध्यान में गलती नहीं करते हैं कभी एकाध गलती अनजाने में कभी ध्यान चूक जाता तो हो जाती है कि भैया नहीं चलेगा।
इतनी गलती भी तुझे ही भोगना है।
इतना मेहनत करते हो तो थोड़ी और मेहनत कर लो ना।
तो तुम्हारा काम तो भी हो जाए।
वो थोड़ी गलती तेरे को रोक देगी।
थोड़ी गलती भी।
तेमा आ जीवे तो अत्यंत अत्यंत जिस संसार में महाज्ञानी पुरुष भी बहुत संभाल के चलते हैं।
बहुत ध्यान रख रख के।
ऐसे इस...
37:48ऐसे इस संसार में।
वापिस दुगना नहीं होवे, वापिस जाना नहीं होवे, तैरना ही होवे, किनारे पे पहुंचना होवे, उसके लिए।
इस जीव को अत्यंत अत्यंत संभालती संक्षेप हीने चालू, बहुत अपने को।
संभाल के प्रवृत्ति को बहुत कम करते करते संक्षेप करते करते चलना है।
ये बात नच भूलवा जेवी छे।
इस बात को तो बहुत ध्यान रखना है क्यों।
38:16रखना है क्यों?
एक ही भव में अनंत भव के चक्कर को मिटाना है तो काम बहुत बड़ा है।
और ये आयदा भी बहुत बड़ा है क्यों?
क्योंकि फिर अनंत काल तक शांति शांति शांति... फिर वापस दुख में आने वाले नहीं हो।
परमात्मा ही बनने वाले हो।
तो इतना ध्यान रखना जो compulsory है।
ये बात नच भूलवा जेवे छे।
First class पास आना है।
तो college में first आया है लेकिन maths में 99 आया है।
सब लोग नाराज हो जाएंगे।
क्या?
क्योंकि board exam में...
38:44क्या क्योंकि board exam में तो फिर बहुत सी colleges के बीच में competition होता है।
यहाँ भले ही first college में first आया है 93% आया है।
लेकिन दूसरी college में फिर 94 आया है।
एक mark भी कम आया ना उस होशियार वाले को होशियार विद्यार्थी को।
सब professor नाराज़ हो जाएंगे एक mark कैसे कम आया भैया।
देखो कैसा होता है।
final year है।
हमारी college का student ही first class first आना।
39:12College का student ही first class first आना top में।
कितनी competition रहती है।
तो होशियार व्यक्ति जो होता है जो student होता है उसकी एक भी गलती माफ नहीं की जाती है बहुत डांटते हैं।
क्या किया तूने ये?
नाराज हो जाते हैं।
ऐसा तुम होने वाला नहीं हो।
Professor की नींद खराब हो जाती है उसके पीछे इतना ध्यान रखते हैं।
उसको छींक भी आई तो professor को छींक आ जाती है।
क्या वो एक दिन बीमार पड़ा तो professor बीमार पड़ जाता है कि अब क्या होगा।
उस college...
39:40बीमार पड़ जाता था कि अब क्या होगा। इसका lesson छूट गया अब।
इतना परेशानी होती है।
तो हमको भी जब परमात्मा बनना है तो।
आ जीवे तो अत्यंत अत्यंत संभार थी संक्षेप किने चालूं ये बात नच भूलवा जेवी छे।
एम निश्चय करी ऐसा निर्धार करना।
कि निर्धार करने के बाद क्या कि निर्धार तो हो गया अभी हमारा action नहीं हो रहा है तो मैं क्या करूं ऐसा नहीं चलता।
प्रयास भी चलना है।
निर्धार करने के बाद प्रसंगे प्रसंगे कार्य कार्य।
परिणाम।
40:08કાર્ય કાર્ય.
પરિણામે પરિણામ એક એક પરિણામમાં એક એક સમયમાં.
ઉસ નિર્ધાર કા લક્ષ કરના.
લક્ષ કરકે.
તેથી મોકળું થવા એમ જ કર્યા કરું.
મોકળું માને ભિન્ન.
તેથી મોકળું થવા એમ જ કર્યા કરું એસી હી activity કરના.
કૈસે?
હે શ્રી વર્ધમાન સ્વામીની છદ્મસ્ત મુનિચર્યાને દ્રષ્ટાંતે અમે કહ્યું હતું.
ક્યા કિયા થા?
હે પા...
40:36क्या किया था? ये 528 है, 516 में वो बात आ गई है।
कि महावीर स्वामी ने राजमहल छोड़ कर के 12.5 साल तक घोर तपस्या की।
आत्मज्ञान तो था उनको पहले से ही।
वो ज्ञान लेके आए थे।
10 भाव पहले ही आत्मज्ञान हो गया था।
तो आत्मज्ञान, मति ज्ञान, सुध ज्ञान, अवधि ज्ञान तीनों ज्ञान, आत्मज्ञान सहित।
वो तो माँ के पेट में आए थे ना, तेजस्विनी के, तब से ही।
41:04ना देशना रानी के तब से ही।
इसके बाद उन्होंने संसार में निर्लेपता में प्रार्थना करते गए करते गए राजमहल में भी रहे लेकिन संसार के कोई प्रसंग में मोहित नहीं हुए।
दीक्षा लेने के लिए बार-बार कहा लेकिन माँ-बाप ने रजा नहीं दी, भाइयों ने रजा नहीं दी।
तो रुक गए।
लेकिन महल में ऐसे रहते थे।
जैसे जंगल और महल दोनों बराबर हैं।
आखिर में उनके भाइयों ने कह दिया कि भैया आपका यहाँ रहो या वहाँ रहो कोई फर्क नहीं पड़ता है।
41:32हो या बाहर हो कोई फर्क नहीं पड़ता है।
अभी आपकी इच्छा हो तो भले ही आप दीक्षा ले सकते हो।
अच्छा उनको तो वही चाहिए था।
क्योंकि दो तीन बार सामने से मांगा तो सजा नहीं मिली।
अब वो सामने से आया time जब तक इंतज़ार किया किसी को दिल को दुखाना नहीं है।
अपनी साधना तो यहाँ भी कर सकते हैं ना।
किया।
लेकिन देखा कि वन में रहो चाहे जंगल में रहो उनकी साधना तो ऐसी है जैसे जंगल में ही है।
महल में है तो भी जंगल में ही है।
ऐसा होने के बाद जब दीक्षा लेने के बाद जो 12.5 साल का जो...
42:00तो दीक्षा लेने के बाद जो 12.5 साल का जो ये जो चला तपस्या।
ये तो उसी भाव में मोक्ष जाने वाला निश्चित था।
क्या?
कोई doubt नहीं था।
बचपन में ही स्वर्ग से इंद्र आकर के जन्माभिषेक किया सब किया उनका।
जब जाहिर बात थी कि ये 24वाँ तीर्थंकर का जीव है।
इसी भाव मोक्ष जाने वाला है।
लाखों जीवों का तारणहार है।
लेकिन जब मुनि पनाह लिया उन्होंने।
भगवान तो केवल ज्ञान तो बाद में हुआ।
केवल ज्ञान।
42:28बाद में हुआ।
केवल ज्ञान होने के पहले जब 12.5 साल तक की साधना की, तो भगवान ने क्या किया?
दो व्रत ले लिए।
साधना शुरू करते ही।
साधना में जरा भी गलती ना हो जाए इसके लिए।
कौन से व्रत?
नींद नहीं लेना है एक बात।
या जब तक केवल ज्ञान नहीं होवे, निद्रा नहीं।
दूसरा, एक शब्द भी मुँह से नहीं बोलना है।
भगवान होने ही वाले थे, क्योंकि इतनी...
42:56भगवान होने ही वाले थे फिर इतनी पंचायत क्यों?
इतना ध्यान क्यों रखा उन्होंने?
कि संसार में भूल भुलैया ऐसी है।
कि साधना करते करते कभी भी कदम दजमा जाता है।
कभी भी वापस जाना होता है।
इसलिए भगवान ने भी इतनी सावधानी रखी।
ये बात को यहाँ कहते हैं मुमुक्षु जीवन।
कि भैया आप तो बिल्कुल जिंदा मर जाओ।
क्या?
इतनी तैयारी रखो।
कि फुकट में परमात्मा का दर्शन होने वाला नहीं है, हो तो भी सकते हैं।
43:24हो तो अभी सकते हैं।
एक घंटे में भी हो सकते हैं और 6 महीने में भी हो सकते हैं।
लेकिन आपकी भावों की तैयारी कैसी रहनी चाहिए?
कि जैसे आज ही संसार को छोड़ दिया है, स्त्री, कुटुंब, परिवार, दुकान, नाम, इज्जत सब आज ही छोड़ दिया है।
किसमें छोड़ा है?
जंगल में चले गए? तो नहीं, जंगल में नहीं गए।
साथ में रहते हैं लेकिन जैसा कोई कोई connection ही नहीं है।
जैसे दूसरी दुनिया में चले गए हैं।
अपने संबंध जैसा कोई है ही नहीं।
ऐसे ही रहने...
43:52जैसा कोई है ही नहीं। ऐसे ही रहना है।
तो ही आपका ध्यान आत्मकल्याण में लगेगा नहीं तो लग नहीं पाएगा।
ऐसा निश्चय करके,
प्रसंग प्रसंग में,
कार्य कार्य में,
परिणाम परिणाम में,
अपने जो लिया हुआ जो निर्धार किया है आत्मकल्याण का उसको ध्यान रखते हुए,
जैसे इन पदार्थों से,
घर परिवार से,
बाहर के जमेले से जैसे हम भिन्न हो सकते हैं,
मोकुर्तवाए।
44:20મોકળું થવાય. ગુજરાતી શબ્દ મોકળું છે.
ઇસકા લક્ષ એનો લક્ષ રાખી તેથી મોકળું થવાય એમ જ કરયા કરું.
અંદર સે ભાવ સે ભિન્નતા હોવે.
ભાવો સે ભિન્નતા હોગી તો ક્યા હોગા?
ઉસકા બિગડે તો ભી હમારા કુછ નહીં બિગડતા, અચ્છા હોવે તો ભી ખુશી નહીં હોતી.
ઇસકો બોલતે હૈ ભિન્નતા.
તો બચ્ચે કો બુખાર આયા મિટા નહીં હૈ doctor કે પાસ લેકે જાતા હૈ.
લેકિન જલ્દી અચ્છા હો જાતો સા અચ્છા.
44:48हो जाए तो अच्छा।
फिर क्यों आया? वो दुखी हो जाए तो ये भी दुखी हो जाए ऐसा नहीं होता है।
सब activity होती है पूरी।
लेकिन वो भाव खत्म हो गए क्यों? भिन्नता है।
बच्चा दुनियादारी की दृष्टि से मेरा है।
मेरी नज़र में सिर्फ मेरा आत्मा ही मेरा है बाकी कोई मेरा नहीं है। ये भिन्नता हो गई।
ऐसा करना करके बोलते हैं।
कृपालु देव की ये आज्ञा है कि जिंदा मर जाना है।
इस संसार के...
45:16इस संसार के एक रजकण के साथ भी मेरा किसी प्रकार का कोई भी संबंध नहीं है।
कोई भी प्रकार का संबंध नहीं है।
द्रव्य, क्षेत्र, काठ भाव से मैं सबसे भिन्न, असंघ, अपने में संपूर्ण, ऐसे परमात्मा हूँ।
अपनी अवस्था से भी मेरा कोई संबंध नहीं है, दूसरे से तो क्या लेना देना है?
शरीर मेरा है वो बात तो कहाँ रही।
अपनी जो ये जानन-जानन जो अवस्था है, सन-सन पलटती है, वो मेरी नहीं है।
मैं तो अपरिनमी शाश्वत पदार्थ हूँ।
पलटे...
45:44शाश्वत पदार्थ है पलटे जो अवस्था है वो मेरी नहीं है।
अवस्था जब मेरी नहीं है तो राग द्वेष विकृति कहाँ से मेरी हो?
और जो ये संबंध है दुनिया के वो कहाँ से मेरे हो?
ऐसी साधना अंदर की भावों की करना है भावों को इतना turn कर लेना है कि किसी के साथ मेरा कोई संबंध नहीं है।
तो परमात्मा के तो महावीर स्वामी ने इतना किया सबसे संसार को छोड़ने के बाद भी इतना आत्मा में रहने के लिए इतना व्रत भयंकर लिया है।
मौन का और निद्रा का अनिद्रा का।
46:12अनिद्रा का।
तो फिर,
हम जैसों को तो बहुत सावधान रहना है।
उसी मोक्ष जाने वाले ने भी इतना भयंकर काम किया है, साधना की है, तो हम जैसों को तो,
ज़बरदस्त साधना करनी पड़ेगी।
उसमें बाहर से कुछ छोड़ना नहीं है, लेकिन अंदर में किसी को नहीं रखना है।
अंदर में एक ही स्थान, saint person मेरा आत्मकल्याण करना है।
दूसरा कुछ भी नहीं।
जो भी बीच में आवे, परिणाम में अवलोकन करो, देखो।
46:40परिणाम में अवलोकन करो देखो अभी का रुचि है।
अभी किसकी पंचायत चल रही है अंदर में?
जिस दिन सिर्फ आत्मा की पंचायत रहेगी ना आत्मा का ही ध्यान रहेगा ना उसी दिन।
सिर्फ आत्मकल्याण करना ऐसा भाव होगा तब।
अच्छे बुरे सारे विकल्प खत्म हो जाएंगे निर्विकल्प अवस्था आ जाएगी।
वो बढ़ेगी।
शून्य शून्य कुछ भी नहीं देखो एक भी भाव नहीं आ रहा है।
ऐसा बढ़ेगा निर्विकलता आएगी सबसे पहला result तो वो आता है।
ऐसे अवलोकन करते हैं।
47:08ऐसे अवलोकन करते हैं तो कोई भाव ही नहीं आता है।
इसका मतलब क्या हो गया?
इस जीव ने आत्मकल्याण का निर्धार किया है।
ये साबित हो गया।
अब वो पीछे हटने वाला नहीं है।
अब यहाँ से कैसे आगे बढ़ना वो श्री गुरु बताते हैं।
एक दफे निरविकल्प अवस्था आती है, भावों से छुटी होती है, अच्छे बुरे, अपने पराए, किसी प्रकार के कोई भाव नहीं आते हैं।
ये first symptom है।
वो आत्मकल्याण जिसको करना है उसको आते हैं।
जिन्होंने बहुत साधना की है, अवलोकन की...
47:36जिन्होंने बहुत साधना की है अवलोकन की उसको याद है।
एक दफे छूट जाना है सबसे।
इसका मतलब क्या हुआ भिन्न हो गया जीव।
संसार के सारे प्रपंचों से वो भिन्न हो गया।
पहले वो स्थिति आना निर्विकल्प अवस्था पहले आना।
फिर निर्विकल्प अवस्था में से सहानुभूति कैसे होना?
वो श्री गुरु सिखाते हैं।
ये second चाबी है।
First चाबी अवलोकन की।
Second चाबी है भेद ज्ञान।
बस फिर तो बहुत आसान हो जाता है अगर थोड़ा भी।
48:04फिर तो बहुत आसान हो जाता है अगर थोड़ा भी प्रयास करे तो बहुत आसान हो जाता है बाद में।
सुखद अनंद सो संतो चई।
बिना राह करे है।
तारा ध्यान माई।
कर शांति अनंद।
जय।
48:32नाम उपदते परतेजय।
नाम उपदते परतेजय।
बोलो परम उपकारी श्री सद्गुरु देवाय जय।