Shrimad Rajchandra Vachanamrut
Also on this day: Shrimad Rajchandra Vachanamrut 2
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Recitations restored to their canonical wording: Mangalacharan — Mangalam Bhagavan Viro, Mangalacharan — Sarva Mangala Mangalyam, Namokar mantra, Omkar bindu sainyuktam, Samaysar mangalacharan.
0:00શ્રીમદ રાજચંદ્ર પતરાંક 528 ભાગ 1 તારીખ 8-11-2000 શ્રી દેવચંદભાઈ.
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्व साहूणं नमः समयसाराय स्वानुभूत्या चकासते ।
चित्स्वभावाय भावाय सर्वभावान्तरच्छिदे
0:28मंगलं भगवान वीरो, मंगलं गौतमो गणी।
मंगलं कुन्दकुन्दार्यो, जैनधर्मोऽस्तु मंगलम्॥
सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वकल्याणकारकम।
प्रधानं सर्वधर्माणां जैनं जयति शासनम॥
ॐकारबिन्दुसंयुक्तं नित्यं ध्यायन्ति योगिनः।
कामदं मोक्षदं चैव ॐकाराय नमो नमः
0:56રાજચંદ્ર વચનામૃત પત્ર number 528 five twelve સ્વપ્ને જેને સંસાર સુખની ઈચ્છા રહી નથી અને સંપૂર્ણ નિસારભૂત.
1:24और संपूर्ण निस्वार्थभूत जिसे संसार का स्वरूप भासता है।
एवा ज्ञानी पुरुष।
कैसे ज्ञानी पुरुष?
जिसको सपना भी नहीं आता है कि बाहर से सुख मिलेगा।
संसार में से कुछ मिलेगा।
सपने में भी नहीं, सपना भी नहीं आता है।
अबसे संपूर्ण निस्वार्थभूत जिसे संसार का स्वरूप भासता है।
अनुकूलता है तो भी उनको सार नहीं लगता है।
नहीं तो अनुकूल...
1:52लगता है।
ये तो अनुकूल time में तो लगता है कि नहीं संसार में कोई जेने ऐसा है।
ये भी एक मजा है।
प्रतिकूलता तो अच्छी नहीं लगे लेकिन अनुकूलता अच्छी लगती है।
लेकिन ज्ञानी पुरुष को तो अनुकूलता में भी सार भासित नहीं होता है।
ये अनुकूलता टिकने वाली नहीं है कब छू हो जाएगी मालूम नहीं।
ऐसा स्वरूप है संसार का।
संपूर्ण निसारभूत।
जेने संसार नु स्वरूप।
बासिं।
2:20સ્વરૂપ.
ભાસે છે.
એવા જ્ઞાની પુરુષ પણ.
વારંવાર આત્મા અવસ્થા સંભાળી સંભાળીને ઉદય હોય તે પારબને વેદે છે.
એસે જ્ઞાની પુરુષ કો ભી સંસાર મેં બહોત તકલીફ હોતી હૈ.
તીરને મેં.
બહુ સમુદ્ર મેં ડૂબે હૈ જીસકો સહારો નહીં મિલે વો તો બિચારે.
તીરંગે કૈસે?
લેકિન ઇનકો સહારો મિલા હૈ.
લેકિન અભી તો કા ચોથા ગુણસ્થાન.
2:48लेकिन अभी तो कहाँ चौथा गुणस्थान और कहाँ परमात्मा की दशा।
चौदहवाँ चौदहवें गुणस्थान।
वो भी पार कर देना तो तो जाकर सिद्ध भगवान बनेंगे।
तो बहुत साधना विकट है।
परमात्मा बनने की साधना बहुत विकट है उनको भी बहुत तकलीफ होती है तैरने में किनारे में आने में उनको भी तकलीफ होती है।
ऐसे ज्ञानी पुरुष।
वो भी बार-बार अपनी आत्मा की दशा को संभाल-संभाल करके।
जानकारी में जागरूकता में रहते-रहते।
3:16जानकारी में जागरूकता में रहते रहते जैसा उदय आता है ऐसे अपने नसीब को भेजते हैं सुख में दुख में सब उनको भी और शोक होता है अंदर में चिंताएं होती हैं ये सब तकलीफ भोगते हैं ये सजा मिली है भूतकाल में किए हुए कर्मों की सजा है कभी रास्ता नहीं सूझता है ऐसा भी बनता है कैसे tackle करना situation tackle कैसे करना बहुत तकलीफ होती है।
3:44बहुत तकलीफ होती है। ऐसे ज्ञानी पुरुष भी बार-बार आत्मा की अवस्था संभाल-संभाल कर उदय होता है। ऐसे प्रारब्ध को वेधते हैं। जैसा कर्म का उदय आता है ऐसा हुआ है। स्वीकार कर लेते हैं। सुख को, दुख को, सबको स्वीकार कर लेते हैं। लेकिन आत्मा अवस्था ने विषय प्रमाद थवा देता ना थी। तो साधना जिसको जल्दी-जल्दी करनी है। बाहर में सुख आओ चाहे दुख आओ लेकिन।
4:12बार में सुख आओ चाहे दुख आओ लेकिन।
अपनी जागृति के अंदर थोड़ा भी प्रमाद नहीं करते हैं।
ये तो किसकी बात है जिसको संसार में थोड़ा भी सुख भाषित नहीं होता है।
अनुकूलता भी प्रतिकूलता के समान।
तकलीफदाई है मोहित नहीं होते हैं अनुकूलता में भी।
इतने सावधान हैं श्रद्धा इतनी मजबूत होने वाले ज्ञानी की ये बात है।
वो भी निरंतर पुरुषार्थ करते हैं प्रमाद नहीं करते हैं।
अपनी आत्मा को।
4:40अपनी आत्मा की अवस्था को संभालते हैं। कैसे संभालते हैं?
आत्मा की अवस्था को कैसे संभालना? उपयोग पलटाना।
नहीं उपयोग पलटाने का तो हो ही नहीं सकता है।
फिर कैसे संभालेंगे?
द्रव्य दृष्टि से।
अपना जो मूल स्वभाव है उसको देखते ही, उसका आधार लेते ही, परिणति में अपने आप change आ जाता है। परिणति अपने आप सुधर जाती है।
इस प्रकार से वो बार-बार प्रमाद किए बिना अपने स्वभाव को बार-बार बार-बार ल...
5:08अपने स्वभाव को बार-बार बार-बार लक्ष्य में लेकर के सहज में ध्यान आदि क्रिया में लग जाते हैं।
लग जाते हैं नहीं हो जाता है सहज सहज में क्योंकि दूसरा कोई रास्ता ही नहीं है।
संसार सागर तैरने का और कोई रास्ता नहीं है पूजा भक्ति व्रत तप नियम ये कोई रास्ता नहीं है।
स्वभाव का लक्ष्य रहे जानने वाला निरंतर दृष्टि में रहे।
वो संसार सागर तैरने का है कृपा है।
5:36उपाय है।
तो ज्ञानी पुरुष जिसकी श्रद्धा तो पक्की हो गई है अब फंसने वाले नहीं हैं संसार के प्रसंगों में क्योंकि सारभूत नहीं लगते हैं कोई भी प्रसंग।
नहीं फंसने वाले हैं तो भी वो बैठ नहीं गए हैं कि चलो अभी हाथ पे हाथ रखकर अब तो safe हो गए ना।
पहले तो कोई सहारा ना था अब तो नैया मिल गई ना तैरने के लिए तो बहुत सागर बाहर हो जाएंगे कैसे भी करके।
हो जाएंगे वो तो निश्चित है।
लेकिन फिर भी वो प्रमाद नहीं करते हैं।
प्रमाद ना हो।
6:04પ્રમાદના અવકાશ યોગે અગર વો પ્રમાદ કરેંગે તો.
જ્ઞાનીને પણ અંશે વ્યામોહ થવાનો સંભવ.
કહેલો છે જ્ઞાની ભી મોહિત હો સકતા હૈ સંપૂર્ણ નહીં અંશે.
અંશે ઉનકો ભી ભ્રાંતિ હો સકતી હૈ.
પ્રમાદના અવકાશ યોગે અગર સ્વરૂપ કો નહીં સંભલેગા સ્વભાવ કા લક્ષ નહીં કરેગા બાર.
જૈસે જ્ઞાની કો ભી અંશ મેં વ્યામોહ.
6:32जो भी अंश में व्यामोह भ्रांति होने का संभव।
जे संसार से कहो छे।
ये संसार का स्वरूप ऐसा है कि वो भी मोहित कर लेता है ज्ञानी को पूर्ण स्वरूप से नहीं करता है क्यों?
आत्मा का अनुभव एक बार हो चुका है।
लेकिन जागृति में नहीं रहेंगे तो वो भी आकर्षित करते हैं और जितना आकर्षित करते हैं उतना ही कसाय तीव्र होता है।
कसाय में उठापटक बहुत होती है।
तीव्रता गुस्सा तीव्र हो जाता है।
7:00हो जाता है अच्छा नहीं लगता है द्वेष बुद्धि आ जाती है अनुकूल परिस्थिति में राग हो जाता है क्या हो जाएगा तो प्रमाद ना अवकाश योग है मतलब अगर स्वभाव का लक्ष्य नहीं करेंगे तो उसमें काफिल रहेंगे तो ऐसा पुरुषार्थ नहीं होगा तो ज्ञानी को भी आंशिक रूप से मोह होने का संभव है।
7:28होने का संभव है।
मोह बढ़ने का भी संभव है। मोह मतलब कौन सा मोह बढ़ेगा अब?
दर्शन मोह वाली भ्रांति तो खत्म हो गई।
चारित्र्य मोह बढ़ता है।
और स्थिति ऐसी बनती है कि अज्ञानी की स्थिति अच्छी होती है और ज्ञानी की स्थिति खराब दिखती है।
इतना सत्संग करता है, इतनी आराधना करता है लेकिन फिर भी कोई परिणाम में change नहीं आता है। क्यों? प्रमाद।
स्वभाव को नहीं संभालता है। बार-बार बार-बार बार-बार स्वभाव का लक्ष्य करना चाहिए वो नहीं करता है। इसमें प्रमाद करता है।
7:56હે, ઇસમે પ્રમાદ કરતા હે.
હે તો વો સે મુક્તિ તો હોને હી વાલી હે લેકિન ઇતના પ્રમાદ ભી ઉસકો નહીં કરના હે ક્યોકી સંસાર બહોત વિચિત્ર હે.
સંસાર કે જો સંગ પ્રસંગ હે વો ઇતને જીવ કો કલ્યાણ મેં ઇતને અંતરાય ડાલતે હે કે અગર ઉસમે પુરુષાર્થ નહીં રહા તો problem આ સકતા હે.
તે સંસારમાં આવા સંસારમાં જે જ્ઞાનીને પણ મોહિત કરે છે.
તે સંસારમાં સાધારણ જીવે રહીને.
તેનો વ્યવસાય લૌકિક.
8:24તેનો વ્યવસાય લૌકિક ભાવે કરીને આત્મહિત ઈચ્છવું એ નહીં બનવા જેવું જ કાર્ય છે.
જીસ સંસાર મેં કદમ કદમ પર જ્ઞાની કો ભી બહોત સંભાળ સંભાળ કરકે બહોત જાગૃતિ મેં રહે કરકે બહોત પુરુષાર્થ કરકે બચના હોતા હૈ.
એસે ઇસ સંસાર કે અંદર જીસકો આત્મજ્ઞાન નહીં હુઆ હૈ એસે સાધારણ જીવ કો.
સંસાર ભી સંભાળના હૈ કુટુંબ પરિવાર શરીર આદિ એ ભી સંભાળના હૈ.
8:52आदि ये भी संभालना है।
और आत्मकल्याण भी करना है।
Possible नहीं है ये बात।
एक साथ दो कार्य नहीं कर सकते।
या संसार या आत्मा।
किसी को एक को तो छोड़ना ही पड़ेगा।
अभी क्या है कि संसार में तो रंगे गया है तो आत्महित को छोड़ा हुआ है इसने।
पूरा change करना पड़ता है।
सपने में भी संसार नहीं चाहिए।
उठे जैसा है मैं सहन कर लूंगा, adjust कर लूंगा लेकिन आत्मा किसी भी हालत में चाहिए चाहिए चाहिए।
9:20आत्मा किसी भी हालत में चाहिए चाहिए चाहिए ऐसा अगर निश्चय दृढ़ नहीं हुआ तो उसको संसार में भी रस है तो फिर वो कार्य नहीं हो सकता है one one side होना चाहिए कोई भी एक side पकड़ना है किसको साधारण जीव नहीं तो उसकी बस की बात नहीं है क्योंकि ज्ञानी के भी बस की बात नहीं है बहुत मुसीबत से वो आगे बढ़ रहे हैं तो मुमुक्षु जीव को तो बस की बात है ही नहीं उसको तो बहुत संभालना है ऐसे संसार में ऐसे विचित्र।
9:48એસે સંસાર મેં એસે વિચિત્ર.
ચારો ઓર સે બાધારૂપ.
સંસાર મેં સાધારણ જીવ કો તો.
સંસાર કી પ્રવૃત્તિ ભી લૌકિક ભાવ સે કરના.
વા આત્મહિત કી ચાહના રખના.
નહીં બનને જેસા કાર્ય હો.
ક્યું એસા ક્યું?
કેમકે લૌકિક ભાવ આડે આત્માની નિવૃત્તિ જ્યાં નથી આવતી.
ત્યાં હિત વિચારણા બીજી રીતે થવી સંભવતી નથી.
ત્યાં ઉલટતા હૈ જીવ.
10:16उलझता है जीव।
तो क्या होता है?
निवृत्ति नहीं मिलती है।
एक के बाद एक, एक के बाद एक कार्य आते रहते हैं और उसमें ये तो करना ही पड़ेगा, ये तो फर्ज है हमारी।
इतना नहीं करेंगे तो कौन करेगा?
करे बिना तो चलेगा नहीं, लोग क्या कहेंगे, आजू-बाजू वाले क्या कहेंगे?
ये तो चाहिए ही चाहिए, ऐसा करके जो लौकिक भाव में प्रवृत्ति करता है, तो निवृत्ति नहीं मिलती है साधना करने के लिए।
निवृत्ति मिले तो अपने हित के बारे में सोचें, निवृत्ति नहीं मिलती है तो हित के बारे में...
10:44निवृत्ति नहीं मिलती है तो हित के बारे में कैसे सोचेगा?
पहले जो planning करना पड़ता है।
ये संसार में हर कार्य planning करके करता है ना, कोई भी कार्य हो।
ये Mumbai जाना है तो planning से।
मेरे ticket available है कि नहीं, कौन सी date fix करना।
कब जाना है, कब आना है।
कब अनुकूलता है।
ये सब decision पहले करता है ना, बाद में कदम उठाता है।
इसी प्रकार से इसमें भी आत्मदर्शन उसी को होता है जिसको पहले सबसे...
11:12किसी को होता है जिसको पहले सबसे उसके पहले आत्मदर्शन होने के पहले planning होता है mind के अंदर सहज रूप से।
जब आत्मकल्याण करना है तो planning करना है तो उसमें बाधा रूप जो जो है वो सब छोड़ना पड़ता है।
Mumbai भी जाना है और यहाँ का काम भी संभालना है।
तो फिर नहीं हो सकता है फिर आपको यहीं रहना है।
यहाँ का काम किसी को हवाले कर सकते हो या 3 4 दिन 5 दिन 8 दिन के लिए pending कर सकते हो तो ही आप जा सकते हो।
तो दोनों काम साथ में कैसे करें?
11:40तो दोनों काम साथ में कैसे करें?
ऐसे यहाँ पर भी एक ही काम करना है, लक्ष्य एक ही, मुझे अभी आत्मकल्याण के सिवा कुछ नहीं करना है।
बाकी सब जो होगा उदे अनुसार।
तो लौकिक भाव आडे आत्मा ने निवृत्ति ज नथी आवती, लौकिक विचारना में पड़ता है, ओ संग बो संग बढ़ जाता है, नहीं करना चाहिए ओ संग बढ़ाता है।
मुमुक्षु का संग कम और लौकिक जनों का संग ज्यादा जिसको आत्मा की बात भी पसंद नहीं है।
तो क्या हो गया रुचिपूर्वक असत्संग में गया।
12:08सत्संग में गया।
रुचिपूर्वक तो ये लौकिक भाव आ गया, लौकिक भाव के आड़े फिर इसको निवृत्ति नहीं मिलती और बेकार के चर्चा विचारणा में समय जाता है।
सत्संग भी नहीं होता है इसके अंदर।
तो जीव को आत्महित की विचारणा करने के लिए planning करने के लिए समय भी नहीं मिलता है।
एक निवृत्ति तो बीजानु परिणाम थमु थमु संवे छे, एक एक का stop होगा तब दूसरा चालू होगा।
जब तक संसार की प्रवृत्ति चालू है तब तक आत्महित की प्रवृत्ति...
12:36की प्रवृत्ति चालू है तब तक आत्महित की प्रवृत्ति नहीं है, विचारणा भी नहीं है।
और आत्महित की प्रवृत्ति है, तो संसार की प्रवृत्ति नहीं है। प्रवृत्ति नहीं है मतलब बंद हो जाता है ऐसा नहीं है।
ये हमारे को भूसा हो गया।
आत्मा के पीछे लग जाएंगे, ध्यान उधर लगा लेंगे तो संसार की जैसे सारी प्रवृत्ति बंद हो जाएगी।
खाने का ही मन नहीं रहेगा, पीने का ही मन नहीं रहेगा, नींद भी नहीं आएगी ऐसा।
या दुकान भी नहीं जाएंगे, घर-बार का काम भी नहीं होगा, ये हमारे को mind में भूसा है।
प्रवृत्ति रहेगी, प्रवृत्ति करने का जो भाव है वो निकल जाएंगे।
13:04करने का जो भाव है वो निकल जाएंगे क्यों क्यों ऐसा होगा क्योंकि अभी हम खाना बनाने का भाव करते हैं और फिर खाना बनाते हैं प्रवृत्ति में हमको ऐसा भूसा भूसा गया है कि हम ऐसा planning किया खाना बनाने का भाव आया रोटी बनाने का विचार आया और फिर हमने ये सब planning करा तो रोटी बनी अगर हम विचार नहीं करते तो रोटी नहीं बनती थी विचार किया इसलिए रोटी बनी है बिल्कुल गलत बात है विचार अलग है।
13:32बिल्कुल गलत बात है। विचार अलग है, वो आत्मा ने किया है।
रोटी बनना नहीं बनना वो lot, चकला, बेलन आदि जड़ पदार्थों का कार्य है।
असल में तो lot का कार्य है।
असल में, निमित्त में दूसरी बहुत सी चीजें हैं।
इसमें एकाध निमित्त ये भी ले लो कि इसका भाव।
क्या निमित्त में?
कर्ता में तो रोटी भाई ने बनाई नहीं।
ऐसे दुकान के भी कोई काम हमने नहीं किया है।
हमने सोचा इसलिए कार्य हुआ, बिल्कुल गलत बात। तो फिर...
14:00सोचा इसलिए कार्य हुआ बिल्कुल गलत बात तो फिर हर वक्त ऐसा होना चाहिए देखो अपने भावों का अवलोकन करो भावों का अवलोकन करके देखो कि 1 घंटे में हमने 1000 बातें सोची हैं 1000 बार विचार आए अच्छे बुरे कितना कार्य हुआ अगर भाव के अनुसार हमारे भाव के अनुसार दुनिया चलती है तो जितने जितने हमारे भाव आते हैं सब के सब हमारा इस प्रकार से कार्य होना चाहिए जैसे मन में किसी को भाव आया कि इसको थप्पड़ मार देना है बहुत हैरान करता है मेरे को मार सका।
14:28मार सका?
Action आया ऐसा?
नहीं आया।
मन में 10 बार 15 बार भाव कर लो।
लेकिन action आना हुआ क्या?
ये भाई क्या बताता है?
Percentage देख लो चलो।
इन भावों का percentage देख लो कि कितने भाव हमने किए उसमें से कितने सफल हुए।
तो भी आपको लगेगा।
कि भावों से दुनिया नहीं चलती हो।
भाव जीव करता है अज्ञानता के कारण और कार्य...
14:56के कारण और कार्य जैसा जड़ का परिणमन होने वाला है ऐसा होता है।
ये अवलोकन में सबसे पहले ये सीखा शिक्षा लेना है।
सबसे पहले ये सीखना है अवलोकन के अंदर।
कि हम बेकार का कर्म बांध लेते हैं कार्य तो होता नहीं कर्म फुकट के बांध लेते हैं।
भई जिस कार्य के लिए गया travel की ₹500 ₹1000 खर्च कर डाला और वहां जिसको मिलने गए वही नहीं मिला।
क्या हुआ?
समय और शक्ति और बेकार का दंड हो गया कि नहीं हो गया?
वैसा ही हमारी जिंदगी ऐसी गुजर रही है।
15:24हमारी जिंदगी ऐसी गुजर रही है।
दिन भर में हजारों प्रकार के अच्छे बुरे भाव कर लेते हैं।
कर्म का पोटले तो हम बांधते हैं और वो भोगना भी हमको ही है आप इस।
लेकिन कार्य कितना होता है?
तो आप आप खुद महसूस करोगे कि 95% 99% भी आपकी इच्छा से नहीं होते हैं कार्य।
फिर बेकार के भाव क्यों करें?
फिर संसार हमारी इच्छाओं के...
15:52ये संसार हमारी इच्छाओं के अधीन नहीं है।
3 साल का बच्चा भी हमारी बात नहीं मानता।
वो अपने हिसाब से रहता है अपनी मर्जी अनुसार।
अगर उसको अनुकूल परिस्थिति नहीं है तो वो रोता है चिल्लाता है।
उसको जब तक अपने अनुकूल परिस्थिति में रखेंगे तब तक अपना से राजी है नहीं तो राजी नहीं है वो।
सब सब जीव स्वतंत्र है सबको अपना अपना अपना अपना जहाँ जहाँ सुख भाषित होता है वहाँ वहाँ रहने में आदी हो गए हैं।
उसमें अगर घरवाले भी अगर तकलीफ देवे...
16:20घरवाले भी अगर तकलीफ देवे, तो भी उसको नहीं सुहाता है।
जिससे राग करता है वो अगर तकलीफ देवे तो वो नहीं सुहाता है। देखो जीव की परिस्थिति कैसी है।
इतना संसार चारों ओर से तकलीफदाई है, असार।
तो ज्ञानी पुरुष को मालूम है इस बात का।
एक की निवृत्ति तो बीजाणु परिणाम थहो संभव छे। एक की निवृत्ति होगी तो दूसरा हाथ में लेंगे। संसार में से ही छुट्टी नहीं होती है तो आत्मविचारणा कैसे करेगा जीव?
तो साधारण जीव को...
16:48तो साधारण जीव को तो इस संसार में तैरना बहुत मुसीबत है। इसीलिए उसको सबसे पहले एक भाव पे आ जाना चाहिए। उसको अपनी आत्मा को पूछना चाहिए कि ये थोड़ी सी जिंदगानी है।
शरीर के लिए, परिग्रह के लिए, हर एक के लिए तूने कितने भाव किए?
देह ने माटे हे जीव तूने अनंत भाव बिगाड़ लिए। अनंत जन्म मरण किए। क्यों देह में बुद्धि थी, मोहित बुद्धि थी।
अब हे जीव संसार से छूटना तो उपाय है।
कि देह ने...
17:16कि देरने खातर अनंत भव व्यतीत किया अब संतो कहते हैं कि संत पुरुष कहते हैं कि।
तुम सिर्फ एक भव अपने आत्मा के लिए दे दो।
सिर्फ एक भव इसमें से भी कई जिंदगी तो निकल गई है।
किसी की तो आधी से ज्यादा निकल गई है।
बाकी की जो बची हुई जिंदगी सिर्फ आत्मा के लिए लगाना है।
मुझे सिर्फ आत्मा चाहिए और कुछ नहीं चाहिए संसार के पूरे रंग रंग निकाल दो।
क्या होगा क्या नहीं होगा निकाल दो।
निकाल देने से आपके भाव बंद हो जाएंगे क्रिया बंद नहीं।
17:44से आपके भाव बंद हो जाएंगे क्रिया बंद नहीं होगी क्रिया तो जैसी होने वाली है ऐसी ही होगी पहले रोटी बनाने का भाव नहीं रहेगा तो फिर रोटी कैसे बनेगी देखो होता है कि नहीं होता है होगा ही होगा क्योंकि वो होने वाला है जड़ में तो होगा तो आप बिना भाव के activity में शामिल हो जाएंगे इच्छा नहीं है वो शामिल हो जाओगे बिना भाव के फायदा क्या होगा कि भावों के कारण जो कर्मों का पोटला बनता था वो नहीं बंधेगा और आप।
18:12वो नहीं बंधेगा।
और आपको उस time में रोटी बनाते बनाते भी सत्संग की बात याद आएगी।
सद्गुरु की बात याद आएगी।
आत्म कल्याण की दृढ़ता भावना बढ़ेगी।
कार्य लौकिक चल रहे हैं और अंदर में भावना विचार सब कैसे चल रहे हैं?
कब मेरे आत्मा का हित होगा? कब मेरे आत्मा का दर्शन होगा?
कब सत्संग मिलेगा? आज सत्संग में कैसी बात आई थी? उसका thinking चलता है।
कार्य संसार की प्रवृत्ति के चलते हैं।
और अंदर में भावना पूरी...
18:40अंदर में भावना पूरी बदल गई।
ऐसा हो सकता है।
भावना बिल्कुल धर्म कल्याण करने की, आत्म कल्याण की हो और क्रिया संसार की प्रवृत्ति की हो, देखने की, सुनने की, चखने की, ये सब हो।
ऐसा बन सकता है।
ये अंदर का change होता है, दूसरों को मालूम पड़े ना भी पड़े, क्योंकि अंदर की बात है, अंदर में change हुआ है।
तो आत्मार्थी जीव को अंदर में सुविचारणा चलती है, planning चलता है।
जिस बात की हमको important लगती है ना, वो बात की planning चलती है।
किस...
19:08किस बात की importance है?
कौन सा कदम कौन सा काम निपटाना है?
वो वो target बनाने के बाद अपने आप विचार उसके अनुसार ही चलेंगे।
जैसे घर में शादी हो तो अभी पूरा planning उसके अनुसार ही चलेगा देखो अपने आप।
नहीं करना है तो भी चलेगा ही चलेगा।
क्योंकि ये तारीख fix हो गई है ये सब तो अब इसके अनुसार सब आगे की पूरी बातें fixing हो जाएंगी।
समय के पहले कपड़े आ जाना, समय के पहले सब band-baaje हो जाना, समय के पहले सब...
19:36सब band-baaje हो जाना समय के पहले सब।
सब booking हो जाना complete।
ताकि end moment में दौड़ा-दौड़ी नहीं हो पंचायत ना हो देखो पूरा।
ये अपने आप आते हैं विचार।
क्योंकि हमने target एक fix कर दिया date fix कर दिया है।
ऐसे इसके अंदर एक target fix कर दो।
कि मुझे आज का आज ही आत्मकल्याण करना है।
जितना जल्दी होवे आत्मकल्याण करना इसके अलावा अभी कुछ नहीं करना है।
तो इतना fix करते ही पूरे विचार जो है आपके अंदर में पलट जाएंगे।
विचार पलट के ही संसार।
20:04विचार पलटते ही संसार की प्रवृत्ति नहीं रुकेगी और किसी का बाधा रूप नहीं बनोगे दुकान भी जाओगे घर में भी काम संभालोगे सब होता है।
लेकिन अंदर की स्थिति जो है बदल गई पूरी भावों की स्थिति।
पहले भाव परिवर्तन होता है रुचि बदलती है।
सबसे पहले उपयोग नहीं आता है आत्मा के अंदर।
सबसे पहले भावों की बदलना होता है कि संसार किसी भी कीमत पे नहीं चाहिए।
मुझे सिर्फ आत्मा ही चाहिए ऐसा एक अंदर में भावों का बदलाव होता है।
इसके लिए अवलोकन compulsory है।
20:32इसके लिए अवलोकन compulsory है। अवलोकन के बिना ये संभव नहीं है।
निरंतर जागृति में रहने की कोशिश करते करते करते करते अंदर के भाव पूरे बदल जाते हैं।
जिसके पूरे पूरे भाव बदल गए हैं सिर्फ आत्मा चाहिए उसको आत्मा मिलता है।
सारे को आत्मा नहीं मिलता है भले ही ध्यान करें या कुछ भी करें व्रत तप उपवास करें।
सारे को आत्मा नहीं मिलता है भाव बदलते हैं तो आत्मा का दर्शन हो सकता है।
भाव नहीं बदलते हैं तो आत्मा के दर्शन नहीं होता है तो ये बात यहाँ कहते हैं।
21:00एक नहीं निवृत्ति तो बीजानु परिणाम थमु संवेष संसार के भावों की निवृत्ति बिल्कुल stop तो दूसरे की स्थिति उत्पन्न होती है कौन सी आत्मकल्याण की।
लेकिन दोनों साथ में नहीं रहेंगे संसार के भाव भी और आत्मकल्याण दोनों साथ में नहीं होता है।
अहित हेतु एवं संसार संबंधी प्रसंग।
संसार के जो भी प्रसंग है शादी ब्याह के हो कि और कोई भी हो।
व्यापार धंधे के हो।
या कोई बीमारी हो तो hospital में जा...
21:28या कोई बीमारी हो तो hospital में जाना पड़ता हो।
ऐसे कोई भी प्रसंग हो, birthday हो, ऐसा कोई भी प्रसंग।
संसार संबंधी कोई भी प्रसंग है वो कैसे है? अहित हेतु है। अहित हेतु माने क्या?
इससे जीव का अंश मात्र भी भला होने वाला नहीं है।
चाहे खुशी के हो,
चाहे दुखी होने के हो, कोई भी प्रसंग संसार के हैं,
ये जीव को अहित का कारण बनता है। अहित हेतु एवं संसार संबंधी प्रसंग,
ये हमारे पूर्व कर्मों के उदय के अनुसार जो जो...
21:56ये हमारे पूर्व कर्मों के उदय के अनुसार जो जो घटनाएं घटती है वो।
दूसरा हमारा लौकिक भाव।
कि हमको लोगों को जैसा व्यवहार में होता है, लोगों को जैसा पसंद है, लोग उंगली नहीं उठावे, इस प्रकार से हमको काम करना है।
लोगों में बदनामी ना हो, लोग कोई उंगली नहीं उठावे, व्यवहार बराबर निभाना है, व्यवहार में कहीं गलती ना हो जावे हमारे से।
हम गलती करेंगे तो अच्छा नहीं लगेगा।
ऐसा जो हमारा लौकिक भाव, संसार संबंधी प्रसंग उदय।
22:24संसार संबंधी प्रसंग उदय अनुसार अनुकूल प्रतिकूल।
और इसमें joint होने वाले लोगों को अच्छा दिखाने के लिए व्यवहार निभाने का जो भाव है वो लौकिक भाव।
और ये तो भाव अब वो लोक चेष्टा।
सिर्फ भाव है ऐसा नहीं फिर लोगों को बाहर से भी दिखे कि हम आपके जैसे ही हैं आपके जैसा ही व्यवहार करना चाहते हैं आपसे अलग नहीं हैं ऐसा करके।
लोगों को सुहावे ऐसा action reaction प्रवृत्ति।
उदय प्रसंग।
लौकिक भाव।
22:52वे प्रसंग लौकिक भाव और लौकिक क्रिया सांसारिक क्रिया ज्ञानियों की क्रिया नहीं।
लोकी लोगों को अच्छा लगे ऐसी क्रियाएं मन वचन काया के प्रवर्त्त।
अहित हेतु ये सब क्या है जीव का कल्याण करने वाला नहीं है।
अहित करने वाला है बहुत क्योंकि आत्मज्ञान नहीं हुआ और ऐसे लफड़े में फसा है तो होने वाला भी नहीं है।
अहित हेतु ऐसा संसार संबंधी प्रसंग लौकिक भाव और लोक चेष्टा।
23:20और लोग कैसे?
ये सौनी संभाल जेम बने तेम जति करेने।
एकदम possible नहीं है तो क्या कह दिया?
जितना हो सके दूर रहना, जितना हो सके दूर रहना, बहुत संभालना, बहुत संभालना ऐसा।
Maximum जहाँ तक अपनी ताक़त हो वहाँ तक avoid करते जाओ, avoid करो, दूर रखो, दूर रखो सब।
जेम बने तेम ये सौनी संभाल।
नहीं संभालूँगा तो नुकसान हो जाएगा, नहीं संभालूँगा तो ये लोग क्या बोलेंगे?
ऐसा?
अच्छा नहीं लगेगा।
23:48अच्छा नहीं लगेगा।
के सवनी संभार जेम बने तेम जति करीनी।
Avoid करना।
नहीं होता है avoid तो क्या करना?
भाई कोई प्रश्न ऐसे हैं कि भई हम तो अभी शामिल होना ही पड़ता है।
हम उसको छोड़ के भाग नहीं सकते हैं तो क्या करना?
दूसरा point अब।
तेने संक्षेपिन।
तो 8 घंटे का program हो तो उसको कैसा भी करके 4 घंटे में खत्म कर।
4 घंटे का हो तो 2 घंटे में।
जितना हो सके minimize कर देना है।
तेने संक्षेपिन।
आत्महितने अवकाश अपो घटे छे।
24:16अवकाश अपो घटे छे।
संक्षेप करके लौकिक भाव से निवृत्ति ले करके,
लौकिक प्रवृत्ति से निवृत्ति ले करके,
चाहे जैसे उदय प्रसंग में हमको अपना आत्मा का हित कैसे होवे,
ऐसा planning करना चाहिए।
अगर ऐसा समय नहीं खींच के निकालोगे तो बहुत परेशानी हो जाएगी।
ये 51 number का माताजी का बोल है।
इसमें भी बहुत अच्छी बात कही है।
आकाश...
24:44आकाश पाताल भले एक था।
तो आकाश पाताल एक होता है तो क्या होता है?
करोड़पति रोडपति हो जाता है।
ऐसी परिस्थिति इतना नुकसान होता है।
तो जो believe ही नहीं कर सकते।
एकदम अटाकटा आदमी एकदम अचानक cancer घोषित हो जाए 2-3 महीने 2 दिन का मेहमान है।
2-3 महीने का मेहमान है ऐसा हो जाए आकाश पाताल एक हो जाए।
तो हम believe ही नहीं कर सकते अरे अब इतना अच्छे थे और ऐसे cancer कैसे हो सकता है कभी बीड़ी नहीं पिया सुपारी नहीं खाया वो नहीं खाया।
कैसे हो सकता है?
25:12कैसे हो सकता है?
हटे कटे इंसान को अचानक kidney fail हो जाए लो।
ये क्या हो गया?
आकाश पाताळ एक।
जो हमने सोचा नहीं है कर्मों का उड़े कब उड़े में आएगा पाप का उड़े कब दुनिया पलट जाएगी हमको कोई पता नहीं।
दुकान में आग लग जाए।
कोई चोरी जबरदस्त हो जाएगी पूरा छिन जावे।
जावे और accident हो जाए हाथ पैर टूट जावे।
जीवन भर का अपाहिज हो जावे।
देखो ये क्या हो गया है अनहोनी।
25:40देखो, ये क्या हो गया है? अनहोनी होती है जी।
ऐसी घटना संसार में रोज़-ब-रोज़ घटती है।
हमारे पे नहीं हुई है, बाकी लोगों पे तो रोज़...
चालू ही है, रोज़ paper में news आते ही हैं।
उसकी ज़िंदगी पूरी पलट जाती है 1 second के अंदर।
दिवाली के वो फटाकड़ा देखने गया।
फटाकड़ा आ गया, पूरा जल गया।
ऐसा होता है।
संसार में ऐसे प्रसंग रोज़ बनते हैं।
कि संसार का सार स्वरूप जो है, स्वर्णभंग...
26:08सार स्वरूप जो है स्वर्ण भंगुर स्वरूप है।
वो देख करके पढ़ करके सुन करके ज्ञानियों को तो वैराग्य आता है कि ये संसार में किसका भरोसा रखें कब न जाने कब क्या हो जावे।
क्या भरोसा रखें।
आकाश पाताल भले एकता है भले ऐसी स्थिति आवे कि तेरी वस्तु की चले नहीं।
एकदम तुम्हारी स्थिति एकदम खराब हो जावे।
पर भाई थारा ध्येय ने तू चुपिस ने।
तेरा ध्येय है मनुष्य जन्म सफल करने का आत्मदर्शन करने का आत्मा की संभालने का।
26:36आत्मा की संभाल रखना।
उसको तुम चाहे जैसे प्रसंग में भी पीछे नहीं हटो।
आ गई।
सारा प्रयत्न ने छोड़िस नहीं, तेरे जो कोशिश है, जागृति है,
सुविचारणा है, आत्महित कैसे होवे उसकी सुविचारणा है, उसको तुम छोड़ना नहीं।
आत्मार्थ ने पोषण मड़ेते कार्य करू, जिससे हमारी आत्मा की भावना बढ़े,
ऐसे सत्संग, भक्ति आदि कार्य करते रहना, जागृति में रहते रहना।
दूसरा कार्य नहीं करना, आत्मभावना कमजोर।
27:04करना। आत्मभावना कमजोर पड़े ऐसे संग में, प्रसंग में, कुसंग में, असत्संग में तुम नहीं रहना, वहाँ छोड़ देना।
दूसरों को बुरा लगेगा तो ऐसा होगा तो वो नहीं देखना, वो साथ छोड़ देना।
जे ध्येय चढ़े ते पूर्ण करजे।
जिस ध्येय को तुमने पकड़ा है, उसको कैसा भी करके तुम पार पड़ना।
जरूर तेरे को सिद्धि होगी।
तू सफल हो जाएगा।
ये बात यहाँ कही है। दूसरा भी एक बोल है कि,
चाया जैसी कटकटी में भी...
27:32चाहे जैसी कटोकटी में भी तू तेरे ज्ञान और ध्यान का समय निकाल लेना।
ये अमूल्य मनुष्य जीवन बेकार चले जाता है प्रपंचों में।
उसमें समय मिलता नहीं है आत्मकल्याण के बारे में सोचने को।
लेकिन अगर तुझे मुक्ति चाहिए तो चाहे जैसी कटोकटी में भी।
कि इधर सम इधर को देखे तो वो बिगड़े।
उधर देखे तो ये बिगड़े ऐसी परिस्थिति।
कटोकटी किसको बोलते हैं?
कि दोनों को संभालना possible ही नहीं है एक को तो छोड़ना पड़ता है practically।
28:00एक को तो छोड़ना पड़ता है practically भी।
क्या करना? ऐसी कटोकटी में भी तू तेरे ज्ञान ध्यान का समय खेत निकालना, उसको तो तू नहीं छोड़ना।
चाहे कुछ भी हो जाए।
क्योंकि वो तो कुछ भी हो जाए उसमें तो पूर्व कर्म है ना, उसमें तो तेरी कोई चलने वाली है भी नहीं ऐसे भी तो।
तुम ध्यान रखेगा तो भी तेरा बुरा time आया तो अच्छा time होने वाला भी नहीं है।
तुम चाहे कितना भी ध्यान रख ले।
जब तेरे पाप का उड़े आया तो कुछ नहीं हो सकता है।
इंद्र, नरेंद्र, धिनेंद्र कोई कुछ कर सकता नहीं है।
28:28मंत्र तंत्र औषध कुछ काम नहीं आते हैं सब हाथ ऊँचे कर देते हैं।
कोई बचाने वाला कोई नहीं है।
कोई हाथ पकड़ने वाला नहीं है क्योंकि बुरा time आया तो कितना भी गिड़गिड़ा कितना भी ध्यान कर कितनी भी प्रार्थना कर।
कितना भी मंत्र तंत्र कर ले तेरा कोई कार्य होने वाला नहीं है।
Better ये है कि अभी इसके बेकार का जो नहीं हो सके उस कार्य के पीछे जाने के बदले।
जो हमारा कार्य हो सके।
और लोक चेष्टा।
28:56लोक चेष्टा।
ते सौनी संभाल जेम बने तेम जति करीने।
जो तू न करे तो तेने संक्षेपीने।
आत्महितने अवकाश आपो घटे से।
क्योंकि संसार में पल पल खतरा है।
ज्ञानी पुरुष भी बहुत ध्यान रख करके कदम कदम पे देख देख के चल रहे हैं बहुत पुरुषार्थ उनको भी करना पड़ता है।
तुझे आत्मज्ञान नहीं हुआ है तेरी स्थिति तो बहुत खतरनाक है।
तुझे ये सब बहुत ध्यान रख करके कदम उठाना है।
29:24बहुत ध्यान रख कर के कदम उठाना है।
कैसा भी करके आत्महित को अवकाश देना है।
अब चलो हम तैयार कर लिए कि हमको आत्महित करना ही है, इतना सुनने के बाद अंदर में विचार आया।
हाँ।
बात तो बिल्कुल सही है, practically भी दिखती है, संसार में ऐसा ही है।
कब स्थिति बदल जावे, कब क्या हो जाए, कोई पता नहीं, भरोसा नहीं।
और अंदर के जो रा भाव हैं, राग द्वेष के, वो मिटते नहीं हैं, मिटेंगे नहीं तो मुक्ति कैसे हो अब?
और फिर जो कर्म के पोटले बांध रहे हैं, उसमें दुखी तो आखिर में हम ही होने वाले हैं।
29:52बांध रहे हैं उसमें दुखी तो आखिर में हम ही होने वाले हैं।
हमको ही सब भोगना है जैसे हम भाव करेंगे जैसा बीज बोएंगे वैसा ही फल आएगा।
संसार का बीज बोया है तो संसार बढ़ेगा जन्म मरण होते जाएंगे।
तो फिर हमको संभालना है सावधान होना है अभी हमको आत्महित करना है ऐसा अगर हमने तय किया है तो।
तब उपाय की बात करते हैं।
तो अगर ऐसा हमारे अंदर में भावना होती है तो सबसे पहले क्या कार्य करें?
किंतु आत्महित करना है तो सबसे पहले क्या...
30:20इंतज़ार आत्मयज्ञ करना है तो सबसे पहले क्या काम करना होगा?
तो कोई भी कार्य करना है तो कार्य करने की जो विधि है वो पहले जानना पड़ता है।
क्या?
अगर विधि में गड़बड़ हुई तो भावना होने पर भी कार्य नहीं होगा।
भावना तो अच्छी है।
लेकिन कैसे करना, कैसे पार पहुँचना?
नैया तो मिल गई लेकिन किनारा ये बाजू है और हम मधबरिया ये बाजू है।
और दरिया के पानी के ऊपर तो road का कोई chance, board वगैरह लगे हैं क्या?
30:48chance और board वगैरह लगे हैं क्या कि A side जाओगे तो किनारा आएगा और A side जाओगे तो बीच में जाओगे ऐसा तो कुछ symptom नहीं है।
road पे तो आपको मिल जाएंगे arrow mark मिल जाएंगे कितना कदम चले कितना kilometer चले सब मिल जाता है।
लेकिन दरिया के अंदर गए तो?
और किनारे पे जाना है और गलती से अगर wrong direction हो गया तो क्या होगा?
देखो अब क्या होता है।
इसीलिए आत्महित करना है।
31:16इसीलिए आत्महित करना है।
आत्महित कैसे करना है वो पहले जान लेना है।
कोई भी कदम उठाने के पहले।
Mumbai जाना है तो Mumbai जाने वाली train कौन सी है?
8 10 train platform पे खड़ी है।
सब platform full है हर platform पे गाड़ी है।
कौन सी गाड़ी Mumbai जाती है?
कहीं ऐसा ना हो कि जल्दबाजी में Madras की train में बैठ गए Delhi की train में बैठ गए।
जानकारी पूरी लेने के बाद उतना time तो आपको देना ही है।
31:44उतना time तो आपको देना ही है। इसके बाद आपको कदम उठाना है।
भावना intact है लेकिन भावना को सफल करने के लिए planning जरूरी है, सब कुछ जानना जरूरी है विधि।
वो विधि कहाँ मिलती है?
वो काम पहले करना है।
तो देखो क्या कहते हैं।
आत्महित माते सत्संग जेहुँ बड़वान बीजू निमित्त कोई जणातु न ते।
देखो अब आखिर बात आई घूम फिर के सत्संग।
तो अगर आपको आत्मकल्याण करना है, मुक्ति पाना है तो।
आपके पास कोई alternative...
32:12आपके पास कोई alternative नहीं है।
ऐसे बहुत से दर्शन, पूजा, भक्ति, त्याग, वैराग्य ऐसे बहुत से हैं लेकिन सबसे बलवान कौन?
सबसे बलवान निमित्त, उपादान नहीं, उपादान तो तू स्वयं।
लेकिन जहाँ guidance मिलता है, perfect, भगवान के दर्शन करने में guidance नहीं मिलता है।
पूजा करने में नहीं मिलता है, शास्त्र पढ़ने में भी हम हो सकता है अर्थ का अनर्थ कर देवे।
समझने में गलती करें।
32:40तो 45 number की गाथा में आता है कि राग द्वेष के भाव जीव नहीं करता है।
46 number की गाथा में आता है कि राग द्वेष के भाव जीव ही करता है, अब क्या बोलोगे बताइए, क्या अर्थ करोगे?
शास्त्र पढ़ने में भी हम ये गलती कर सकते हैं कि खाली यहाँ ऐसा कहा यहाँ ऐसा कहा, किसकी बात मानना?
कौन सी बात मानना, वही author है।
एक ही गाथा का फर्क है 45 46, समय सारखी।
इतनी opposite बात।
हम समझ नहीं पाते हैं, आज।
33:08हम समझ नहीं पाते हैं, आशाएं नहीं समझ पाते हैं।
क्या करें?
तो कोई भी प्रवृत्ति में हमको जगाने के लिए, हमारा आत्महित में जल्दी से progress होवे, इसके लिए सबसे बलवान निमित्त कौन सा?
सत्संग।
आत्महित माते सत्संग जेहुं बड़वान बीजू निमित्त कोई पान जणातुं नथी।
आप नग्न दिगंबर हो जाओ, मुनि बन जाओ, जंगल में रह जाओ, वो निमित्त नहीं है।
ये तो आपने सीधा जानकारी लिए बिना सीधा action शुरू कर दिया है।
33:36Action शुरू कर दिया है।
विधि तो मालूम नहीं है कि कैसे करना और सीधा कार्य शुरू कर दिया है।
उसने उपवास किया मैं भी उपवास करूँ मेरे को भी शायद मिल जाएगा।
युसूफ देव भगवान ने वर्सी तप किया था और मोक्ष में गए।
हम भी शुरू करो हर साल वर्सी तप करो एक नहीं 10 करो।
क्या हुआ?
मोक्ष तो बहुत दूर की बात है।
अंश मात्र भी शरीर के प्रति संयोगों के प्रति मोह कम नहीं हुआ है राग द्वेष कम नहीं हुआ है।
कितने साल से वर्सी तप करते हो?
पिछले 10 साल से लगातार वर्सी तप।
34:04पिछले 10 साल से लगातार वर्षितप कर रहा हूँ।
वो कितना कम हुआ, राग द्वेष कितना कम हुआ?
क्योंकि विधि नहीं है।
विधि पहले जानना है और इसके लिए कुछ भी कार्य करने से पहले, कदम उठाने से पहले, सत्संग में आना है।
चलो सत्संग करना चालू कर दिए।
सत्संग आज से शुरू।
ऐसा करके सत्संग में आना शुरू कर दिए।
लेकिन वहाँ भी एक problem है।
छता ते सत्संग पण, वो सत्संग भी...
34:32ते सत्संग पर वो सत्संग भी फायदा नहीं होता है सत्संग में जाने के बाद भी।
आत्महित के लिए सत्संग करना है और सत्संग किया तो भी फायदा नहीं हुआ ऐसा भी बनता है।
क्या कारण?
ते सत्संग पर जे जीव लौकिक भाव ती अवकाश देतो नथी तेने प्राय निष्फल जाए छे।
आत्मकल्याण भी करना है।
संसार के जो हमारे जो उदय प्रसंग है उसको भी संभाल रखना है।
घर में भी ध्यान देना है धंधे में भी ध्यान देना है।
35:00करना है धंधे में भी ध्यान देना है व्यवहार में भी बराबर चलना है और आत्मकल्याण भी करना है सब हो सकता है 24 घंटा है हमारे पास सुबह का 1 घंटा शाम का 1 घंटा सत्संग के लिए रख लो 2 घंटा 8-10 घंटे दुकान के लिए रख लो 2-4 घंटा शरीर के लिए रख लो सब होता है ना नहीं होता है क्या थोड़ा इधर ध्यान दे थोड़ा इधर ध्यान दे थोड़ा इधर bowling भी करना आता है fielding करना भी आता है catch पकड़ना भी आता है और batting करना भी आता है और wicket keeping भी आता है सब।
35:28भी आता है और wicket keeping भी आता है सब आता है क्या होगा कैसे होगा ये कार्य होने का संभव ही नहीं है ऐसा नहीं हो सकता है लौकिक भावना बिल्कुल खत्म हुई तो सत्संग एकदम फलवान हो जाएगा इतना ज्यादा सत्संग करने की जरूरत नहीं पड़ती है सत्संग करते जाएं करते जाएं करते जाएं result अभी तक नहीं निकला है जरूर हमारे में कमी रह गई क्या कमी रह गई हम सत्संग तो बहुत किया।
35:56हम सत्संग तो बहुत किया।
सही समझा भी, बुद्धि में बैठ भी गया, लेकिन हमने अभी तक लौकिक भाव को नहीं छोड़ा है।
यही वजह है कि हमको 6 महीना क्या, 6 साल तक भी सत्संग करते हुए भी फायदा नहीं हो रहा है।
6 जन्मों में भी नहीं होगा।
क्यों नहीं होगा?
लौकिक भाव को नहीं छोड़ा, अभी भी आग्रह कितने पड़े हैं।
ऐसा नहीं करना है, ऐसा करना है।
फिर हमारे जो action reaction, ये खाना है, ये नहीं खाना है।
36:24Reaction reaction ये खाना है ये नहीं खाना है।
यहाँ जाना है यहाँ नहीं जाना है।
यहाँ अच्छा लगता है यहाँ अच्छा नहीं लगता है।
कितने अंदर में प्रपंच पड़े हैं।
हम free नहीं हैं।
हमने surrender नहीं किया है वातावरण के साथ।
समझौता नहीं किया उदय के साथ।
उदय आता है तो घबराकर करके fight करने लग जाते हैं अनाप-शनाप कुछ भी जो भी उपाय आता है कर लेते हैं।
सर दुखा तो सर फौरन anesthesia ले लेते हैं।
Doctor के पास दौड़े जाते हैं।
तो आत्मा याद नहीं आता है? आता है याद?
कि सर तो ये दुखा है तो आत्मा को तो ज्ञान होता है।
36:52है तो आत्मा को तो ज्ञान होता है।
भले हम उपाय करो लेकिन साथ में ये भाव चलता है कि मैं शरीर से भिन्न हूँ।
वो तो उस time में याद ही नहीं आता इतना दर्द था।
कौन भागे ये किया वो किया।
उस time में आत्मा याद नहीं है doctor आ जाता है।
ये लौकिक भाव।
लौकिक भाव भी कहीं गए तो अपना taste का खाना नहीं मिला।
परेशान।
ये तो चाहिए ही चाहिए था दाल तो ठंडी नहीं चलेगी गरम ही चाहिए।
मिर्ची कम है नहीं चलेगा मिर्ची चाहिए ये सब कितना क्या क्या हो गया है ये।
37:20ક્યા ક્યા હો ગયા હૈ?
આત્મકલ્યાણ કે કરને વાલે કે એસે લક્ષણ તો નહીં હોતે હૈ.
એ કરના હૈ, એ નહીં કરના હૈ, એસા હોના હૈ, એસા નહીં હોના હૈ, એસા નહીં હોતે હૈ.
સારે લૌકિક ભાવ હૈ.
તો ફિર એસે લૌકિક ભાવ ભી હૈ, હમ સત્સંગ ભી કરતે જાવે ઔર...
વી કૈસે સફલ હોગા? તો નહીં હોગા.
સફલ હોને કા કોઈ chance નહીં હોતા હૈ.
કિતના ભી કરે નહીં હોતા હૈ.
સત્સંગ સિવાય આત્મહિત માટે બીજું કોઈ બઢવાનું નિમિત્ત નથી.
છતાં તે સત્સંગ પર જે જીવ લૌકિક ભાવથી અવકાશ દેતો નથી...
37:48હોતી અવકાશ દેતો નથી.
તેને પ્રાય નિષ્ફળ થાય છે.
ઇસકો સફલ નહીં હોતા હૈ સત્સંગ બેકાર હો જાતા હૈ.
ઇસલે સત્સંગ કરને વાલે કો સબસે પહેલે ક્યાં બતાયા ગયા?
તો ભૈયા તું અપને ભાવો કા અવલોકન કર.
તું કહાં ખડા હૈ તુજે લોક આત્મા કી કલ્યાણ કરને કી ભાવના હૈ કે સંસાર કો બઢાને કી ભાવના હૈ?
તુજે ક્યાં હૈ અંદર મેં ક્યાં ચલ રહા હૈ?
ઉસકા દેખના ચાલુ કર દે.
દેખેગા તો લૌકિક ભાવ ખતમ હોગા નહીં દેખેગા.
એસા હી સત્સંગ મેં આ જાયેગા જાગ...
38:16ऐसे ही सत्संग में आ जाएगा जागृति में नहीं रहेगा तो लौकिक भाव बढ़ जाएंगे।
कुछ सत्संग सफल होने वाला नहीं है।
अवलोकन करेगा तो जागृति आएगी तो अपना अच्छा बुरा वो पहचानेगा।
दोष के प्रति अब सहज में दुर्लक्ष होगा।
उपेक्षा हो जाएगा दर्द होगा।
अपने आप आत्मक गुण का विकसित होता है।
सत्संग सफल होता है।
जितना दोष कम होता है वहां उतना गुण प्रकट होता है और वो गुण सत्संग को सफल करने में फायदा होता है।
सत्संग निमित्त है।
कार्य अपने गुणों...
38:44सीमित है।
कार्य अपने गुणों से होने वाला है।
गुणों की वृद्धि होगी, दोषों की कमी होगी, तो हम आगे बढ़ेंगे।
नहीं तो हम आगे नहीं बढ़ेंगे।
बाकी का जो portion है आधा फल ले लेंगे वो।
सुख धर्म अनंत संसार।
39:12Well I'll show empty again.